
High Protein Product in india: हाई प्रोटीन मिल्क, हाई प्रोटीन बार, हाई प्रोटीन आटा, हाई प्रोटीन ब्रेड....पिछले कुछ सालों में अगर आपने जब भी सुपरमार्केट या ऑनलाइन ग्रॉसरी एप खोली होगी तो ये हाई प्रोटीन प्रोडक्ट का ट्रेंड साफ दिखाई देता है. अधिकतर खाने की चीजें अब हाई प्रोटीन वाली हो चुकी हैं. दूध हो या दही, ब्रेड हो या आटा, बिस्किट हो या बार…छोटे-छोटे पैकेट्स पर बड़े अक्षरों में लिखा है, '20 ग्राम, 25 ग्राम, 30 ग्राम प्रोटीन'. सवाल यह है कि अचानक हाई प्रोटीन चीजों को लेकर इतना शोर क्यों मच गया है? क्या वाकई ये हाई प्रोटीन प्रोडक्स हेल्दी हैं या फिर यह एक नया मार्केटिंग हथकंडा बन चुका है?
इस बारे में Aajtak.in ने डायटीशियन, फिटनेस एक्सपर्ट और सेलेब्रिटी फिटनेस कोच से बात की और उनसे जाना कि क्या भारतीयों में प्रोटीन की इतनी अधिक कमी है? क्या हाई प्रोटीन प्रोडक्ट्स वाकई समाधान हैं या सिर्फ फूड इंडस्ट्री ने हाइप बना रखी है. साथ ही जाना कि आम आदमी को प्रोटीन के नाम पर क्या चुनना चाहिए और किससे बचना चाहिए?
ICMR-NIN के अनुसार, स्वस्थ इंडियन वयस्कों के लिए प्रोटीन की रिकमेंड मात्रा 0.83 ग्राम/किलो बॉडी वेट है. यानी कि अगर किसी का वजन 70 किलो है तो उसे दिन में करीब 58.1 ग्राम प्रोटीन स्वस्थ्य रहने के लिए चाहिए.
ICMR-NIN के 'What India Eats' स्टडी के अनुसार, भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में 36 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 44 प्रतिशत लोग प्रोटीन की कमी से प्रभावित हैं.

इंटरनेशनल क्रॉप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर द सेमी-एरिड ट्रॉपिक्स (ICRISAT) और सेंटर फॉर इकोनॉमिक एंड सोशल स्टडीज (IFPRI) की रिपोर्ट का कहना है कि भारत में कई परिवार फलियां, डेयरी और एनिमल प्रोडक्ट्स जैसे प्रोटीन सोर्स की उपलब्धता के बाद भी पर्याप्त प्रोटीन का सेवन नहीं करते हैं.
तो फिर क्या भारत में हाई प्रोटीन प्रोडक्ट्स भारतीयों की फिटनेस जर्नी में अहम भूमिका निभा सकते हैं या भारतीयों में जागरुकता की कमी का फायदा उठाकर उनकी सेहत से और खिलवाड़ कर सकते हैं?
मुंबई के पीडी हिंदुजा हॉस्पिटल की क्लिनिकल डाइटीशियन रुतु धोडापकर (Rutu Dhodapkar) ने Aajtak.in को बताया, 'आजकल प्रोटीन का क्रेज बन गया है, इसके पीछे एक मजबूत साइंस है. दरअसल, हड्डियां बनाने के लिए, इम्यूनिटी के लिए, मांसपेशियों को बनाने और रिपेयर करने के लिए, ब्लड शुगर को स्थिर रखने के लिए, पेट भरने के लिए प्रोटीन की अहम भूमिका होती है. इन चीजों को दुरुस्त रखने के लिए खाने के पैटर्न और खाने के तरीकों को बदलना होता है.'
'खाने के तरीके बदलने और अपने आपको थोड़ा मस्कुलर बनाने या फिर वेट लॉस के लिए लोग लो कार्ब, इंटरमिटेंट फास्टिंग और हाई प्रोटीन डाइट जैसे प्लान अपना रहे हैं, इस कारण फूड ब्रांड्स ट्रेंड के हिसाब से प्रोडक्ट्स को रिफॉर्म करके इसका सॉल्यूशन दे रहे हैं. आजकल बिजी लाइफस्टाइल में सही खाना खाने का बहुत कम समय होता है, इसलिए एक क्विक और पूरा खाना या स्नैक प्लान किया जा रहा है जो तेज और सुविधाजनक हो.'
