scorecardresearch
 

न नंबरगेम पक्ष में, न सियासी रिटायरमेंट की चाह... राष्ट्रपति चुनाव में शरद पवार के पीछे हटने के 5 कारण

राष्ट्रपति चुनाव को लेकर सियासी सरगर्मियां तेज हो गई हैं. सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों ही राष्ट्रपति चुनाव को लेकर सियासी जोड़तोड़ में जुट गए हैं. इसी कड़ी में ममता बनर्जी ने विपक्षी दलों की बैठक बुलाई थी, जिसमें शरद पवार को साझा उम्मीदवार बनाने की बात रखी गई. लेकिन, शरद पवार ने विपक्ष की ओर से साझा कैंडिडेट बनने के इनकार कर दिया है, जिसके बाद विपक्ष नए चेहरे की तलाश में जुट गया है.

X
ममता बनर्जी, शरद पवार, मल्लिकार्जुन खड़गे
ममता बनर्जी, शरद पवार, मल्लिकार्जुन खड़गे
स्टोरी हाइलाइट्स
  • शरद पवार को विपक्ष क्यों बनाना चाहता है कैंडिडेट
  • NDA और विपक्ष के बीच वोटों का बहुत अंतर नहीं
  • ममता की बैठक में शामिल नहीं हुए ये विपक्षी दल

राष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती साझा उम्मीदवार उतारने की है. ऐसे में पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी के बुलावे पर बुधवार को एनसीपी प्रमुख शरद पवार की अध्यक्षता में कॉन्स्टीट्यूशनल क्लब में विपक्षी दलों की बैठक हुई. राष्ट्रपति चुनाव को लेकर विपक्षी दलों ने एक कॉमन कैंडीडेट उतारने पर आपसी सहमति जाहिर की. शरद पवार के नाम पर पूरा विपक्ष एकजुट दिखा और उन्हें राष्ट्रपति का उम्मीदवार बनाने की इच्छा जाहिर की, लेकिन पवार खुद ही तैयार नहीं हैं.    

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि शरद पवार को मैदान में उतारने पर भी चर्चा हुई, लेकिन वह तैयार नहीं हुए. ममता ने साफ तौर पर कहा कि अगर शरद पवार हां करें तो उन्हें विपक्ष की तरफ से राष्ट्रपति का उम्मीदवार बना दिया जाएगा, क्योंकि विपक्ष उनके नाम पर एकमत है. हालांकि, शरद पवार ने विपक्ष का उम्मीदवार बनने से इनकार कर दिया है, जिसके बाद विपक्ष की मुश्किलें बढ़ गई हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि विपक्ष अगर शरद पवार के नाम पर सहमत है तो वो खुद अपने कदम पीछे क्यों खींच रहे हैं? ये पांच कारण हैं, जिनके चलते शरद पवार विपक्ष की ओर से राष्ट्रपति का उम्मीदवार बनने के लिए रजामंद नहीं हैं. 

1.राष्ट्रपति के लिए नंबर गेम पक्ष में नहीं है 
राष्ट्रपति पद के लिए शरद पवार विपक्ष की ओर से साझा उम्मीदवार न बनने की पहली वजह नंबर गेम है. बीजेपी की अगुवाई वाला एनडीए भले ही अपने दम पर राष्ट्रपति चुनाव जीतने की स्थिति में न हो, लेकिन वोटों का अंतर इतना नहीं है कि उसे मात ही मिले. राष्ट्रपति चुनाव में कुल वैल्यू वोट 10,86,431 है और चुनाव जीतने के लिए 5,43,216 वोट चाहिए. एनडीए के पास कुल 5.26 लाख वोट है जबकि पूरे विपक्ष व निर्दलियों को मिलाकर 5.60 लाख वोट हैं. इस तरह से सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच वोटों का बहुत ज्यादा अंतर नहीं है.

विपक्ष भी पूरी तरह से एकजुट नहीं है, जिसके चलते एनडीए मजबूत दिखाई दे रहा है. ऐसे में शरद पवार किसी तरह का कोई जोखिम भरा कदम नहीं उठाना चाहते हैं. इसीलिए राष्ट्रपति पद के लिए विपक्ष की ओर से साझा उम्मीदवार बनने से इनकार कर रहे हैं, क्योंकि खुद उन्होंने कहा था कि कैसे विपक्ष जीत सकता है इसका आंकड़ा बता दीजिए. 

