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बेमौसम बारिश के पीछे क्या वजह है? बिल गेट्स नहीं, जानिए असली कारण

पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया और हजारों व्हाट्सऐप ग्रुप्स में एक कहानी तेजी से फैलने लगी. सवाल उठाया गया-क्या यही वजह है कि पिछले हफ्ते इतनी तेज बारिश हुई? बताया जाने लगा कि साल 2007 से बिल गेट्स एक अलग तरह के विज्ञान यानी सोलर जियोइंजीनियरिंग में निवेश कर रहे हैं, और इसी को इस बारिश से जोड़कर देखा जाने लगा.जानें क्या है सच.

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इन दावों में 'SCoPEx' प्रोजेक्ट का भी जिक्र किया जा रहा है (Photo:PTI and File Photo)
इन दावों में 'SCoPEx' प्रोजेक्ट का भी जिक्र किया जा रहा है (Photo:PTI and File Photo)

सोशल मीडिया आज ऐसी जगह बन चुका है, जहां कई बार सच से ज्यादा अफवाहें तेजी से फैलती हैं. इन दिनों इसका निशाना बना है मौसम. मार्च के महीने में देश के कई हिस्सों में हुई बारिश और ठंडे मौसम ने लोगों को हैरान किया है. लेकिन जहां एक तरफ लोग मौसम का आनंद ले रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ इंटरनेट पर इसे लेकर तरह-तरह के दावे वायरल हो रहे हैं.

इंस्टाग्राम, रेडिट और अन्य प्लेटफॉर्म पर कई पोस्ट में दावा किया जा रहा है कि यह बारिश प्राकृतिक नहीं, बल्कि 'आर्टिफिशियल रेन' है. कुछ यूजर्स इसे तथाकथित 'क्लाइमेट एक्सपेरिमेंट' से जोड़ रहे हैं और इसमें बिल गेट्स का नाम भी घसीटा जा रहा है.

वायरल वीडियो में कहा जा रहा है कि “सोलर जियोइंजीनियरिंग” के जरिए मौसम को नियंत्रित किया जा रहा है. दावा यह भी है कि विमान से कैल्शियम कार्बोनेट जैसे कण छोड़े जा रहे हैं, ताकि सूरज की रोशनी को कम किया जा सके और तापमान घटाया जा सके. कुछ पोस्ट में तो यह तक कहा गया कि अब मौसम कुदरत नहीं, बल्कि निजी कंपनियां नियंत्रित कर रही हैं.

इन दावों में 'SCoPEx' प्रोजेक्ट का भी जिक्र किया जा रहा है. सोशल मीडिया पर यह धारणा बनाई जा रही है कि भारत को इन प्रयोगों के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है और हाल की बारिश इसका सबूत है.

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 क्या है SCoPEx प्रोजेक्ट?

SCoPEx (Stratospheric Controlled Perturbation Experiment) एक वैज्ञानिक रिसर्च प्रोजेक्ट है, जिसका उद्देश्य यह समझना है कि क्या सूरज की कुछ रोशनी को वापस अंतरिक्ष में भेजकर पृथ्वी के तापमान को कम किया जा सकता है.

यह 'सोलर जियोइंजीनियरिंग' से जुड़ा विचार है. इसके तहत वैज्ञानिक स्ट्रैटोस्फेयर में बहुत कम मात्रा में कण छोड़कर उनके प्रभाव का अध्ययन करना चाहते थे. ध्यान देने वाली बात यह है कि यह केवल रिसर्च स्तर का प्रयोग है, न कि बड़े पैमाने पर मौसम बदलने की कोई योजना.

यह प्रोजेक्ट हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों द्वारा शुरू किया गया था और इसे लेकर कई तरह की बहस भी हुई. पर्यावरणीय चिंताओं के कारण इसे आगे बढ़ाने पर रोक भी लगाई गई. साफ है.यह कोई 'सीक्रेट वेदर कंट्रोल प्रोजेक्ट' नहीं है.

असली वजह क्या है?

मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, दिल्ली-एनसीआर समेत उत्तर भारत में हालिया बारिश और ठंडक की असली वजह वेस्टर्न डिस्टर्बेंस (पश्चिमी विक्षोभ) है.यह एक सामान्य मौसम प्रणाली है, जो पश्चिमी देशों से चलकर भारत तक पहुंचती है और बारिश, बादल व ठंडी हवाएं लेकर आती है.

इस बार का वेस्टर्न डिस्टर्बेंस थोड़ा अलग रहा. इसमें एक लंबी लो-प्रेशर लाइन बनी, जो अफगानिस्तान से पाकिस्तान होते हुए भारत तक फैली. इसी कारण मार्च में भी बारिश और तापमान में गिरावट देखने को मिली.

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अफवाह बनाम सच

जहां एक तरफ यह प्राकृतिक मौसम बदलाव है, वहीं दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर इसे लेकर कॉन्स्पिरेसी थ्योरीज तेजी से फैल रही हैं. कई यूजर्स इन दावों को बिना जांचे-परखे आगे बढ़ा रहे हैं.हालिया बारिश और ठंडक पूरी तरह प्राकृतिक कारणों से हुई है. इसे किसी 'क्लाइमेट एक्सपेरिमेंट' या 'आर्टिफिशियल रेन' से जोड़ना भ्रामक है. ऐसे में जरूरी है कि सोशल मीडिया पर फैल रही जानकारी को समझदारी से परखा जाए और तथ्यों पर भरोसा किया जाए.

वेस्टर्न डिस्टर्बेंस (पश्चिमी विक्षोभ) क्या है?

पश्चिमी विक्षोभ एक प्राकृतिक मौसम प्रणाली है, जो भूमध्यसागर क्षेत्र के आसपास बनती है और पश्चिम से पूर्व की ओर बढ़ते हुए भारत तक पहुंचती है. यह अपने साथ नमी, बादल और ठंडी हवाएं लेकर आती है.जब यह प्रणाली अफगानिस्तान और पाकिस्तान के रास्ते उत्तर भारत में प्रवेश करती है, तो यहां की हवाओं से टकराकर बादल बनाती है. इसके कारण बारिश, ओलावृष्टि और पहाड़ी इलाकों में बर्फबारी होती है.

आमतौर पर पश्चिमी विक्षोभ सर्दियों के मौसम में ज्यादा सक्रिय रहता है, इसलिए दिसंबर से फरवरी के बीच उत्तर भारत में बारिश और बर्फबारी देखने को मिलती है. हालांकि इस बार यह मार्च में भी सक्रिय रहा, जिससे मौसम में अचानक बदलाव आया और गर्मी के बीच ठंडक महसूस हुई.

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इसका असर शहरों और गांवों पर अलग-अलग पड़ता है. जहां शहरों में यह गर्मी से राहत देता है, वहीं किसानों के लिए यह कभी-कभी नुकसानदायक साबित होता है, क्योंकि तेज बारिश और ओले फसलों को खराब कर सकते हैं.
 

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