‘गांव में शादियां नहीं हो रही हैं, अगर सिर्फ बेटी और एक व्यक्ति को भी वीजा मिल जाए तो यहां आकर शादी करके चले जाएं. मगर वीजा बंद होने से शादी-ब्याह भी बंद हो गए हैं.’
पाकिस्तान के हिंदू परिवारों में बेटिंयां शादी के लिए तैयार हैं, शादी के जोड़े संभालकर रखे हैं. बस भारत में दूल्हे के सेहरा बांधने का इंतजार है. दोनों तरफ परिवार हर सुबह यही सोचकर उठते हैं कि शायद आज वीजा खुल जाए... शायद आज सरहद पार करने की इजाजत मिल जाए... और लंबे वक्त से अटकी शादी आखिर पूरी हो जाए.
ये कहानी है भारत-पाकिस्तान की सीमा पर रहने वाले हजारों सोढ़ा राजपूत परिवारों की, जिनके लिए सरहद कभी सिर्फ नक्शे पर खींची गई एक लकीर थी.बेटियां सिंध से भारत आती थीं, बारातें बाड़मेर और जैसलमेर से पाकिस्तान जाती थीं. सरहद के दोनों ओर बसे एक ही समाज की परंपरा निभाई जाती थी. लेकिन अब यह परंपरा भी सरहद पर आकर ठहर गई है.
पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत-पाकिस्तान के बीच वीजा सेवाएं और सीमा पार आवाजाही लगभग पूरी तरह बंद हो गई. इसका सबसे बड़ा असर उन हिंदू सोढ़ा राजपूत परिवारों पर पड़ा है, जिनकी सदियों पुरानी वैवाहिक परंपरा दोनों देशों के बीच जुड़ी हुई है.
करीब 250 शादियां सिर्फ वीजा की वजह से रुकी हुई हैं
पाकिस्तान से भारत आकर बसे दिलीप सिंह सोढ़ा बताते हैं कि इस समय करीब 250 युवक-युवतियों की शादियां सिर्फ इसलिए अटकी हुई हैं क्योंकि उन्हें भारत आने का वीजा नहीं मिल पा रहा है.
'करीब 250 लड़के-लड़कियां ऐसे हैं जिनकी शादियां सिर्फ वीजा नहीं मिलने की वजह से रुकी हुई हैं. अगर सरकार परमिशन दे दे तो ये लोग तुरंत भारत आ जाएंगे और शादियां हो जाएंगी.' — दिलीप सिंह सोढ़ा

'बस बेटी और एक आदमी को आने दो...'
दिलीप सिंह कहते हैं कि अब परिवारों की मांग भी बहुत छोटी रह गई है.
'पहले पूरा परिवार आता था. अब लोग सिर्फ इतना चाहते हैं कि लड़की और परिवार का एक सदस्य आ जाए, ताकि शादी हो सके. लेकिन फिलहाल वह भी संभव नहीं है.' — दिलीप सिंह सोढ़ा
उनके मुताबिक, पहलगाम हमले के बाद अटारी बॉर्डर बंद होने से हालात और खराब हो गए हैं.
दूल्हा पाकिस्तान पहुंचा... लेकिन शादी नहीं हो सकी
हाल ही में राजस्थान के बाड़मेर के एक युवक की शादी पाकिस्तान में तय हुई थी. वह अटारी बॉर्डर के रास्ते पाकिस्तान जाने निकला, लेकिन सुरक्षा कारणों से उसे सीमा से ही वापस लौटा दिया गया. बाद में उसने दुबई के रास्ते पाकिस्तान पहुंचने की कोशिश की. कराची तक पहुंचा भी, लेकिन परिस्थितियां ऐसी बनीं कि शादी नहीं हो सकी और उसे वापस लौटना पड़ा.
यह सिर्फ एक युवक की कहानी नहीं है. ऐसे सैकड़ों परिवार आज इसी दर्द से गुजर रहे हैं.

