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Dev Diwali: अयोध्या के बाद अब काशी की बारी, 15 लाख दीये जगमगाएंगे, जानें क्या है पूरी तैयारी

Dev Deepawali in Kashi: काशी में इस बार देव दीपावली इस बार पहले से ज्यादा भव्य होगी. 19 नवंबर को वाराणसी के 84 घाट दीयों से जगमगाएंगे. इस बार 15 लाख दीये जलाने की योजना बनायी गयी है.

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देव दिवाली पर काशी में जमकर तैयारी की गई है. (फाइल फोटो)
देव दिवाली पर काशी में जमकर तैयारी की गई है. (फाइल फोटो)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • गंगा के रेत पर भी जलेंगे दीये
  • इस बार पर्यटक भी आएंगे

Dev Deepawali: यूपी में अयोध्या में दिवाली के बाद अब काशी में देव दीपावली को भी भव्य तरीके से मनाने की तैयारी पूरी हो गई है. अयोध्या में जहां एक ओर 12 लाख दीये जलाए गए थे, वहीं काशी में 15 लाख दीये जलाने की योजना बनाई गई है. 19 नवंबर को वाराणसी के 84 घाट दीयों से जगमगाएंगे. इस बार 15 लाख दीये जलाने की योजना बनायी गयी है. इसके लिए जहां वाराणसी प्रशासन ने तैयारी की है वहीं पर्यटन विभाग भी पर्यटकों की आने को लेकर व्यवस्थाओं में जुटा है.

गंगा के रेत पर भी जलेंगे दीये

वाराणसी की विश्व प्रसिद्ध देव दीपावली पर इस बार काशी में अद्भुत नज़ारा होगा. भगवान शिव के त्रिशूल पर बसी काशी में उत्तर वाहिनी गंगा के 84 घाट दीये की रोशनी में जगमगाएंगे. इस बार 15 लाख दीये जलाने की योजना बनायी गयी है. 12 लाख दीये प्रशासन की ओर से सभी घाटों पर जलाए जाएंगे. वहीं घाटों के किनारे रहने वाले लोग और अन्य समितियां भी दीये जलाएंगे जिनकी संख्या करीब 3 लाख रहने की उम्मीद है. वाराणसी के अर्धचंद्राकार घाट दीपमालाओं से जगमगाएंगे. काशी के कुंडों और तालाबों में भी दीये जलाए जाएंगे.

घाटों पर 12 लाख दीये जलाए जाएंगे.

कोविड के संकटकाल के बाद पहली बार पर्यटकों के आने की उम्मीद 

पिछले साल कोरोना के संकट की वजह से पर्यटकों का आना नहीं हुआ. हालांकि स्थानीय लोग इसमें शामिल रहे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी 2020 में देव दीपावली के मौके पर अपने संसदीय क्षेत्र काशी में मौजूद रहे थे. इस बार की खास बात ये भी है कि हमेशा काशी के अर्धचंद्राकार घाटों पर दीये जगमगाते हैं पर इस बार गंगा की रेत पर भी दीये जलाए जाएंगे. यानी गंगा के दोनों तरफ दीये जलेंगे. देव दीपावली पर हर साल पर्यटक आते हैं. इसे देखते हुए पर्यटन विभाग ने हॉट एयर बैलून और लेज़र शो जैसे इवेंट भी कराने की तैयारी भी की है. चेत सिंह घाट पर लेज़र शो और अस्सी घाट पर ई-आतिशबाजी होगी. करगिल के शहीदों और अन्य शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए हर साल ये आयोजन होता है.

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शहीदों को श्रद्धांजलि देने दशाश्वमेध घाट पर बन रहा इंडिया गेट

देव दीपावली में समितियों की भी भूमिका रहती है. गंगा सेवा निधि हर बार शहीदों के लिए देव दीपावली के दिन श्रद्धांजलि कार्यक्रम करता है. दशाश्वमेध घाट पर इसके लिए इंडिया गेट की प्रतिकृति बनायी जा रही है. यहां शहीदों के सम्मान में उनको गार्ड ऑफ ऑनर दिया जाएगा. कारगिल विजय के बाद से ये परम्परा शुरू हुई है कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन देव दीपावली पर शहीदों को भी श्रद्धांजलि दी जाती है. संस्कृति और अध्यात्म को राष्ट्रवाद से जोड़ने की ये पहल हर साल देव दीपावली का हिस्सा होती है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र में इस बार बालिका सशक्तिकरण और ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ का संदेश देने के लिए देव दीपावली के दिन गंगा पूजन के बाद सबसे पहले 51 कन्याओं से मां गंगा की आरती करायी जाएगी. 21 ब्राह्मणों द्वारा मां गंगा की भव्य आरती होगी. अपने आप में ये देव दीपावली आयोजन के लिए नयी बात होगी. इस ख़ास आयोजन के लिए तैयारी कर ली गयी है.

घाटों पर पर्यटकों के आने की भी उम्मीद है.

1985 से शुरू हुआ घाटों में दीपक जलाना

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वाराणसी के प्राचीन मंगला गौरी मंदिर के महंत और देव दीपावली के संस्थापक पंडित नारायण गुरू ने  बताया कि कार्तिक मास में पंचगंगा तीर्थ का अपना स्थान है. प्रात: स्नान और शाम को दीपक जलाया जाता है. इस परंपरा को पहले राजा महाराजा ही किया करते थे, लेकिन फिर यह लुप्त होती गई. जब उन्होंने सिर्फ एक ही पंचगंगा घाट के बगल में दुर्गा घाट पर चंद दीपकों को ही जलते देखा तो यह ख्याल आया कि अन्य घाटों पर क्यों नहीं दीपक जलाया जा सकता है? फिर 1985 में चाय, पान और अन्य दुकानों पर पत्र के जरिये दीपक और पंचगंगा घाट का भी महत्व बताया. जिसके चलते कुल 15 कनस्तर तेल जुटा और 15 हजारे दीपक एक घाट से बढ़कर पंचगंगा घाट के आसपास के घाटों पर सार्थक रूप से जलाया जाना शुरू हो गया.

उन्होंने आगे बताया कि 1986 में केंद्रीय देव दीपावली का गठन किया गया. जिससे सारे बिरादरी के युवक भी जुड़ गए. खुले मैदान की 7 किलोमीटर की लंबाई पर एक साथ दीपक जला पाना ईश्वर की कृपा से ही संभव हो सका है. अब तो वाराणसी प्रशासन और शासन की ओर से भी पिछले 3 वर्षों से दीपक, तेल और बाती भी मदद के तौर पर दी जाती है. उन्होंने आगे बताया कि देव दीपावली की शुरूआत में 5-8 हजार दीपक जलाया गया था और अब 11 लाख दीपकों से कम नहीं जलता है.

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क्यों मनायी जाती है देव दीपावली 

दीपावली के बाद पन्द्रहवें दिन कार्तिक पूर्णिमा पर देव दीपावली मनायी जाती है. मान्यता है कि त्रिपुरासुर राक्षस के आतंक से देवता त्रस्त थे. सभी देवतागण मिलाकर महादेव के पास गए. पूर्णिमा के दिन ही महादेव ने त्रिपुरासुर का संहार किया था. इसलिए देवता उस दिन महादेव की नगरी काशी पहुंचे थे और दीये जलाकर उत्सव मनाया. तभी से देव दीपावली मनाने की परम्परा चली आ रही है. काशी के घाट इस दिन दीयों से रोशन किए जाते हैं.

 

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