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भारत से लौटते समय हुई थी सिकंदर की मौत, 32 की उम्र में हार गया जिंदगी की जंग

आज के दिन ही सिकंदर की मृत्यु हुई थी. सिंकदर को उसके विश्वविजयी अभियान के लिए जाना जाता है, जो भारत तक आकर थम गया था. भारत की सीमा के पार से लौटने के बाद ही मेसिडोनिया जाने के रास्ते, बेबीलोन में उसकी मौत हो गई थी.

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बेबीलोन में हुई थी सिंकदर की मौत (Photo - Pexels)
बेबीलोन में हुई थी सिंकदर की मौत (Photo - Pexels)

11 जून 323 ईसू पूर्व  सिकंदर महान के नाम से लोकप्रिय  युवा मैसेडोनियाई राजा की बेबीलोन (वर्तमान इराक) में मौत हो गई थी. सिकंदर का साम्राज्य पूर्वी भूमध्य सागर से लेकर पाकिस्तान तक फैला हुआ था. जब सिकंदर की मौत हुई, उस वक्त उसकी उम्र 32 वर्ष थी. सिकंदर का जन्म मैसिडोनिया में राजा फिलिप द्वितीय और रानी ओलंपियास के घर हुआ था. उन्होंने प्रसिद्ध दार्शनिक अरस्तू से शिक्षा और अपने पिता से सैन्य प्रशिक्षण लिया था. 

16 वर्ष की आयु में सिकंदर ने अपनी पहली सेना का नेतृत्व करते हुए युद्ध में भाग लिया और दो वर्ष बाद अपने पिता की सेना के एक बड़े हिस्से की कमान संभाली, जिसने चेरोनिया की लड़ाई जीतकर ग्रीस को मैसिडोनियाई शासन के अधीन कर दिया. 336 ईसा पूर्व में फिलिप द्वितीय की हत्या कर दी गई और सिकंदर सिंहासन पर आसीन हुआ.

दो वर्ष बाद, युवा राजा सिकंदर ने अपने पिता की फारस पर विजय प्राप्त करने की योजना को पूरा करने के लिए एक विशाल सेना के साथ एशिया माइनर में प्रवेश किया. उसने एक भी युद्ध नहीं हारा, और 330 ईसा पूर्व तक पूरा फारस और एशिया माइनर उसके अधीन हो गया था.

सिकंदर विश्व के इतिहास के सबसे विशाल साम्राज्य का स्वामी था, फिर भी फारस से लौटने के तुरंत बाद उसने एक नया पूर्वी अभियान शुरू किया. 327 ईसा पूर्व तक उसने अफगानिस्तान और मध्य एशिया पर विजय प्राप्त कर ली थी. अगले वर्ष, आठ वर्षों के युद्ध के बाद थकी हुई उसकी सेना ने आगे बढ़ने से इनकार कर दिया, और सिकंदर अपनी सेना को भारत की सीमा से वापस ले आया. दुर्गम मकरान रेगिस्तान से होते हुए एक कठिन यात्रा पर घर वापसी पर निकला. 

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 बेबीलोन पहुंचकर, सिकंदर ने अपनी सेना को मिस्र वापस ले जाने के लिए एक विशाल बेड़ा बनाना शुरू किया. हालांकि, जून 323 ईसा पूर्व में, जब उसके जहाजों का निर्माण कार्य लगभग पूरा होने वाला था, सिकंदर बीमार पड़ गया और उसकी मृत्यु हो गई. शायद स्वयं को देवता मानकर (जैसा कि उसकी कई प्रजा मानती थी), उसने किसी उत्तराधिकारी का चयन नहीं किया था. उसकी मृत्यु के एक वर्ष के भीतर ही उसकी सेना और उसका साम्राज्य कई गुटों में बंट गए.

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