scorecardresearch
 

व्यंग्यः कविता का संकटकाल और काव्य में नाभिदर्शना महिलाओं का महत्व

समकालीन कविता को अगर आधुनिकतम भी मान चलें तब भी आप दशकों पीछे छूट जाते हैं, क्योंकि कविता आधुनिककाल को भी पीछे छोड़ कविता के संकटकाल में प्रवेश कर चुकी है. 

Advertisement
X

मैट्रिक में जिन्होंने फर्रों से इम्तिहान निकाले हैं उन्हें तक पता होगा कविता रहीम-रसखान के भक्तिकाल,रत्नाकर-पद्माकर के रीतिकाल से होते हुए गालिब-निराला-दिनकर के आधुनिककाल तक कितने जतनों से पहुंची है, उत्तर-छायावाद के बाद नयी कविता के शुरू होते ही जितने भी नाम आते हैं उन्हें लेटेस्ट मान कविता के इतिहास पर पूर्ण विराम लगा दिया जाता है, गोया तारसप्तक के बाद साठ-बासठ सालों में किसी ने कविता लिखी ही न हो और अज्ञेय के बाद कोई जन्मा ही नहीं. कुछ एक मन मारकर विद्रोही कविता, अकविता, जनकविता, समकालीन कविता का नाम भी बताते हैं पर नाम याद रखने में ये हैरी पॉटर सीरीज की फिल्मों से भी मुश्किल हैं. जब कविताएं कह बांध दिया था समां

समकालीन कविता को अगर आधुनिकतम भी मान चलें तब भी आप दशकों पीछे छूट जाते हैं, क्योंकि कविता आधुनिककाल को भी पीछे छोड़ कविता के संकटकाल में प्रवेश कर चुकी है, अब न चारण हैं न भाट, अब न कविता में अवसाद और न चिन्ता के स्वर हैं, न आंसू, खून, पसीना. वामपंथी स्वर चे वाली टी-शर्ट में सिमटकर रह गया है. कविता फेसबुकवादी हो गई, काव्य में शेयरत्व की प्रधानता हो चली है, ताज्जुब होता है इतने बदलाव के बाद भी मुक्तक काव्य डिमांड में है, कविता इतनी मुक्त हो चली कि पिछली पंक्तियों ने अगली को मुक्त छोड़ दिया है, शब्द ऑनलाइन विचरण करते हैं और अर्थ खोजे नहीं मिलते.

कविता की e-दुर्गति के पीछे की वजह काव्य-प्रकाश है जहां काव्य तीन प्रकार के कहे गए, ध्वनि, गुणीभूत व्यंग्य और चित्र. पहली दो चीजें समझ में न आने के चलते नवजात कवियों ने तीसरे प्रकार को निशाने पर ले लिया फलस्वरूप कविता के साथ चित्रों की भरमार हो गई, न ये महाकाव्य था न खंडकाव्य न चम्पूकाव्य, कुछ इसे ‘शेरो-शायरी’ भी कह लेते हैं, वैसे स्वरूप के आधार पर आप इसे दृश्य काव्य और प्रबंध काव्य दोनों कह सकते हैं दृश्य इसलिए क्योंकि ‘दिखने-दिखाने’ पर ही सारा जोर था, क्या कीजिएगा अगर शब्द समझ नहीं आए दृश्य काव्य तो शब्दों के अतिरिक्त पात्रों की वेशभूषा, भावभंगिमा, आकृति, क्रिया और अभिनय द्वारा दर्शकों के हृदय में रसोन्मेष कराता है? और प्रबंध इसलिए कि दो लाइन के बाद बीसियों ‘देसी’ ब्लॉग तलाशने पर ‘शेरो-शायरी’ के साथ चेंपने योग्य सुन्दरी का चित्र मिल पाता है,कवि कविता बाद में लिखता है बदनउघाड़ू फोटू का ‘प्रबंध’ पहले करता है. इनके आगे उत्तरछायावाद युग में “वारेंगे लाखों मधु चुम्बन” और “सम्पूर्ण नग्न,एकान्त नग्न” लिखने वालों की वो रचनाएं अब नर्सरी राइम्स लगती हैं.

Advertisement

कालांतर में नवजात कवियों को समझ आने लगा कि कविता जितनी छोटी और चित्र जितना बड़ा होगा कविता उतनी फलीभूत होगी, (फलीभूत को वायरल पढ़ें!) फलस्वरूप कविता इरोटिक होती चली गई, ये काव्य का सेक्सीकरण था. कविता भावनाओं की ऊंचाइयों को छू रही है और उसी अनुपात में कपड़े घट और कटि-नाभि दृष्टिगोचर हो रहे थे, रमणीयअर्थ के प्रतिपादक को काव्य कहा गया था,तब अर्थ की रमणीयता के लक्षण बहुत स्पष्ट नही किए गए थे, अब समझ आ रहा है कविता की रमणीयता बढ़ते-बढ़ते जिस दिन काव्य के सुख को चरम पर पहुंचा चरमसुख में परिवर्तित देगी उस रोज कविता के संकटकाल के साथ कविता भी चुकी मान ली जाएगी.

Advertisement
Advertisement