'मार्केटिंग के लिए ब्रांड्स लेबल को मॉडिफाई करते हैं, जिसमें किसी भी प्रोडक्ट पर बड़े-बड़े अक्षरों में 20-30 ग्राम प्रोटीन लिखा होता है जो कस्टमर का ध्यान अपनी ओर खींचता है.'

ऑनलाइन फिटनेस और न्यूट्रिशन प्लेटफॉर्म फिटर के फाउंडर जितेंद्र चौकसे ने बताया, 'प्रोटीन एक बहुत जरूरी मैक्रोन्यूट्रिएंट है, खासकर प्रोटीन की कमी वाले भारतीयों के लिए. हम भारतीय रोजाना की जरूरत से बहुत कम प्रोटीन खाते हैं. प्रोडक्ट्स में प्रोटीन हो भी सकता है और नहीं भी. भारत में कई प्रोटीन प्रोडक्ट्स में असली प्रोटीन की जगह मिलावटी या सस्ते अमीनो एसिड मिलाकर प्रोटीन की मात्रा अधिक दिखाई जाती है, जिसकी शिकायतें और सबूत पहले से मौजूद हैं.'
'हर प्रोडक्ट की हर बैच के साथ लैब टेस्टिंग होनी चाहिए और उनकी रिपोर्ट्स पब्लिक की जानी चाहिए. भरोसा बनाने की जिम्मेदारी ब्रांड्स की होनी चाहिए, पब्लिक की नहीं. सिर्फ FSSAI कम्प्लायंस काफी नहीं है इसलिए किसी पर आंख मूंदकर भरोसा न करें.'
सेलेब्रिटी फिटनेस कोच प्रसाद नंदकुमार शिर्के ने बताया, 'ये जो मार्केट में हाई प्रोटीन प्रोडक्ट्स जैसे दूध, दही आदि जो क्लेम करते हैं तो मुझे लगता है ये सब मार्केटिंग स्ट्रेटजी है क्योंकि जहां तक मुझे पता है किसी हाई प्रोटीन प्रोडक्ट के 250 मिली में 7-8 ग्राम प्रोटीन हो सकता है.'
'लेकिन कुछ प्रोडक्ट्स जो दावा करते हैं कि 100 ग्राम क्वांटिटी में हम आपको 25-30 ग्राम प्रोटीन देंगे तो वो आइडियली रूप से पॉसिबल नहीं है. हाल ही में मैंने कुछ दिन पहले एक प्रोडक्ट देखा था जिसकी 100 ग्राम मात्रा में 50 या 60 ग्राम प्रोटीन था. तो मुझे लगता है ये सब मार्केटिंग स्ट्रैटेजी है.'
कोच शिर्के कहते हैं, 'भारत में प्रोटीन डेफिशिएंसी दूर करने के लिए हाई प्रोटीन प्रोडक्ट्स पूरी तरह गेम-चेंजर नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर इंफ्लूएंसर्स द्वारा हाइप किए जा रहे हैं. इन प्रोडक्ट्स ने लोगों का ध्यान जरूर प्रोटीन की तरफ खींचा है लेकिन समस्या की जड़ अभी भी वही है. गलत डाइट पैटर्न, कम नैचुरल प्रोटीन सोर्स और न्यूट्रिशन की अधूरी समझ.'
'सच्चाई यह है कि दूध, दही, दाल, अंडा, पनीर, सोया, चना जैसे पारंपरिक भारतीय चीजें सस्ता, सुरक्षित और बेहतर बायोएवेलिबिलिटी वाला प्रोटीन देते हैं. इसके मुकाबले कई हाई प्रोटीन पैक्ड प्रोडक्ट्स में शुगर, फैट, एडिटिव्स और कैलोरी भी ज्यादा होती हैं जिन्हें लोग लेबल पर सिर्फ 20–30 ग्राम प्रोटीन लिखा देखकर नजरअंदाज कर देते हैं और सिर्फ प्रोटीन कंटेंट देखते हैं.
'हालांकि, कुछ खास स्थितियों में जैसे शहरी लाइफस्टाइल, समय की कमी, बुज़ुर्गों आदि में डॉक्टर की सलाह पर ये प्रोडक्ट्स सपोर्टिंग रोल निभा सकते हैं. लेकिन इन्हें प्रोटीन डेफिशिएंसी का स्थायी इलाज मानना गलत होगा.'
