सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु को लेकर जो गाइडलाइंस जारी की थी, उसमें बदलाव करने को तैयार हो गया है. इस मामले में मंगलवार को सुनवाई हुई. सुनवाई के दौरान स्टीफन हॉकिंग (Stephen Hawking) और माइकल शूमाकर (Michael Schumacher) का जिक्र भी हुआ.
दरअसल, साल 2018 में तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली बेंच ने इच्छामृत्यु और लिविंग विल को लेकर गाइडलाइंस जारी की थीं. अब इन गाइडलाइंस में संशोधन की मांग को लेकर एक याचिका दायर हुई है, जिस पर जस्टिस केएम जोसेफ की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संवैधानिक बेंच सुनवाई कर रही है.
बेंच ने कहा कि सरकार को एक कानून बनाना चाहिए, ताकि गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीज अपना इलाज रुकवा सकें और इच्छामृत्यु ले सकें. हालांकि, अदालत 2018 की गाइडलाइंस में भी संशोधन को तैयार हो गई.
इसी दौरान जस्टिस अनिरुद्ध बोस ने जाने-माने वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग का जिक्र किया. वहीं, याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट अरविंद दतार ने माइकल शूमाकर की बात छेड़ी. माइकल शूमाकर सात बार के फॉर्मूला-1 रेसिंग कार के चैम्पियन हैं.
इनका जिक्र क्यों हुआ?
जस्टिस अनिरुद्ध बोस मेडिकल साइंस की तरक्की के बारे में बात कर रहे थे. उन्होंने कहा कि 'अगर हम स्टीफन हॉकिंग का करियर देखें तो बहुत पहले ही उनके बारे में भविष्यवाणी कर दी गई थी.'
दरअसल, स्टीफन हॉकिंग एक ऐसी बीमारी से पीड़ित थे, जिससे उनके शरीर के कई हिस्सों पर लकवा मार गया था. 14 मार्च 2018 को 76 साल की उम्र में उनका निधन हो गया था. वो एमियोट्रोफिक लेटरल सिलेरोसिस से जूझ रहे थे.
सुनवाई के दौरान सीनियर एडवोकेट अरविंद दतार ने कहा कि वो एक ऐसे व्यक्ति को जानते हैं जो 21 साल बाद ठीक हुआ था.
उन्होंने कहा, 'माइकल शूमाकर की तरह, वो अभी भी कोमा में है. हम नहीं जानते कि क्या होगा. अगर कुछ स्टेम सेल उसे फिर से जीवित कर देंगे. वो अभी भी जिंदा है.'
इस पर बेंच ने कहा, 'एक आम इंसान के लिए जो गंभीर बीमारी है, वो माइकल शूमाकर के लिए गंभीर नहीं है.'
पांच जजों की बेंच में जस्टिस केएम जोसेफ और जस्टिस अनिरुद्ध बोस के अलावा जस्टिस ऋषिकेश रॉय, जस्टिस अजय रस्तोगी और जस्टिस सीटी रविकुमार शामिल हैं.
माइकल शूमाकर का दिसंबर 2013 में खतरनाक एक्सीडेंट हो गया था. इसके बाद वो कई महीनों के लिए कोमा में चले गए थे.
क्या था 2018 का सुप्रीम कोर्ट का फैसला?
9 मार्च 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने 'इच्छामृत्यु' को मंजूरी दे दी थी. सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि व्यक्ति को गरिमा के साथ मरने का अधिकार है.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, अगर कोई व्यक्ति गंभीर बीमारी से जूझ रहा है और लंबे समय से बेहोश है तो वो 'लिविंग विल' तैयार कर इलाज से मना कर सकता है और गरिमा के साथ मर सकता है.
कोर्ट ने इसके लिए 'पैसिव यूथेनेशिया' शब्द का इस्तेमाल किया था. इसका मतलब था कि किसी बीमार व्यक्ति का इलाज रोक देना ताकि उसकी मौत हो जाए.
तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली बेंच ने 'इच्छामृत्यु' पर गाइडलाइंस जारी करते हुए कहा था कि ये तब तक लागू रहेंगी, जब तक संसद इस पर कोई कानून नहीं बनाती.
ये फैसला कॉमन कॉज नाम के एनजीओ की ओर से दाखिल याचिका पर आया था. इसमें एनजीओ ने मरणासन्न मरीजों को इच्छामृत्यु की इजाजत देने की मांग की थी.