क्या आपने भी कभी किसी ऐसे इंसान को देखा है जो बहुत कम बोलता है? वह बेवजह बातें नहीं करता, भीड़ में भी शांत रहता है और अक्सर सिर्फ मुस्कुराकर अपनी बात कह देता है. ऐसे लोगों को देखकर कई लोग तुरंत अपनी राय बना लेते हैं. कोई उन्हें घमंडी कह देता है, कोई शर्मीला समझता है, तो किसी को लगता है कि उन्हें किसी से मिलना-जुलना पसंद नहीं है.
लेकिन सच्चाई इससे बिल्कुल अलग हो सकती है. कम बोलने का मतलब यह नहीं कि किसी इंसान के पास कहने के लिए कुछ नहीं है. कई बार ऐसे लोग सबसे ज्यादा सोचते हैं, हर बात को ध्यान से समझते हैं और फिर जरूरत पड़ने पर ही अपनी बात रखते हैं. यही वजह है कि मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि हर इंसान का स्वभाव अलग होता है. कुछ लोगों को लोगों के बीच रहना अच्छा लगता है, जबकि कुछ लोग शांति और अकेले समय में ज्यादा सहज महसूस करते हैं. इसलिए किसी के कम बोलने को उसकी कमजोरी या घमंड समझने की बजाय उसके स्वभाव को समझना ज्यादा जरूरी है. आइए जानते हैं कि कम बोलने वाले लोगों में कौन-सी ऐसी खास बातें होती हैं, जो उन्हें दूसरों से अलग बनाती हैं.
क्या कम बोलने वाले लोग ज्यादा सोचते हैं?
इस सवाल का एक ही जवाब सभी लोगों पर लागू नहीं होता. हर शांत व्यक्ति एक जैसा नहीं होता. लेकिन मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि कई शांत स्वभाव के लोग बोलने से पहले ज्यादा सोचते हैं. वे हर बात पर तुरंत प्रतिक्रिया देने की बजाय पहले उसे समझते हैं, फिर जवाब देते हैं. यानी बाहर से वे शांत दिख सकते हैं, लेकिन उनके दिमाग में विचारों की कमी नहीं होती.
कार्ल युंग की एक मशहूर थ्योरी क्या कहती है?
मशहूर मनोवैज्ञानिक कार्ल जंग ने लोगों के स्वभाव को समझाने के लिए इंट्रोवर्ट और एक्स्ट्रोवर्ट की बात कही थी. उनके मुताबिक, कुछ लोगों को दूसरों के साथ रहना, बातचीत करना और लोगों के बीच समय बिताना अच्छा लगता है. ऐसे लोगों को एक्स्ट्रोवर्ट कहा जाता है.
वहीं कुछ लोगों को अकेले समय बिताना, किताब पढ़ना, शांति से सोचना या शांत माहौल में रहना ज्यादा पसंद होता है. ऐसे लोगों को इंट्रोवर्ट कहा जाता है. सबसे जरूरी बात यह है कि इंट्रोवर्ट होना कोई बीमारी, कमी या कमजोरी नहीं है. यह सिर्फ किसी व्यक्ति का स्वभाव होता है और हर इंसान का स्वभाव अलग-अलग हो सकता है.
इसका मतलब यह भी नहीं कि हर कम बोलने वाला इंसान इंट्रोवर्ट ही होगा. कुछ लोग स्वभाव से शांत होते हैं, कुछ परिस्थिति के कारण कम बोलते हैं और कुछ सिर्फ जरूरत पड़ने पर ही बोलना पसंद करते हैं.
उनके दिमाग में आखिर चलता क्या है?
मान लीजिए आप किसी मीटिंग में बैठे हैं. कुछ लोग तुरंत अपनी राय रख देते हैं. वहीं एक व्यक्ति पूरे समय चुप रहता है. आपको लग सकता है कि वह कुछ सोच ही नहीं रहा. लेकिन हो सकता है कि वह व्यक्ति हर बात का विश्लेषण कर रहा हो. वह यह समझ रहा हो कि किस बात का क्या मतलब है, कौन सही है, कौन गलत है और उसे कब बोलना चाहिए. कई मनोवैज्ञानिक इसे डीप प्रोसेसिंग यानी किसी जानकारी को गहराई से समझने की प्रवृत्ति से जोड़ते हैं. ऐसे लोग कई बार कम बोलते हैं, लेकिन जब बोलते हैं तो सोच-समझकर बोलते हैं.
जैसे मान लीजिए- एक कंपनी में दो कर्मचारी थे. पहला कर्मचारी हर मीटिंग में सबसे ज्यादा बोलता था. हर सवाल का जवाब तुरंत देता था. दूसरा कर्मचारी ज्यादातर समय चुप रहता था. लोग सोचते थे कि शायद उसे ज्यादा जानकारी नहीं है. एक दिन कंपनी के सामने एक बड़ी समस्या आ गई. सभी लोग अपनी-अपनी राय दे रहे थे, लेकिन कोई समाधान नहीं निकल रहा था. तभी वह शांत रहने वाला कर्मचारी बोला. उसने पूरे मामले को एक अलग नजरिए से समझाया और ऐसा समाधान दिया जिसे सभी ने मान लिया. मीटिंग खत्म होने के बाद लोगों को समझ आया कि वह चुप इसलिए नहीं था क्योंकि उसे कुछ पता नहीं था. वह इसलिए शांत था क्योंकि वह पहले पूरी बात समझना चाहता था. यही वजह है कि कई बार कम बोलने वाले लोगों को लोग देर से समझ पाते हैं.
क्या कम बोलने वाले लोग ज्यादा बुद्धिमान होते हैं?
ऐसा कहना बिल्कुल सही नहीं होगा. बुद्धिमानी का सीधा संबंध इस बात से नहीं है कि कोई कितना बोलता है. बहुत बोलने वाले लोग भी बेहद समझदार हो सकते हैं और कम बोलने वाले लोग भी. असल फर्क सोचने के तरीके, अनुभव, सीखने की इच्छा और निर्णय लेने की क्षमता से पड़ता है. इसलिए सिर्फ किसी के शांत रहने से उसके बारे में कोई बड़ा निष्कर्ष निकालना सही नहीं है.
कम बोलने की वजह हमेशा एक जैसी नहीं होती
हर शांत इंसान के पीछे अलग कारण हो सकता है. कोई स्वभाव से शांत होता है. कोई नए लोगों के बीच सहज महसूस नहीं करता. कोई पहले लोगों को समझना चाहता है. कोई अपने शब्दों को बहुत महत्व देता है और कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिन्हें बेवजह की बहस या गपशप पसंद नहीं होती. इसलिए हर कम बोलने वाले व्यक्ति को एक ही नजर से देखना सही नहीं है.
क्या ज्यादा सोचना भी हो सकता है कारण?
कई बार ऐसा भी होता है कि कुछ लोग किसी बात को जरूरत से ज्यादा सोचते रहते हैं. मनोविज्ञान में इसे ओवरथिंकिंग कहा जाता है. ऐसे लोग बोलने से पहले कई बार सोचते हैं कि सामने वाला क्या सोचेगा, मेरी बात सही लगेगी या नहीं, कहीं मैं गलत तो नहीं बोल दूंगा. इस वजह से वे कई बार चुप रहना ही बेहतर समझते हैं. हालांकि हर शांत व्यक्ति ओवरथिंकर हो, ऐसा भी जरूरी नहीं है.
हमें ऐसे लोगों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए?
साइकोलॉजिस्ट स्नेहा शर्मा कहती हैं कि अगर आपके आसपास कोई कम बोलता है, तो यह मानने की गलती न करें कि उसे किसी से मतलब नहीं है या वह घमंडी है. उसे अपनी बात कहने का समय दीजिए. उसकी बात बीच में मत काटिए. कई बार ऐसे लोग कम शब्दों में बहुत महत्वपूर्ण बात कह देते हैं. हर इंसान का व्यक्तित्व अलग होता है. कोई अपनी बात खुलकर कहता है, तो कोई पहले सुनना पसंद करता है. दोनों ही तरीके सामान्य हैं.
आखिर में कम बोलने वाले लोगों के दिमाग में भी उतने ही विचार चल सकते हैं, जितने किसी और के. फर्क सिर्फ इतना है कि वे हर विचार को शब्दों में बदलना जरूरी नहीं समझते. मनोविज्ञान भी यही कहता है कि किसी इंसान को सिर्फ इस आधार पर नहीं परखना चाहिए कि वह कितना बोलता है. उसके व्यवहार, सोच और परिस्थितियों को समझना ज्यादा जरूरी है. इसलिए अगली बार जब आपको कोई शांत और कम बोलने वाला व्यक्ति मिले, तो तुरंत उसके बारे में राय बनाने की बजाय उसे समझने की कोशिश कीजिए. हो सकता है, वह सबसे कम बोलता हो, लेकिन सबसे ज्यादा सोचता हो.