डायटीशियन रितु कहती हैं, हर प्रोडक्ट में इस्तेमाल की गई सामग्री जैसे मटर, सोया या अंडे, दूध और दूध के कंसंट्रेट जैसे प्लांट प्रोटीन का जिक्र होता है. यदि किसी को उन चीजों से एलर्जी है या फिर इनटॉलरेंस हैं, तो उन्हें समस्याएं हो सकती हैं. वहीं यदि आप नकली या मिलावटी प्रोडक्ट का सेवन करते हैं तो जाहिर सी बात है वो आपकी सेहत के लिए सही नहीं रहेगा.'
'कई हाई प्रोटीन प्रोडक्ट्स में प्रोसेस्ड प्रोटीन, आर्टिफिशियल स्वीटनर और एडिटिव्स होते हैं. इससे गैस, ब्लोटिंग, कब्ज या पेट भारी लगने की शिकायत हो सकती है.'
फिटनेस एक्सपर्ट जितेन्द्र कहते हैं, 'एक नॉर्मल प्रोटीन प्रोडक्ट का कोई बड़ा साइड इफ़ेक्ट नहीं होना चाहिए जब तक कि उसमें मिलावट न हो या उसमें मेलामाइन, यूरिया जैसे हानिकारक केमिकल्स न मिलाए गए हों. कुछ प्रोटीन प्रोडक्ट्स लैक्टोज इनटॉलरेंस वाले लोगों में पाचन संबंधी परेशानी पैदा कर सकते हैं.'
Mayo Clinic की रिसर्च बताती हैं कि जिन लोगों को पहले से किडनी की दिक्कत है, उनके लिए ज्यादा प्रोटीन नुकसानदेह हो सकता है. हेल्दी लोगों में भी जरूरत से ज्यादा प्रोटीन लंबे समय तक लेने पर किडनी पर अनावश्यक लोड बढ़ता है. वहीं जब डाइट सिर्फ प्रोटीन पर टिक जाती है, तो फाइबर, विटामिन और मिनरल्स की कमी हो सकती है. इससे कमजोरी, थकान और इम्युनिटी पर असर पड़ता है.

जब हमने कुछ हाई प्रोटीन वाले शुगर फ्री प्रोडक्ट्स को चेक किया तो उसमें एक कंपाउंड दिखा जिसे पॉलीओल माल्टिटोल, [Polyol (malitiol)] लिखा गया था. हमने जाना कि ये क्या है और इसे कितना खाना चाहिए.
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ के मुताबिक, रासायनिक रूप से इन्हें पॉलीहाइड्रिक अल्कोहल माना जाता है और ये कार्बोहाइड्रेट से प्राप्त होते हैं, मुख्य रूप से मक्का, गेहूं और चुकंदर से
खाने-पीने की दुनिया में इसे 'शुगर अल्कोहल' के नाम से जाना जाता है (जैसे जाइलिटोल या सॉर्बिटोल). यह चीनी जैसी मिठास तो देता है, लेकिन इसमें कैलोरी बहुत कम होती है. यह खून में शुगर लेवल को तेजी से नहीं बढ़ाता, इसलिए शुगर-फ्री मिठाइयों और च्युइंग गम में इस्तेमाल होता है.
पॉलीओल की कोई एक तय लिमिट नहीं है लेकिन हेल्थ संबंधी अलग-अलग गाइडलाइंस प्रतिदिन 10-15 ग्राम तक ही इनका सेवन करने की सलाह देते हैं ताकि पेट फूलना या दस्त जैसी पाचन संबंधी समस्याओं से बचा जा सके. लेकिन कुछ प्रोटीन का दावा करने वाले प्रोडक्ट्स में यह इस लिमिट से कहीं ज्यादा होता है. ऐसे में शुगर फ्री लेबल को भी ध्यान से देखना जरूरी है.
डायटीशियन रितु करती हैं, 'सप्लीमेंट को सेकंडरी ऑप्शंस की तरह इस्तेमाल करना चाहिए ना कि प्राइमरी ऑपशंस की तरह. कोशिश करें कि प्रोटीन के लिए नेचुरल फूड्स ही खाएं. लेकिन फिर भी आपके डॉक्टर रिकमेंड करते हैं तो ही आप सप्लीमेंट्स की ओर जाएं.'
जितेन्द्र कहते हैं, 'नैचुरल फूड हमेशा बेहतर होते हैं. अगर आप अपना सारा प्रोटीन नैचुरल चीजों से ले सकते हैं तो आपको उसी पर टिके रहना चाहिए.'
