सबसे पहले आज तक की टीम पहुंची ग्रेटर नोएडा के गांव सफीपुर के किसान चौधरी मेहरचंद के घर. खलिहान में 50 ट्रॉली से ज़्यादा गेहूं अब भी ढेर लगा है. लेकिन बेचने के लिए मंडी तक पहुंचाने में औपचारिकता आड़े आ रही है.
औपचारिकता की बात करें तो किसान को पहले अपना ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन कराना होता है. रजिस्ट्रेशन के लिए अपने खेत के दस्तावेजों का ब्यौरा देना जरूरी है. खतौनी नम्बर खातेदारों के नम्बर, नाम, आधार नम्बर, बैंक खाता नम्बर सहित अन्य कई जानकारियां देनी जरूरी हैं. इन जानकारियों को एसडीएम या उसके द्वारा नियुक्त अधिकारी सत्यापित करेगा.
किसानों को जारी होगा टोकन
दस्तावेज पूरे होने के बाद किसान को टोकन लेना होगा. टोकन से पता चलेगा कि उसे किस दिन, कितने बजे अपना अनाज लेकर मंडी या खरीद केंद्र पर आना है जिससे मंडी में भीड़भाड़ ना हो. मंडी में खरीद के समय भी सरकारी नखरे और नियम कम नहीं हैं. सरकारी नियम के मुताबिक प्रति एकड़ फसल के निश्चित अनुपात से ज़्यादा फसल किसान ने उपजा ली तो सरकार पूरी उपज नहीं खरीदेगी. सरकार प्रति एकड़ तय क्विंटल के हिसाब से ही खरीदेगी.
सरकार को फसल खरीदनें में दिक्कत क्यों?
चौधरी मेहरचंद के मुताबिक फसल तो धरती पर ही उपजी है किसी कारखाने में तो नहीं कि किसान ने श्रम कानून के उलट तीन पालियों में उत्पाद बढ़ा लिया. तो जब उपज अच्छी हुई तो सरकार को पूरी फसल खरीदने में दिक्कत क्या है? पूरे गौतमबुद्ध नगर जिले में सिर्फ 28 खरीद केंद्र हैं जबकि हरियाणा पंजाब में राज्य सरकारों ने खरीद केंद्रों की तादाद चार गुना तक बढ़ा दी है.
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यूपी और अन्य सरकारें भी ऐसा कर किसानों को सुविधा क्यों नहीं दे सकती? उन्होंने कहा कि जहां तक रही बात हमारे रिकॉर्ड चेक करने की तो जब हम बीज, खाद और कीटनाशक खरीदते समय हर चरण पर सरकार को अपनी जमीन का ब्यौरा देते हैं तो अब फसल बेचते समय भी इन नखरों की क्या जरूरत है. सरकार के पास सब कुछ तो ऑनलाइन है ही. तस्दीक कर ले.
किसानों को सता रहा है बारिश का डर
कासना की किसान कोऑपरेटिव सोसायटी में भी किसानों की चिंता जायज है. इन दिनों तेज आंधी और हल्की बूंदाबांदी चल रही है. ग्राउंड पर मौजूद मजदूर गेहूं से भरे बोरों को करीने से जमाने मे जुटे थे कि बारिश में भीग न जाएं. सोसायटी के प्रभारी सुभाष चंद ने बताया कि बारदाना यानी जूट के बोरे सीमित संख्या में आते हैं. अब जूट के बोरे खत्म हो गए तो खरीद कैसे हो?
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सुबह से दस बारह निराश किसान अपने गेहूं लौटा ले गए. कुछ तो मजदूरों की कमी और कुछ औपचारिकताओं के बोझ ने किसानों को दोहरा कर दिया है. सरकारी नखरों और बेवजह की चोंचलेबाजी से तो यही लगता है कि सरकार किसानों की फसल खरीदने से साफ मना भी नहीं कर रही और सारी फसल खरीद भी नहीं रही.
कम तोला जा रहा अनाज
सहकारी सोसायटी के बाद हमने रुख किया दादरी की अनाज मंडी का. यहां 15 अप्रैल से ही गेहूं की तुलाई जारी है. हालांकि यहां तुलाई के काम में जुटे राज्य खाद्य निगम के निरीक्षक यानी सीनियर मार्केटिंग इंस्पेक्टर राघवेंद्र सिंह के मुताबिक पिछले सालों की सामान्य स्थिति में रोजाना औसतन 500 क्विंटल अनाज तुलता था. लेकिन इस बार रोजाना लगभग 200 से ढाई सौ क्विंटल अनाज ही तुल रहा है.
यहां आए किसान सतपाल के मुताबिक अभी तो सिर्फ 20 फीसदी फसल ही मंडी तक पहुंच पाई है. हालांकि सरकार शासन और प्रशासन की ओर से किसानों को रोक टोक नहीं है लेकिन औपचरिकता की वजह से भागदौड़ बढ़ गई है. यानी किसान की समस्या का अंत अभी भी नहीं दिखता. सरकारी घोषणाओं से भी नहीं.