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करुणानिधि के बड़े बेटे अलागिरी नई पार्टी बनाकर भाई एमके स्टालिन को दे पाएंगे चुनौती?

तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री के बेटे और डीएमके प्रमुख एमके स्टालिन खुद सत्ता हासिल करने की रणनीति में जुटे हैं. वहीं, दूसरी तरफ उनके भाई एमके अलागिरी अपने कुछ खास समर्थकों के साथ नई पार्टी  बनाने को लेकर शुक्रवार को बैठक कर सकते हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि अलागिरी अगर नई पार्टी बनाते हैं तो क्या अपने भाई स्टालिन को चुनौती दे पाएंगे? 

अलागिरी और एमके स्टालिन अलागिरी और एमके स्टालिन
स्टोरी हाइलाइट्स
  • अलागिरी क्या अपनी नई सियासी पार्टी बनाएगें
  • अलागिरी का सियासी आधार दक्षिण तमिलनाडु में
  • डीएमके प्रमुख स्टालिन को कितना चुनौती दे पाएंगे

तमिलनाडु में अगले साल की शुरुआत में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए राजनीतिक हलचल तेज हो गई है. दिवंगत पूर्व मुख्यमंत्री करुणानिधि की सियासी विरासत को लेकर परिवार में दरार पड़ती दिख रही है. एक तरफ करुणानिधि के बेटे और डीएमके प्रमुख एमके स्टालिन खुद सत्ता हासिल करने की रणनीति में जुटे हैं. वहीं, दूसरी तरफ उनके भाई एमके अलागिरी अपने कुछ खास समर्थकों के साथ नई पार्टी बनाने को लेकर शुक्रवार को बैठक कर सकते हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि अलागिरी अगर नई पार्टी बनाते हैं तो क्या अपने भाई स्टालिन को चुनौती दे पाएंगे? 


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बता दें कि अलागिरी ने साल 2018 में करुणानिधि के निधन के सिर्फ एक हफ्ते बाद ही स्टालिन को डीएमके का जिम्मा सौंपे जाने पर सवाल खड़े करते हुए मोर्चा खोल दिया था. करुणानिधि के समाधि स्थल मरीना बीच से उन्होंने कहा था कि डीएमके कार्यकर्ता उनके साथ हैं. स्टालिन भले ही कार्यकारी अध्यक्ष हैं, लेकिन वो काम नहीं करते और वो पार्टी को जिताने की क्षमता नहीं रखते. अलागिरी की चुनौती के बावजूद स्टालिन डीएमके के अध्यक्ष बनने में सफल रहे थे. 

करुणानिधी के दौर से ही सियासी संघर्ष 

हालांकि, करुणानिधि को अपने जीवन काल में ही उत्तराधिकारी स्टालिन और बेटे अलागिरी के बीच संघर्ष से रूबरू होना पड़ा था. 90 के दशक में दोनों भाइयों के बीच बढ़ती दरार को कम करने के लिए करुणानिधि ने अलागिरी को दक्षिण तमिलनाडु में पार्टी काम देखने के लिए भेज दिया था. इसके बाद भी दोनों भाई के बीच राजनीतिक वर्चस्व की जंग नहीं थमी. करुणानिधि ने स्टालिन के विरोध के चलते 2014 में अलागिरी को डीएमके से निष्कासित कर दिया था, तब से लेकर अभी तक उनकी पार्टी में वापसी नहीं हो सकी. 

करुणानिधि परिवार के अंदरूनी झगड़े का असर 2016 के चुनाव नतीजों पर भी पड़ा था. 2016 विधासनभा चुनाव में एआईएडीएमके ने 134, डीएमके ने 89 और कांग्रेस ने 8 सीटें जीती थीं. 1984 के बाद यह पहली बार रहा जब तमिलनाडु में कोई पार्टी लगातार दूसरी बार सत्ता में आई थी जबकि इससे पहले हर पांच साल में वहां पर सत्ता परिवर्तन हो जाता था. डीएमके की हार के पीछे की असल वजह दोनों भाई के बीच राजनीतिक वर्चस्व का झगड़ा बताया जाता रहा. 

अलागिरी का राजनीतिक आधार

करुणानिधि के निधन के बाद से ही अलागिरी डीएमके प्रमुख स्टालिन के खिलाफ सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़े हुए थे, लेकिन उन्हें अभी तक कामयाबी नहीं मिल सकी. वहीं, अब अलागिरी की अपने खास समर्थकों के साथ सियासी भविष्य की रणनीति यानी नई पार्टी बनाने को लेकर शुक्रवार को बैठक करने की चर्चा है.  

अलागिरी अगर नई पार्टी बनाते हैं तो उन्हें स्टालिन के विरोधियों का साथ मिल सकता है. अलागिरी नई पार्टी बनाते हैं तो उनकी पार्टी का नाम 'कलइगनर डीएमके' या 'केडीएमके' हो सकता है.अलागिरी के साथ उनके बेटे दयानिधि आ जाएंगे. ऐसे में माना जा रहा है कि दक्षिणी तमिलनाडु के इलाके में स्टालिन के लिए राजनीतिक चुनौती बन सकते हैं. अलागिरी अपने आपको करुणानिधि के असल उत्तराधिकारी के तौर पर पेश करने का दांव चल सकते हैं. 

हालांकि, तमिलनाडु की सियासी परिदृश्य से अलागिरी पिछले 6 साल से गायब हैं. ऐसे में उनके पास ना तो कोई विधायक है और न ही कोई सांसद है. वहीं, 2019 के लोकसभा चुनाव में स्टालिन 38 सीटें जीतकर खुद को साबित कर चुके हैं, लेकिन असल परीक्षा 2021 के चुनाव में होनी है. इसमें स्टालिन को सबसे बड़ी चुनौती दक्षिण तमिलनाडु में मिलनी है, जहां एक तरफ एमके अलागिरी की पकड़ बहुत ही मजबूत मानी जाती है तो दूसरी तरफ बीजेपी का आधार भी यहीं है. ऐसे में अगर अलागिरी किसी भी पार्टी को समर्थन देते हैं या अपनी पार्टी बनाते हैं तो डीएमके को कड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है. 

तमिलनाडु का राजनीतिक पैटर्न

दरअसल, 1984 और 2016 को छोड़ दें तो तमिलनाडु में सत्ता परिवर्तन को लेकर एक पैटर्न रहा है. हर बार तमिलनाडु की जनता सत्ता पर काबिज़ पार्टी को बाहर कर देती है. सत्ता लगातार डीएमके और एआईएडीएके के बीच बदलती रही है. लेकिन इस बार स्थितियां बदल गई हैं. एआईएडीएमके के मूल वोटर्स के पास वास्तविक एआईएडीएमके और टीटीवी दिनाकरन की अगुवाई वाली एआईएडीएमके के बीच चुनने का विकल्प है. ऐसे में डीएमके प्रमुख स्टालिन को अपने पिता करुणानिधि के निधन के चलते सहानुभूति का राजनीतिक फायदा मिलने की संभावना है, लेकिन अब उनकी राह में उनके भाई अलागिरी चुनौती बन रहे हैं. 

 

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