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लाइफस्टाइल न्यूज़

Covid-19: घर में रहकर रिकवर करने वाले कोरोना मरीजों के लिए आई राहत भरी खबर

द लैंसेट की नई स्टडी
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देश भर में हर दिन कोरोना के नए आंकड़े सामने आ रहे हैं. हर जगह के अस्पताल मरीजों से भरे पड़े हैं. कोरोना की दूसरी लहर में मरीजों को ठीक होने में काफी वक्त लग जा रहा है. हालांकि, कोरोना के तमाम मरीज होम आइसोलेशन में रहते हुए ठीक भी हो रहे हैं.

द लैंसेट की नई स्टडी
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एक नई स्टडी में अस्पताल में भर्ती ना होने वाले इन मरीजों के लिए राहत की खबर आई है. मेडिकल जर्नल द लैंसेट की स्टडी में दावा किया गया है कि Covid-19 के जो मरीज अस्पताल में भर्ती नहीं होते हैं, उनमें इस वायरस का लॉन्ग टर्म गंभीर इफेक्ट कम होता है. 
 

द लैंसेट की नई स्टडी
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स्टडी में कहा गया है कि अस्पताल में भर्ती ना होने वाले कोरोना के मरीजों में गंभीर दीर्घकालिक प्रभाव का खतरा कम होता है, हालांकि इन्हें बार-बार किसी ना किसी इंफेक्शन को लेकर डॉक्टर के पास जाने की जरूरत पड़ती है.
 

द लैंसेट की नई स्टडी
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स्टडी में कहा गया है, 'SARS-CoV-2 से संक्रमित होने के बाद जिन्हें अस्पताल में भर्ती होने की कम जरूरत पड़ती है, उनमें कोरोना से ठीक होने के बाद होने वाले गंभीर खतरे की संभावना बहुत कम होती है. हालांकि ये लोग Covid-19 से जुड़ी किसी ना किसी समस्या को लेकर अस्पताल के चक्कर लगाते रहते हैं.'
 

द लैंसेट की नई स्टडी
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स्टडी के अनुसार, भले ही अस्पताल में भर्ती ना होने वाले मरीजों को आगे चलकर कोई गंभीर खतरा नहीं होता है लेकिन इनमें कुछ दिनों के बाद थ्रोम्बोएम्बोलिज्म की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है.

द लैंसेट की नई स्टडी
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कोरोना के कई मरीज ठीक होने के 2 हफ्ते से लेकर 6 महीने के बाद तक ब्रोन्कोडायलेटर थेरेपी की जरूरत से लेकर डिस्पनिया तक की शिकायत लेकर वापस अस्पताल आ रहे हैं.
 

द लैंसेट की नई स्टडी
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स्टडी के अनुसार भले ही घर पर ठीक होने वाले कोरोना के मरीजों को आगे चल कर इसका कोई गंभीर खतरा ना हो लेकिन बार-बार डॉक्टर के पास जाने की जरूरत ये बताता है कि ये वायरस शरीर में कोई ना कोई लक्षण छोड़ जाता है.
 

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आपको बता दें कि इससे पहले कई स्टडीज में ये दावा किया जा चुका है कि कोरोना के मरीजों पर इस बीमारी का असर लंबे समय तक रहता है. इन मरीजों में कई तरह की मानसिक बीमारी, दिल से जुड़ी बीमारी, डायबिटीज की शिकायत और कमजोरी जैसे लक्षण देखे जा रहे हैं.