उत्तराखंड उन चंद राज्यों में से है, जहां शराब के खिलाफ बड़े आंदोलन हुए और उनका परचम स्त्रियों ने बुलंद किया है. उसी राज्य में अब महिलाएं शराब की दुकानों का लाइसेंस पाने के लिए पुरुषों को टक्कर दे रही हैं.
इस बार प्रदेश की 528 दुकानों के लिए जो 64,528 आवेदन प्राप्त हुए, उनमें से 16,116 आवेदन महिलाओं के हैं. पिछले साल 512 दुकानों के लिए 75,900 आवेदन पत्र प्राप्त हुए थे. इस बार आवेदनों की संख्या में तो कमी आई लेकिन महिला आवेदकों की संख्या बढ़ गई है.
हालांकि शराब के ठेकों को बंद करने के लिए महिलाओं का आंदोलन अब भी जारी है. बागेश्वर जिले के गरुण क्षेत्र में हजारों महिलाएं शराब के खिलाफ लामबंदी हैं. इससे पहले चंपावत जिले के लोहाघाट ब्लॉक के पुल्ला समेत कई गांवों में महिलाओं के उग्र आंदोलन की वजह से सरकार को शराब के ठेके बंद करने के लिए मजबूर होना पड़ा. लेकिन उसी राज्य में इस वर्ष कुल 111 महिलाओं के नाम से शराब की दुकानें आवंटित की गई हैं.
यह भी कहा जा रहा है कि शराब के लिए आवेदन करने वाली महिलाएं उन्हीं परिवारों की हैं, जो इस कारोबार में सक्रिय हैं. लॉटरी में दुकान निकलने की संभावना ज्यादा-से-ज्यादा बने, इसके लिए घर के अधिकांश सदस्यों के नाम से जिनमें महिलाएं भी शामिल हैं, आवेदन भर दिए जाते हैं. इसलिए महिला आवेदनकर्ताओं की संख्या में इजाफा हुआ है.
इस कारोबार में महिलाओं के दिलचस्पी लेने की वजह बेरोजगारी भी है. नैनीताल में लॉटरी निकलने से उत्साहित एक महिला अपना नाम न बताने की शर्त पर कहती हैं, 'रोजगार नहीं है. घर चलाने के लिए कुछ तो करना पड़ेगा.'
प्रदेश के तेरह जिलों में से पांच जिलों पौढ़ी, चमोली, टिहरी, उत्तरकाशी और रुद्रप्रयाग में देशी शराब की दुकानें आवंटित नहीं होती. यहां सिर्फ विदेशी शराब के ठेके ही नीलाम होते हैं. बाकी आठ जिलों में देशी-विदेशी, दोनों शराबों के ठेके समान रूप से नीलाम होते हैं. सरकार ने इन दुकानों से 1800 करोड़ रुपये का राजस्व कमाने का लक्ष्य रखा है. विदेशी शराब की दुकान आवंटित करवाने के लिए 22,000 रुपये और देशी शराब की दुकानों के लिए 18,000 रुपये की राशि आवेदन शुल्क के रूप में जमा करनी होती है. पूरे राज्य में केवल आवेदन शुल्क से सरकार को 140 करोड़ रुपये का लाभ हुआ है.