2.बीजेडी-वाईएसआर नहीं खोल रहे पत्ते? 
शरद पवार के राष्ट्रपति चुनाव में न उतरने की एक बड़ी वजह यह भी है कि विपक्ष पूरी तरह से एकजुट नहीं है. ममता बनर्जी की बैठक में पांच दलों के नेता शामिल नहीं हुए हैं, जिनमें टीआरएस, आम आदमी पार्टी, बीजेडी, वाईएसआर कांग्रेस और अकाली दल हैं. इनमें से बीजेडी और वाईएसआर कांग्रेस ऐसे दल हैं जो राष्ट्रपति चुनाव को लेकर अपने पत्ते नहीं खोल रहे हैं. बिना इन दोनों दलों के साथ आए विपक्ष का राष्ट्रपति चुनाव जीतना नामुमकिन है. इनमें एक भी दल के साथ ना आने की सूरत में वोट बंट जाएंगे और विपक्ष के उम्मीदवार की स्थिति कमजोर हो जाएगी.

बीजेडी और वाईएसआर कई मौके पर बीजेपी के साथ खड़े रहे हैं और 2017 के राष्ट्रपति चुनाव में भी एनडीए का साथ दिया था. हाल ही में दोनों पार्टी के प्रमुखों ने पीएम मोदी के साथ मुलाकात की थी, जिसे राष्ट्रपति चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है. ऐसे में शरद पवार बीजेडी और वाईएसआर कांग्रेस को बिना साथ लिए चुनाव में उतारने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं. 

3.सियासी रिटायरमेंट नहीं चाहते पवार?
शरद पवार फिलहाल खुद को सक्रिय राजनीति से दूर नहीं करना चाहते हैं, जिसके चलते वह राष्ट्रपति के चुनाव में किस्मत आजमाने से बच रहे हैं. हालांकि, यह कोई पहला मौका नहीं है जब शरद पवार ने खुद को राष्ट्रपति पद के चुनाव से अलग किया हो. इसके पहले भी शरद पवार बीते कई सालों से राष्ट्रपति चुनाव में शामिल ना होने की बात कहते रहे हैं. कुछ साल पहले भी पवार ने कहा था कि मैं राष्ट्रपति पद की दौड़ में नहीं हूं. मुझे राजनीति से इतनी जल्दी रिटायर नहीं होना है. उन्होंने कहा था कि अगर आप राष्ट्रपति बनते हैं तो आपको अच्छी हवेली मिलती है लेकिन आप लोगों (मीडिया) से मिलने का मौका नहीं मिलता. इसीलिए लगता है कि शरद पवार राष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष के साझा उम्मीदवार बनने से अपने कदम पीछे खींच रहे हैं. 

4. बेटी के पॉलिटिक्टल फ्यूचर की चिंता?
शरद पवार भले ही लंबी सियासी पारी खेल चुके हों, लेकिन अपनी सियासी वारिस के तौर पर बेटी सुप्रिया सुले को स्थापित नहीं कर पाए हैं. हालांकि, सुप्रिया सुले कई बार से सांसद हैं, लेकिन महाराष्ट्र और एनसीपी की राजनीति में खुद को मजबूत नहीं कर पाई हैं. एनसीपी में कई तरह से गुट सक्रिय हैं, जिसमें अजित पवार अपने आपको शरद पवार के वारिस के तौर पर देखते हैं. ऐसे में शरद पवार राष्ट्रपति की पारी खेलने उतरते हैं तो एनसीपी में फूट पड़ सकती है. 2019 में महाराष्ट्र सरकार गठन के दौरान अजित पवार सियासी पल्टी मारकर अपना तेवर दिखा चुके हैं. ऐसे में शरद पवार अपनी बेटी सुप्रीया सुले के पॉलिटिकल फ्यूचर को सेट किए बिना रिटायरमेंट की दिशा में कदम नहीं बढ़ा सकते हैं.

5- दूर नहीं है 2024 का चुनाव 

शरद पवार की नजर 2024 के लोकसभा और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव पर है, जिसके लिए किसी तरह का कोई जोखिम नहीं उठाना चाहते. पवार विपक्ष के बड़े चेहरे के तौर पर जाने जाते हैं और राजनीति के चाणक्य माने जाते हैं. ऐसे में वो इसी भूमिका में ही खुद को बनाए रखना चाहते हैं. कांग्रेस जिस तरह से कमजोर हुई है और तमाम विपक्षी दल उसे किनारा कर रहे हैं. ऐसे में 2024 के लोकसभा चुनाव में शरद पवार की भूमिका अहम होने वाली है. शिवसेना तो कई बार शरद पवार को यूपीए का अध्यक्ष बनाने की मांग भी उठा चुकी है. इसके अलावा शरद पवार के संबंध भी जिस तरह से तमाम विपक्षी दलों के साथ है, उसके चलते वो अपने आपको सक्रिय बनाए रखना चाहते हैं. ऐसे में राष्ट्रपति चुनाव में प्रत्याशी बनकर खुद की ताकत को गवांना नहीं चाहते हैं? 

 

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें