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जब एक तरबूज के लिए छिड़ी जंग... दो सेना में हुआ युद्ध, मारे गए थे कई सैनिक!

राजस्थान में प्रचलित 'मतीरे री राड़' का किस्सा काफी रोचक है. क्योंकि, यह कहानी एक ऐसे जंग की है जो सिर्फ एक तरबूज के लिए लड़ी गई थी. चलिए जानते हैं क्या है यह पूरा किस्सा.

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'मतीरे की राड़', एक तरबूज के लिए दो रियासतों के बीच हुई जंग की कहानी (Photo - AI Generated)
'मतीरे की राड़', एक तरबूज के लिए दो रियासतों के बीच हुई जंग की कहानी (Photo - AI Generated)

सेंट्रल अफ्रीका के देश चाड में पानी को लेकर शुरू हुआ एक छोटा सा विवाद  इतना बड़ा हो गया कि सेना उतारनी पड़ी. इन दिनों यह घटना चर्चा में है. कुछ ऐसी ही घटना राजस्थान में सैकड़ों साल पहले हुई थी, जिसे आज 'मतीरे री राड़' के नाम से जाना जाता है. 

'मतीरे री राड़' राजस्थान में प्रचलित सदियों पुरानी ऐतिहासिक घटना पर आधारित एक कहानी है. राजस्थान में आज भी जब हक की लड़ाई की बात होती है, तो 'मतीरे री राड़' की मिसाल दी जाती है. यह कहानी काफी रोचक है. ऐसे में जानते हैं कि इसका पूरा किस्सा क्या है और आज भी यह क्यों कही-सुनी जाती है?

राजस्थान में तरबूज को मतीरा कहा जाता है और राड़ का मतलब झगड़ा होता है. इस तरह 'मतीरे री राड़' का मतलब ही हुआ- तरबूज को लेकर लड़ाई. यह कहानी दो किसानों के बीच एक तरबूज को लेकर छिड़े विवाद से शुरू होती है. फिर यह कैसे दो रियासतों के राजाओं के बीच के जंग में तब्दील हो जाती है, यही इसकी मूल भावना है.   

कैसे एक छोटी लड़ाई युद्ध में तब्दील हुई
16वीं शताब्दी में काशी छंगानी नाम के रचनाकार ने छत्रपति रासो  लिखी थी. इसी में एक चर्चित किस्सा है - 'मतीरे की राड़'. इसमें बताया गया है कि एक तरबूज की वजह से बीकानेर के राजा करण सिंह और नागौर के राजा अमर सिंह के बीच युद्ध हुआ था. इस जंग में सैकड़ों लोगों ने जान गंवा दी थी. वो भी सिर्फ एक तरबूज के लिए.

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अब लोग सवाल करेंगे कि एक तरबूज के लिए जंग की क्या जरूरत थी. सिर्फ एक तरबूज की वजह से क्यों सैकड़ों लोगों ने जान गंवाई और तरबूज में ऐसा क्या था कि युद्ध लड़ना पड़ा. इन सारे सवालों के जवाब 'मतीरे की लड़ाई' नाम के इस किस्से में ही है. राजस्थान में आज भी इतिहास पढ़ाने वाले एक्सपर्ट टीचर्स अपने यूट्यूब क्लास में इस किस्से को बताते हुए हक की लड़ाई का महत्व बताते हैं. 

बीकानेर और नागौर रियासतों की सीमा पर दोनों तरफ के किसानों के खेत थे. एक तरफ बीकानेर का सिलवा गांव था, तो दूसरी तरफ नागौर का जाखणिया गांव. दोनों गांव के दो किसानों की खेत, दोनों रियासतों की सीमा से सटती हुई थी. सिलाव गांव के किसान ने अपने खेत में मतीरे यानी तरबूज की खेती की थी. सिलाव के किसान के खेत से तरबूज की लत (बेल) बढ़कर जाखणिया गांव के किसान की खेत तक फैल गई. उस बेल में जब तरबूज फला तो वह जाखणिया गांव के किसान की खेत में चला गया था. 

जब तरबूज पक गया तो जाखणिया के किसान ने उसे तोड़ लिया. उसका कहना था कि तरबूज की बेल उसके खेत में है तो फल भी उसी का होगा. वहीं सिलाव के किसान ने कहा कि तरबूज की बेल उसने लगाई है तो उस बेल में फला तरबूज पर भी उसी का हक है. इसको लेकर दोनों किसानों के बीच विवाद हो गया. फिर दोनों तरफ से गांव के लोग जमा हो गए और विवाद बढ़ गया. 

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दोनों ही ओर से ठीक वही तर्क दिया गया और दोनों गांव के लोग अपनी-अपनी बातों पर अड़े रहे और झगड़ा बढ़ता चला गया है. इस विवाद की जानकारी दोनों तरफ के रियासतों के राजाओं तक भी पहुंच गई. एक तरफ बीकानेर के राजा करण सिंह थे, तो दूसरी तरफ नागौर के राजा अमर सिंह थे.

इस जंग में किस किसान की हुई थी जीत 
दोनों राजा भी अपने-अपने किसान के पक्ष में सेना लेकर तैयार हो गए. बीकानेर के राजा करण सिंह का कहना था कि जब उसके किसान के खेत में उगी तरबूज की बेल में फल लगा था, तो उसे नागौर का किसान कैसे तोड़ सकता है. वहीं नागौर के राजा अमर सिंह ने कहा कि उसके किसान की खेत में तरबूज की बेल पहुंच गई थी और फल उस तरफ लगा, इसलिए उस पर हक जाखणिया के किसान का है. 

इसके बाद बीकानेर और नागौर की बीच भीषण युद्ध हुआ. इस जंग में बीकानेर के राजा करण सिंह की जीत हुई. इसके साथ ही जिस किसान के खेत में तरबूज की बेल लगी थी, फल पर हक भी उसी का हुआ. इस कहानी का निष्कर्ष यही था कि बीकानेर के राजा ने अपने एक किसान के हक की लड़ाई के लिए युद्ध में अपनी सेना झोंक दी. इस हक की लड़ाई को जीतकर उन्होंने किसान को उसके फल पर उसका अधिकार दिलाया. 

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इसलिए 'मतीरे की राड़' सिर्फ एक तरबूज की लिए की गई जंग नहीं थी. यह मूंछों की लड़ाई भी नहीं थी. इसे हक की लड़ाई से जोड़ा जाता है. इसलिए आज भी 'मतीरे की राड़' का किस्सा प्रासंगिक है और लोगों के बीच काफी प्रचलित है.

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