पंजाब की राजनीति में बड़ा भूचाल आ गया है. आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सांसदों के भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने के बाद अब मुख्यमंत्री भगवंत मान ने इस पूरे मामले को लेकर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से मिलने का समय मांगा है. पार्टी सूत्रों के अनुसार, मुख्यमंत्री अपने विधायकों के साथ राष्ट्रपति से मुलाकात कर पंजाब से जुड़े राज्यसभा सदस्यों को 'वापस बुलाने' के मुद्दे पर अपना पक्ष रखेंगे.
यह घटनाक्रम उस समय सामने आया है जब एक दिन पहले सात राज्यसभा सांसदों ने आम आदमी पार्टी छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया. इस अप्रत्याशित राजनीतिक घटनाक्रम में राघव चड्ढा और संदीप पाठक ने खुद पार्टी छोड़ने की घोषणा की. इनके साथ अशोक मित्तल, हरभजन सिंह, राजिंदर गुप्ता, स्वाति मालीवाल और विक्रमजीत साहनी भी भाजपा में शामिल हुए.
राघव चड्ढा ने पार्टी छोड़ने के पीछे कारण बताते हुए कहा कि अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली पार्टी अपने सिद्धांतों, मूल्यों और नैतिक आधार से भटक गई है. उन्होंने कहा कि सातों सांसदों ने एक गुट के रूप में भाजपा में विलय किया है.
आम आदमी पार्टी को तोड़ने का आरोप
इस बड़े राजनीतिक पलायन के तुरंत बाद मुख्यमंत्री भगवंत मान ने भाजपा पर आम आदमी पार्टी को तोड़ने की कोशिश करने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि ये नेता पंजाब की जनता के विश्वास के साथ विश्वासघात कर रहे हैं. मान ने दावा किया कि 'बेअदबी' के खिलाफ सख्त कानून बनने के बाद से भाजपा की बेचैनी साफ दिखाई दे रही थी.
भाजपा में गए नेताओं के पास सरपंच वाला वोट भी नहीं है
मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि इन सातों सांसदों में से कोई भी जनाधार वाला नेता नहीं है. उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि 'एक सरपंच के पास भी वोट बैंक होता है, क्या इनके पास कोई वोट बैंक है?' उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा पंजाब में राजनीतिक जमीन न होने के कारण डराने, प्रलोभन देने और दलबदल कराने जैसी रणनीति अपना रही है.
भगवंत मान ने कहा कि भाजपा ने पंजाब में बार-बार अस्वीकृति झेली है और अब वह एक भ्रष्टाचार-मुक्त सरकार को कमजोर करने की कोशिश कर रही है. उन्होंने यह भी दावा किया कि राज्य में शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और रोजगार के क्षेत्र में हो रहे सुधारों से भाजपा असहज है.
पंजाब विधानसभा में आम आदमी पार्टी के पास फिलहाल 117 में से 94 विधायक हैं, जिससे सरकार की स्थिति अभी मजबूत मानी जा रही है. हालांकि, राज्यसभा में हुए इस बड़े दलबदल ने पंजाब की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है. अब राष्ट्रपति से संभावित मुलाकात और उसके बाद की राजनीतिक रणनीति पर सबकी नजरें टिकी हैं.