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शहर सलाम, कि मैंने देखा है....गंगेश गुंजन की कविता 'प्रणाम शहर'

हिंदी और मैथिली साहित्य जगत के सम्मानित कवि, कथाकार, गीतकार, नाटककार व संपादक गंगेश गुंजन ने यह कविता मई, 1982 में लिखी थी, पर यह आज भी उतनी ही सामयिक है

प्रतीकात्मक चित्र और वरिष्ठ कवि गंगेश गुंजन [इनसेट में] प्रतीकात्मक चित्र और वरिष्ठ कवि गंगेश गुंजन [इनसेट में]

कवि, कथाकार, गीतकार, नाटककार व संपादक गंगेश गुंजन हिंदी और मैथिली साहित्य जगत का सम्मानित नाम हैं. भाषाई और माटी से उनका लगाव काफी पुराना है. बिहार के मधुबनी से सटे पिलखवार निवासी गुंजन 1994 में अपने कहानी संग्रह 'उचित वक्ता' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किए गए. आपकी मैथिली में 'अन्हार इजोत', 'पहिल लोक', 'हम एकटा मिथ्या परिचय', 'लोक सुनू', 'बुधिबधिया', 'आइ भोट' और हिंदी में 'शब्द तैयार है' जैसी कृतियों से भी अपनी पहचान बनाई है. दशकों तक आकाशवाणी में कई पदों पर रहे गुंजन ने यह कविता अपने भागलपुर प्रवास के दौरान मई, 1982 में लिखी, पर आज भी उतनी ही सामयिक है.

प्रणाम शहर!

मैं देखता हूं
बनाये हुए बियाबान को चीरती हुई चलने लायक पगडंडी तैयार हो चली है.
लोग जो पैदल चलने को मजबूर, बहुत दूर-दूर तक जाने वाले हैं,
उस पर चलने लगे हैं.
पगडंडी को जीवन, गति और निश्चित मंजिल से जोड़ने लगे हैं.
समानांतर राजपथ पर चलते हुए नंगी देह, पैर और ललाट वाले
मुलायम, मरती हुई ममता और एंड़ी-पैरों वाले बच्चे,
औरतें और मर्द लोग सिर पर उगलती हुए सूरजी सामंत की धूप-चाबुकों की दुर्घटनाओं के शिकार, कम होने लगे हैं.
राजपथ के खिलाफ़ लोग पगडंडी तैयार कर इक्के-दुक्के काफिलों में चलने लगे हैं.
राह के ख़तरों को ख़त्म करने के लिए ज़रूरी
पगडंडी पर साथ-साथ बस्ती की तरफ जाने का मरम कुछ-कुछ समझने लगे हैं.  
हथेली पर खैनी मलने की सुगबुगाहट पर,
अगले पड़ाव पर सुस्ताने के पहले तक की पूरी यात्रा में किसी
सख्त नुकीले मारुक इरादों की तरह तलहथी और मस्तिष्क में संभलकर औजार की तरह तुलने लगे हैं.
घनघोर अंधेरे खूंखार जानवरों से भरे जंगल में घिरे किसी कबीले की तरह,
जिनकी चौकसी के उजाले पूरे जंगल और जानवरों के घातक इरादे देखा करते हैं
कबीले के बच्चे, औरतें और मर्द आमने-सामने अड़े रहते हैं.

शहर सलाम, कि
मैंने देखा है,
जिस शहर के औसत लोगों के लिए अनाज तो दूर, पानी तक मुहैया कराने की उसने कोई जिम्मेदारी नहीं ली कभी,
कितने जतन और अपनी प्यासों की कटौती कर-कर के लोगों ने,
कुछ ठूंठों को सींचा लगातार!
और जहां-तहां कुछ घने हरे फल वाले बिरवों को रोपना शुरू किया और
उन्हें पटाते रहे लगातार. पटाते रहे लगातार. अपनी प्यास काट-काट कर.
क्योंकि उनके सामने लाल-लाल मुलायम तलवों, हथेलियों और
समूची धरती, आकाश को प्रतिबिंबित करते हुए
मासूम आंखों वाले बच्चे थे, वर्तमान से भविष्य तक का सीधा रिश्ता था.
अब तो बच्चे भी सीख गए थे पेड़ सींचना.
पेड़! हरे भरे पेड़ कुछ और हरे, घने और बढ़न्तू शाखों‌ में
रोज-रोज कुछ और भरने कुछ और भरने और हवाओं में झूमने लगे हैं
कड़ी धूप के खिलाफ और प्रतिरोध करने लगे हैं.
कहीं-कहीं फूल फल भी देने लगे हैं.
साफा बांधे दूर-दूर तक राजपथ के सघन पंक्तिबद्ध, झुके हुए
बूढ़े दरवानों के खिलाफ पगडंडी के अगल-बगल ये नए पेड़ कवायद की मुद्रा में,
कभी नए समूह गान गाते, कदम-कदम बढ़ते किशोरों की तरह तनने लगे हैं और
राजपथ के खिलाफ ख़ूब संभल-संभल कर चलने लगे हैं
पगडंडी तनिक और निरापद कुछ और यात्रियों से चालू रहने लगी है और
वृक्ष छायादार शीतल आश्रय की तरह राहगीरों के लिए धूप से लड़ने लगे हैं.
धीरे-धीरे राजपथ के बूढ़े झुके पेड़ वाले कंधों पर फुदकते-उड़ते हुए,
पर कटे ग़ुलाम पक्षी बेचैनी से इधर-उधर उचकने लगे हैं.
पगडंडी के पेड़ों, डालियों की छाया की स्वतंत्रता और स्वाद समझने लगे हैं.

शहर सलाम! कि
पेड़ अब ख़ूब समझदार होने लगे हैं.
लेकिन अजब है कि तब भी मेरे कुछ बुद्धिजीवी दोस्त
मेरी इस कविता को प्रदूषण के खिलाफ वन महोत्सव का एक प्रचारात्मक उपक्रम कहकर बिदकने लगे हैं.
अपनी समझदारी में सुरक्षित भाव से सिमटने लगे हैं.

शहर सलाम! कि
मेरे छोटे भाई
राजपथ के खिलाफ पगडंडी की जरूरत समझने लगे हैं
और एक दूसरे से कहने लगे हैं.

शहर सलाम!
मेरे छोटे भाइयों में मिलेंगे तुम्हें मेरे ख़त, मेरा मौजूदा पता, मेरा काम. गाँव को जोड़ता हुआ,
किसी एक शरीर में अनगिनत नसों की तरह-
एक रहे आम.          

शहर सलाम!    

                                      

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