क्यों सिर्फ सोढ़ा समाज सबसे ज्यादा प्रभावित है?
सीमा के दोनों ओर राठौड़, चौहान, भाटी और सोढ़ा समेत कई राजपूत समुदाय रहते हैं. लेकिन सबसे ज्यादा परेशानी सोढ़ा राजपूतों को हो रही है. पाकिस्तान में भारतीय सीमा से लगते उमरकोट, थारपारकर और सांघार इलाक़ों में सोढ़ा हिंदू राजपूतों के हज़ारों परिवार रहते हैं.
सोढ़ा राजपूतों की कई शाखाएं और गोत्र हैं. इनमें प्रमुख रूप से राम सोढ़ा, वीरसी (बेरसी) सोढ़ा, गंगदास सोढ़ा और सूरतान सोढ़ा शामिल हैं. राजपूत परंपरा के अनुसार एक ही गोत्र में विवाह नहीं किया जाता.
समस्या यह है कि पाकिस्तान में इन गोत्रों के परिवार बहुत कम बचे हैं, जबकि दूसरे गोत्रों के परिवार बड़ी संख्या में राजस्थान और गुजरात में रहते हैं. इसलिए पीढ़ियों से पाकिस्तान के सोढ़ा राजपूत अपनी बेटियों की शादी भारत में ही करते रहे हैं.
यही वजह है कि जब सीमा बंद होती है तो सिर्फ लोगों का आना-जाना नहीं रुकता, बल्कि पूरी विवाह व्यवस्था ठहर जाती है.

पहले मिलता था स्पेशल प्रोविजन
इतिहास बताता है कि अमरकोट (उमरकोट) में सोढ़ा राजपूतों का शासन 12वीं सदी से रहा है. तभी से उनके वैवाहिक रिश्ते वर्तमान राजस्थान के राजपूत घरानों से होते रहे हैं.
1947 के विभाजन ने सीमा जरूर खींच दी, लेकिन रिश्ते नहीं तोड़े. सालों तक दोनों देशों के सोढ़ा परिवार परमिट और बाद में वीजा के जरिए एक-दूसरे के यहां शादी-ब्याह में आते-जाते रहे.1965 के युद्ध के बाद नियम सख्त हुए, लेकिन परंपरा फिर भी चलती रही.
समुदाय के लोगों के मुताबिक, उनकी इस विशेष सामाजिक परिस्थिति को देखते हुए भारत सरकार ने पहले अलग व्यवस्था भी बनाई थी.
वर्ष 2007 में तत्कालीन राजस्थान के राज्यपाल एस. के. सिंह की पहल पर पाकिस्तान से आने वाले सोढ़ा राजपूतों को छह महीने तक भारत में रहने और जरूरत पड़ने पर अवधि बढ़वाने की अनुमति दी गई थी. यह सुविधा करीब दस साल तक चलती रही और वर्ष 2017 तक स्थानीय एफआरआरओ (FRRO) कार्यालय से इसका विस्तार भी कराया जा सकता था.
इस व्यवस्था से परिवार आराम से रिश्ते तय कर लेते थे और शादियां हो जाती थीं. लेकिन बाद में यह सुविधा समाप्त हो गई और अब सामान्य वीजा नियम लागू हैं.
वीजा मिलना भी आसान नहीं रहा
दिलीप सिंह बताते हैं कि पहले बैंक स्टेटमेंट और सामान्य दस्तावेजों के आधार पर वीजा मिल जाता था.
'अब पहले ए-ग्रेड अधिकारी की मंजूरी लेनी पड़ती है. अधिकारी अनुमति नहीं देते, इसलिए वीजा मिलना बहुत मुश्किल हो गया है.' — दिलीप सिंह सोढ़ा
उनके मुताबिक, अगर कोई पाकिस्तान जाना भी चाहता है तो अब उसे दुबई जैसे तीसरे देश के रास्ते जाना पड़ता है. इतनी महंगी यात्रा हर परिवार के बस की बात नहीं है.
एक शादी नहीं... कई पीढ़ियां प्रभावित हो रही हैं
सोढ़ा समाज के लोग कहते हैं कि यह सिर्फ शादी रुकने का मामला नहीं है. अगर एक पीढ़ी समय पर विवाह नहीं कर पाएगी तो आने वाले वर्षों में पूरे समाज की पारिवारिक संरचना प्रभावित होगी. रिश्ते टूटेंगे, नए रिश्ते नहीं बन पाएंगे और सदियों पुरानी सामाजिक व्यवस्था कमजोर पड़ जाएगी.
सरहद के इस पार सिर्फ इंतजार है... उस पार भी इंतजार है
आज राजस्थान के बाड़मेर, जैसलमेर, बीकानेर और जोधपुर में बैठे परिवार रोज फोन पर पाकिस्तान में अपने रिश्तेदारों से बात करते हैं.
उधर से एक ही सवाल आता है—"वीजा खुला क्या?" और इधर से हर बार वही जवाब जाता है—"अभी नहीं..." बस इसी "अभी नहीं" ने करीब 250 शादियों को रोक रखा है.
इन परिवारों को राजनीति नहीं चाहिए, बहस नहीं चाहिए. उन्हें सिर्फ इतना चाहिए कि उनकी बेटियां अपने घर चली जाएं, बेटे अपनी दुल्हन को ले आएं और सदियों से चली आ रही एक परंपरा फिर से सांस ले सके.