कोच शिर्के ने कहा, 'मेरे जितने भी सेलेब्रिटी क्लाइंट हैं, मैं कोशिश करता हूं कि नेचुरल सोर्स से ही उनकी प्रोटीन की जरूरत पूरी करूं. लेकिन फिर भी जरूरत पड़ती है तो काफी रिसर्च के बाद हम किसी सप्लीमेंट को एड करते हैं. मेरी सलाह है कि कमर्शिअल प्रोडक्ट की अपेक्षा नेचुरल प्रोडक्ट लें.'

नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन की रिपोर्ट के मुताबिक, हर चीज में प्रोटीन की क्वांटिटी बढ़ा देने से उसकी सही न्यूट्रिशन प्रोफाइल इम्बैलेंस हो सकती है. उदाहरण के लिए समझिए जब किसी ब्रेड, बिस्किट या स्नैक्स में प्रोटीन बढ़ाया जाता है तो अक्सर फाइबर और कॉम्प्लेक्स कार्ब्स कम हो जाते हैं. इससे पाचन कमजोर होता है, कब्ज और ब्लोटिंग की दिक्कत बढ़ सकती है.
टेस्ट और टेक्सचर बनाए रखने के लिए कई कंपनियां शुगर, सैचुरेटेड फैट या एडिटिव्स जोड़ देती हैं. नतीजा, प्रोटीन के नाम पर अनावश्यक कैलोरी और वजन बढ़ने का जोखिम रहता है. फोकस सिर्फ प्रोटीन पर रहने से आयरन, कैल्शियम, मैग्नीशियम और बी-विटामिन्स जैसे जरूरी माइक्रोन्यूट्रिएंट्स पीछे छूट जाते हैं.
MDPI की रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि लगातार प्रोसेस्ड हाई-प्रोटीन फूड लेने से अच्छे बैक्टीरिया कम हो सकते हैं, जिससे इम्युनिटी और मेटाबॉलिज्म प्रभावित होता है.
EatingWell के मुताबिक, प्रोटीन जरूरी है, लेकिन हर चीज को हाई प्रोटीन बना देना समाधान नहीं. सही सेहत के लिए प्रोटीन, कार्ब्स, फैट, फाइबर और माइक्रोन्यूट्रिएंट्स, सबका बैलेंस जरूरी है.

फिटनेस एक्सपर्ट जितेन्द्र कहते हैं, 'कोई भी प्रोडक्ट जिसका प्रोटीन से कैलोरी का अनुपात अच्छा हो, वह कम प्रोटीन और ज़्यादा कैलोरी वाले प्रोडक्ट का एक अच्छा विकल्प है. अधिक कैलोरी और कम प्रोटीन और फिर भी उन्हें 'हाई प्रोटीन' कहना सिर्फ मार्केटिंग है. प्रोटीन से कैलोरी का अनुपात ज़रूरी है. फाइबर जरूरी है. ट्रांस फैट से सावधान रहें. हर बैच के लिए लैब रिपोर्ट्स देखें.
कोई भी प्रोडक्ट खरीदने से पहले उसका न्यूट्रिशन लेबल जरूर पढ़ें ताकि आप समझ सकें कि उसमें क्या-क्या मिला हुआ है. किसी प्रोडक्ट में कितना ज्यादा प्रोटीन है, केवल इस आधार पर कभी न खरीदें.
कई हाई प्रोटीन प्रोडक्ट्स में आर्टिफिशियल स्वीटनर भारी मात्रा में मिलाए जाते हैं. फिटनेस एक्सपर्ट जितेन्द्र ने इस बारे में कहा, हालांकि सभी आर्टिफिशियल स्वीटनर खराब नहीं होते. कई का सुरक्षा रिकॉर्ड काफी अच्छा है.
कोच शिर्के कहते हैं, 'मेरी सलाह है कि हाई प्रोटीन चीजों के चक्कर में कई बार आप न्यूट्रिशन लेबल नहीं देखते हैं. उसमें चीनी, कैलोरीज और फैट भी काफी मात्रा में होते हैं जो सेहत के लिए अच्छे नहीं है. कई प्रोडक्ट्स चीनी को एडेड शुगर में मेंशन नहीं करते बल्कि अलग-अलग तरीके से लिखते हैं.'
ग्लूकोज सिरप, फ्रुक्टोज, माल्टोडेक्सट्रिन, इनवर्ट शुगर और फ्रूट जूस कंसंट्रेट जैसे शब्द दिखें तो समझिए कि प्रोडक्ट में छुपी हुई शुगर मौजूद है, भले ही पैकेट पर 'हाई प्रोटीन' लिखा हो.