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जब पहली बार 'शीत युद्ध' शब्द का इस्तेमाल हुआ, 40 वर्षों तक ट्रेंड में रहा ये टर्म

आज का इतिहास 'कोल्ड वॉर' या 'शीत युद्ध' शब्द की उत्पत्ति से जुड़ा है. आज के दिन एक ऐसी घटना हुई, जिसने 'शीत युद्ध' जैसे टर्म को जन्म हुआ. इसके बाद से ही इस टर्म का इस्तेमाल शुरू हुआ और करीब 4 दशक तक यह प्रचलन में रहा.

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कोल्ड वॉर ने दुनिया भर में कई छोटे-छोटे विवादों को भड़काया और दुनिया परमाणु युद्ध के कागार पर भी पहुंच गई थी (Photo - Getty)
कोल्ड वॉर ने दुनिया भर में कई छोटे-छोटे विवादों को भड़काया और दुनिया परमाणु युद्ध के कागार पर भी पहुंच गई थी (Photo - Getty)

16 अप्रैल 1947 को पहली बार 'शीत युद्ध' का इस्तेमाल दो देशों के बीच कूटनीतिक संबंध को बताने के लिए किया गया था. अरबपति  फायनेंसर बर्नार्ड बारूक ने दक्षिण कैरोलिना प्रतिनिधि सभा में अपने पोट्रेट  के अनावरण के दौरान दिए गए भाषण में संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ के बीच संबंधों का वर्णन करने के लिए "शीत युद्ध" शब्द का इस्तेमाल किया था. यह टर्म प्रचलित हो गया और 40 से अधिक वर्षों तक यह अमेरिकी कूटनीति की भाषा का एक प्रमुख हिस्सा बना रहा.

बारूक ने दुनिया को एक ऐसा शब्द दिया, जो चार दशक तक ट्रेंड में रहा. इस टर्म के मायने आगे चलकर एक विस्तृत क्षेत्र में फैल गए और कूटनीतिक तौर पर पूरी दुनिया पर इसका असर देखने को मिला.

वुड्रो विल्सन के समय से ही बारूक राष्ट्रपतियों को आर्थिक और विदेश नीति के मुद्दों पर सलाहकार के रूप में सेवाएं देते रहे थे. 1919 में, प्रथम विश्व युद्ध को समाप्त करने वाले पेरिस शांति सम्मेलन में वे अमेरिकी सलाहकारों में से एक थे. 1930 के दशक के दौरान, उन्होंने फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट और कांग्रेस के सदस्यों को अंतरराष्ट्रीय वित्त और तटस्थता के मुद्दों पर अक्सर सलाह दी.

 द्वितीय विश्व युद्ध के बाद , वे हैरी एस. ट्रूमैन के नए प्रशासन के विश्वसनीय सलाहकार बने रहे. हालांकि, अप्रैल 1947 में दिया गया उनका भाषण एक बिल्कुल अलग संदर्भ में था. दक्षिण कैरोलिना के मूल निवासी बारूक का चित्र राज्य की प्रतिनिधि सभा में लगाया जाना था और बारूक को इसके अनावरण के लिए आमंत्रित किया गया था.

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अधिकांश मेहमानों को उम्मीद थी कि वे एक संक्षिप्त भाषण देंगे, लेकिन बारूक ने इसके बजाय देश में औद्योगिक श्रम समस्याओं पर तीखा हमला किया. उन्होंने घोषणा की कि केवल श्रम और प्रबंधन के बीच एकता के माध्यम से ही संयुक्त राज्य अमेरिका उस प्रमुख शक्ति के रूप में अपनी भूमिका निभाने की उम्मीद कर सकता है जिसके द्वारा विश्व शारीरिक या आध्यात्मिक रूप से स्वयं को नवीनीकृत कर सकता है. 

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