Long Life Secret: हर कोई लंबी उम्र जीना चाहता है और हम कितनी लंबी उम्र जिएंगे, यह सवाल हमेशा से लोगों के मन में रहता है. अब तक हम यह मानते थे कि हम कितना लंबा जिएंगे, यह पूरी तरह हमारी लाइफस्टाइल, बैलेंस डाइट, एक्सरसाइज और स्ट्रेस से दूरी पर निर्भर करता है. लेकिन हाल ही में सामने आई एक नई स्टडी ने इस सोच को थोड़ा और आगे बढ़ा दिया है.
नई रिसर्च के मुताबिक, अब यह माना जा रहा है कि लंबी उम्र के खेल में 50 प्रतिशत हिस्सा हमारे जीन्स का है, जो हमें अपने माता-पिता से विरासत में मिलते हैं. बाकी 50 प्रतिशत हमारी आदतों और वातावरण पर निर्भर करता है, जो पहले के अनुमानों से कहीं ज्यादा है. हमारे शरीर में कुछ ऐसे 'प्रोटेक्टर जीन' होते हैं जो बीमारियों से लड़ने में मदद करते हैं, यही कारण है कि कुछ लोग बिना किसी खास डाइट के भी 100 साल तक जी जाते हैं.
इजराइल के वेइज़मैन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस के साइंटिस्ट ने किया है, जो साइंस जर्नल में पब्लिश हुई थी.पहले हुई कई रिसर्च में यह माना जाता था कि जीन का असर सीमित है और ज्यादा प्रभाव वातावरण और लाइफस्टाइल का होता है. पहले के रिसर्च में दुर्घटनाओं या इन्फेक्शन से होने वाली मौतों को भी शामिल किया जाता था, जिससे जीन्स का असर कम दिखता था. जब साइंटिस्ट ने सिर्फ प्राकृतिक बुढ़ापे पर ध्यान दिया, तो पता चला कि जीन्स का रोल पहले की तुलना में कहीं ज्यादा बड़ा है.
रिसर्च के हेड राइटर बेन शेनहार के मुताबिक, इंसान की उम्र कई बातों से प्रभावित होती है, इसमें जीन, लाइफस्टाइल, वातावरण और कुछ हद तक किस्मत या अचानक होने वाली घटनाएं भी शामिल हैं. उदाहरण के तौर पर, कई बार एक जैसे जीन और एक जैसे माहौल में पले-बढ़े लोग भी अलग-अलग उम्र में मर जाते हैं. इसका मतलब है कि सिर्फ एक ही कारण जिम्मेदार नहीं होता है.
पहले किए गए जुड़वां बच्चों पर आधारित स्टडी में एक बड़ी कमी थी. इनमें अक्सर दुर्घटना, हिंसा या इंफेक्शन जैसी बाहरी वजहों से हुई मौतों को अलग से नहीं गिना गया था. इन कारणों को साइंस की भाषा में बाहरी मृत्यु कारण कहा जाता है. नए स्टडी में साइंटिस्ट ने एक खास मैथमेटिक्स फार्मूले की मदद से इन बाहरी कारणों को अलग किया. जब ऐसा किया गया, तो साफ दिखा कि जीन का असर पहले समझे गए मुकाबले कहीं ज्यादा है.
इस रिसर्च में स्वीडन के पुराने और नए दोनों तरह के डेटा का इस्तेमाल किया गया. इसमें ऐसे जुड़वां बच्चों को भी शामिल किया गया जो एक साथ पले-बढ़े थे और ऐसे भी जो अलग-अलग जगहों पर बड़े हुए. खास बात यह रही कि एक जैसे जीन वाले जुड़वां, लेकिन अलग माहौल में पले लोग.वैज्ञानिकों को जीन और वातावरण के फर्क को समझने में बहुत मददगार साबित हुए.
स्टडी में यह भी सामने आया कि जैसे-जैसे बाहरी कारणों से होने वाली मौतें कम होती हैं, वैसे-वैसे जीन का असर उम्र पर और ज्यादा साफ दिखाई देता है. इसका मतलब है कि अगर किसी समाज में हेल्थ फैसिलिटी बेहतर हों और एक्सीडेंट्स कम हों, तो वहां जीन का रोल अधिक अहम हो जाता है.
वैज्ञानिकों का कहना है कि जीन हमेशा नेगेटिव नहीं होते, कुछ जीन ऐसे होते हैं जो बीमारियों से बचाव करते हैं. कई लोग 100 साल की उम्र तक बिना किसी गंभीर बीमारी के जी लेते हैं, जिसे रक्षक जीन का असर माना जाता है. हालांकि, लंबी उम्र किसी एक जीन से नहीं बल्कि सैकड़ों या हजारों जीनों के मेल से तय होती है.इस स्टडी से एजिंग और लंबी उम्र से जुड़े जीन पर आगे और ज्यादा रिसर्च की उम्मीद बढ़ी है.एक्सपर्ट मानते हैं कि इससे भविष्य में बेहतर इलाज और हेल्दी लाइफ के नए रास्ते खुल सकते हैं.