पूरी दुनिया में भारत सबसे अधिक सल्फर डाईऑक्साइड (SO2) का उत्सर्जन करता है. इसके पीछे बड़ा कारण है देश में कोयले से चलने वाले पावर प्लांट और कोयले का जलाया जाना. अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के सैटेलाइट ओजोन मॉनिटरिंग इंस्ट्रूमेंट ने यह आंकड़े जमा किए हैं. पूरी दुनिया में 15% से अधिक सल्फर डाईऑक्साइड का उत्सर्जन भारत करता है.
सल्फर डाईऑक्साइड का उत्सर्जन वायु प्रदूषण की सबसे बड़े कारणों में से एक है. वायुमंडल में सल्फर डाईऑक्साइड का स्रोत फैक्ट्रियों में जलने वाले जीवाश्म ईंधन (कोयला) होते हैं. पर्यावरण के लिए काम करने वाली गैर-सरकारी संस्था ग्रीनपीस ने अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के उपग्रह की मदद से देश के 20 पावर प्लांट वाले शहरों का अध्ययन कर यह रिपोर्ट तैयार की है.
ये हैं दुनिया के वे हॉटस्पॉट जहां सबसे ज्यादा SO2 गैस का उत्सर्जन होता है.
इन जगहों के पावर प्लांट फैला रहे सबसे ज्यादा वायु प्रदूषण
सिंगरौली-मध्यप्रदेश, नेवेली-तमिलनाडु, तलचर-ओडिशा, झारसुगुड़ा-ओडिशा, कोरबा-छत्तीसगढ़, कच्छ-गुजरात, चेन्नई-तमिलनाडु, विशाखापट्टनम-आंध्र प्रदेश, रामगुंडम-तमिलनाडु, चंद्रपुर-महाराष्ट्र, राजगढ़-छत्तीसगढ़, मुंद्रा-गुजरात, कोरडी-महाराष्ट्र, कोठागुदेम-तेलंगाना, चंद्रपुरा-झारखंड, तूतीकोरिन-तमिलनाडु, दुर्गापुर-प.बंगाल, बेल्लारी-कर्नाटक, हजीरा-गुजरात, कोटा-राजस्थान.
दुनिया में सबसे ज्यादा सल्फर डाईऑक्साइड उत्सर्जित करने वाले पांच देश
लगातार बढ़ाई जा रही है सल्फर डाईऑक्साइड के उत्सर्जन की सीमा
दिसंबर 2015 में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने पहली बार फैक्ट्रियों के लिए कोयला पावर प्लांट से होने वाले सल्फर डाईऑक्साइड के उत्सर्जन की सीमा तय की थी. बाद में इसे बढ़ाकर दिसंबर 2017 किया गया. लेकिन बिजली मंत्रालय और पावर प्लांट संचालकों के अनुरोध पर सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार ये समय सीमा दिल्ली-एनसीआर के पावर प्लांट के लिए बढ़ाकर दिसंबर 2019 और देश के अन्य पावर प्लांट के लिए 2022 कर दी गई थी.
देश प्रदूषण से जुड़े आपातकाल का सामना कर रहा है
ग्रीनपीस की सीनियर कैंपेनर पुजारिनी सेन कहती हैं कि यह रिपोर्ट साफ बताती है कि हम कोल पावर प्लांट्स को प्रदूषण फैलाने और लोगों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ करने की छूट नहीं दे सकते. हम प्रदूषण से जुड़े आपातकाल का सामना कर रहे हैं. अगर हमने इस समस्या पर ध्यान नहीं दिया तो स्थिति और बिगड़ जाएगी. इस अध्ययन के मुताबिक वायु प्रदूषण का संबंध सीधा लोगों के स्वास्थ्य से है. दुनिया की 91 फीसदी आबादी उन इलाकों में रहती है, जहां बाहरी वायु प्रदूषण विश्व स्वास्थ संगठन की तय सीमा को पार कर चुका है. नतीजा यह है कि हर साल 40 लाख से अधिक लोगों की मौत वायु प्रदूषण से होती है.
प्रदूषण न फैलाने वाले ईंधनों की ओर जाना होगा
ग्रीनपीस के कैंपेन स्पेशलिस्ट सुनील दहिया कहते हैं कि अब वह समय आ चुका है कि हम प्रदूषण न फैलाने वाले ईंधनों की तरफ जाएं. वायु प्रदूषण और जलवायु आपातकाल का एक ही समाधान है. हमें ऐसे ईंधनों के उपयोग की जरुरत है जो पर्यावरण को सुरक्षित रखे.