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जब बापू दांडी यात्रा पर निकले, ऐसे शुरू हुआ था नमक आंदोलन

आज ही के दिन ब्रिटिश शासन के नमक कानून के खिलाफ महात्मा गांधी ने दांडी मार्च निकाला था. उन्होंने साबरमती से दांडी तक पैदल यात्रा की थी और इस तरह नमक आंदोलन या सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत हुई थी.

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आज के दिन ही बापू ने शुरू की थी दांडी यात्रा (Photo - Getty)
आज के दिन ही बापू ने शुरू की थी दांडी यात्रा (Photo - Getty)

12 मार्च 1930 को देश के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ दांडी मार्च निकालकर नमक आंदोलन की शुरुआत की थी. अंग्रेजों ने नया नमक कानून लाया था, जिससे नमक पर ब्रिटिश एकाधिकार हो गया था. इसी के विरोध में गांधी जी ने नमक आंदोलन साबरमती से दांडी तक पदयात्रा निकालकर  सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत की थी. इसे नमक आंदोलन भी कहा जाता है. 

ब्रिटेन के नमक कानूनों ने भारतीयों को नमक इकट्ठा करने या बेचने से प्रतिबंधित कर दिया था.भारत के लोगों को जबरदस्ती अंग्रेजों से नमक खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ा, जिन्होंने नमक के उत्पादन और बिक्री पर एकाधिकार रखने के साथ-साथ भारी नमक कर भी लगाया था. 

इस नमक टैक्स से सबसे ज्यादा नुकसान भारत के गरीबों को हुआ, लेकिन भारतीयों को नमक की आवश्यकता थी. गांधीजी ने तर्क दिया कि नमक कानूनों का उल्लंघन करना कई भारतीयों के लिए ब्रिटिश कानून को अहिंसक रूप से तोड़ने का एक सरल और कारगर तरीका होगा.

गांधी जी ने ब्रिटिश नमक नीतियों के प्रतिरोध को अपने नए सत्याग्रह अभियान का मुख्य आधार घोषित किया. 12 मार्च 1930 को गांधी जी अपने 78 अनुयायियों के साथ साबरमती से अरब सागर के तटीय शहर दांडी के लिए 241 मील की पदयात्रा पर निकले. वहां गांधी जी और उनके समर्थकों को समुद्र के पानी से नमक बनाकर ब्रिटिश नीति का विरोध करना था.

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पूरे रास्ते गांधी जी ने विशाल जनसमूहों को संबोधित किया और हर गुजरते दिन के साथ नमक सत्याग्रह में शामिल होने वाले लोगों की संख्या बढ़ती गई. 5 अप्रैल को जब वे दांडी पहुंचे, तब तक गांधी जी हजारों की भीड़ का नेतृत्व कर रहे थे. गांधी जी ने भाषण दिए, प्रार्थनाओं का नेतृत्व किया और अगली सुबह नमक बनाने के लिए समुद्र की ओर चल पड़े.

उन्होंने समुद्र तट पर स्थित नमक के मैदानों में काम करने की योजना बनाई थी, जो हर ज्वार के साथ क्रिस्टलीकृत समुद्री नमक से ढक जाते थे, लेकिन पुलिस ने नमक के जमाव पर मिट्टी डालकर उन्हें रोक दिया था. फिर भी, गांधीजी ने झुककर मिट्टी से प्राकृतिक नमक का एक छोटा सा टुकड़ा उठा लिया – और इस तरह ब्रिटिश कानून का उल्लंघन हुआ.

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दांडी में हजारों लोगों ने उनका अनुसरण किया और मुंबई और कराची जैसे तटीय शहरों में, भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों ने नागरिकों की भीड़ का नेतृत्व करते हुए नमक बनाया. पूरे भारत में सविनय अवज्ञा आंदोलन भड़क उठा, जिसमें जल्द ही लाखों भारतीय शामिल हो गए और ब्रिटिश अधिकारियों ने 60,000 से अधिक लोगों को गिरफ्तार कर लिया. गांधीजी को भी 5 मई को  गिरफ्तार कर लिया गया, लेकिन सत्याग्रह उनके बिना भी जारी रहा.

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21 मई को, कवयित्री सरोजिनी नायडू ने मुंबई से लगभग 150 मील उत्तर में स्थित धरसाना नमक कारखाने पर 2,500 प्रदर्शनकारियों का नेतृत्व किया. वहां ब्रिटिश नेतृत्व में तैनात सैकड़ों भारतीय पुलिसकर्मियों ने उनका सामना किया और शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को बेरहमी से पीटा. अमेरिकी पत्रकार वेब मिलर ने इस घटना को कवर किया था और उनकी रिपोर्ट ने  भारत में ब्रिटिश नीति के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आक्रोश पैदा कर दिया.

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जनवरी 1931 में गांधी जी जेल से रिहा हुए, बाद में उन्होंने भारत के वायसराय लॉर्ड इरविन से मुलाकात की और भारत के भविष्य पर लंदन में होने वाले सम्मेलन में शामिल होने की सहमति दी.

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