पिछले लोकसभा चुनाव (2019) में जब नीतीश कुमार (Nitish Kumar) की जेडी(यू) ने 16 सीटों पर जीत हासिल की थी, तो उन्होंने मांग की थी कि एनडीए के सभी सहयोगियों को उनकी संख्या के हिसाब से केंद्रीय मंत्रिमंडल में आनुपातिक प्रतिनिधित्व दिया जाए. लेकिन बीजेपी नेतृत्व ने उनके प्रस्ताव को ठुकरा दिया और जोर देकर कहा कि उनकी पार्टी को मंत्रिमंडल में एक से ज्यादा सीट नहीं मिलेगी. पांच साल बाद, नीतीश कुमार के 12 सांसदों का हिस्सा केंद्र में बीजेपी के लिए अहम ऑक्सीजन सपोर्ट सिस्टम का हिस्सा है. अब यह नीतीश के प्रस्ताव और मोदी के निपटारे का मामला नहीं रह जाएगा.
महज 48 घंटे पहले ही यह चर्चा जोरों पर थी कि नीतीश को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिलवाकर राज्यपाल या केंद्र में मंत्री पद से दे दिया जाएगा. दिल्ली और पटना के राजनीतिक हलकों में चर्चा जोरों पर थी कि उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को पदभार संभालने के लिए कहा जा सकता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात के बाद आई तस्वीर ने ऐसी अटकलों को पुख्ता कर दिया.
लेकिन बिहारी मतदाताओं में नीतीश बाबू को ‘नॉट आउट’ घोषित कर दिया है. बिहार में अपनी ताकत दिखाने वाली बीजेपी को अब नीतीश के साथ नरमी से पेश आना होगा.
नायडू का बदला हुआ वक्त...
आंध्र प्रदेश Inc के सीईओ के रूप में कभी मशहूर रहे चंद्रबाबू नायडू के लिए भी वक्त बदल गया है. इस साल की शुरुआत में जब चंद्रबाबू नायडू 6 साल बाद एनडीए में वापसी के लिए बातचीत करने के लिए नई दिल्ली के लिए उड़ान भर रहे थे, तो वे साफ तौर से चिंतित और थोड़े नर्वस दिख रहे थे. उनके साथ मौजूद एक सीनियर नेता ने कहा, 'नायडू का व्यवहार आश्चर्यजनक नहीं था क्योंकि पिछले पांच सालों में उन्होंने बहुत अपमान सहा है.'
यह भी पढ़ें: चंद्रबाबू नायडू से जुड़े इस स्टॉक का कमाल, 3 दिन से बना है रॉकेट... महीनेभर में पैसा डबल!
YSRCP की तरफ से उनके परिवार पर व्यक्तिगत टिप्पणियों सहित तीखे कटाक्षों ने सीनियर नेताओं को सार्वजनिक रूप से आंसू बहाने पर मजबूर कर दिया था. YSRCP सोशल मीडिया सेल ने उस दुर्भाग्यपूर्ण दृश्य को खराब स्वाद वाले मीम्स में बदलकर उन्हें और अपमानित किया. कौशल विकास मामले में 2023 में 53 दिनों के लिए राजमुंदरी सेंट्रल जेल भेजे जाने से वे बहुत असुरक्षित महसूस कर रहे थे. उनके बेटे नारा लोकेश को गृह मंत्री अमित शाह से मिलने के लिए नई दिल्ली में इंतजार करना पड़ा.
आंध्र प्रदेश में 2019 की हार के बाद से नायडू द्वारा कई बार कोशिश किए जाने के बावजूद, नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी इस साल की शुरुआत तक तेलुगु देशम को एनडीए में फिर से शामिल करने में दिलचस्पी नहीं ले रही थी.
क्या मोदी को जम पाएगी नायडू-नीतीश की जुगलबंदी?
मौजूदा वक्त में तस्वीर बदल गई है और अब नायडू ने रजनीकांत की तरह वापसी की है. यह बीजेपी ही है, जो अब हर बार नायडू के विजयवाड़ा-नई दिल्ली फ्लाइट पर चढ़ने से घबराती है, क्योंकि वह अच्छी तरह जानती है कि चतुर नेता की छवि कठिन सौदेबाजी करने की है. कॉरपोरेट भाषा में, अगर मोदी अब तक बूटस्ट्रैप्ड स्टार्ट-अप के बराबर काम चला रहे थे, तो अब उनके पास नायडू और नीतीश के रूप में दो वेंचर कैपिटलिस्ट हैं, जो एनडीए सरकार के संचालन में अपनी भूमिका निभाएंगे. तो नायडू-नीतीश की जुगलबंदी किस तरह का राजनीतिक म्यूजिक पेश करेगी? क्या यह मोदी के कानों के लिए संगीत होगा और 2029 तक 'मिले सुर मेरा तुम्हारा...' रहेगा या फिर यह तिकड़ी अहम विधायी, प्रशासनिक और राजनीतिक फैसलों पर खुद को बेसुध पाएगी?
यह भी पढ़ें: चंद्रबाबू नायडू के CM पद के शपथ ग्रहण की बदल गई तारीख
पहली नजर में, नहीं. इसकी सीधी वजह यह है कि तीनों ही अनुभवी राजनीतिज्ञ हैं. उनके रिश्ते में बहुत उतार-चढ़ाव आए हैं और अगर वे एनडीए के क्लास में तीन टॉपर्स की तरह एक-दूसरे के बगल में बैठ सकते हैं, तो यह दर्शाता है कि वे राजनीतिक बिजनेस भी कर सकते हैं. लेकिन नरेंद्र मोदी को जो करना होगा वह उन लोगों के साथ चर्चा करना है, जो मोदी 3.0 के लिए जिम्मेदार हैं.
स्पेशल कैटेगरी के साथ एक रास्ते पर नायडू और नीतीश
आंध्र प्रदेश और बिहार को जो चीज एक साथ बांधती है, वह है स्पेशली कैटेगरी के दर्जे की मांग. बिहार को लंबे वक्त से 'बीमारू' राज्य के रूप में जाना जाता रहा है, जहां परिवार के पुरुषों का मुंबई और दक्षिण भारत के शहरों में पलायन करना, ज्यादातर परिवारों के लिए आजीविका का एकमात्र जरिया है.
2024 ने नायडू और नीतीश के पास अपनी मांग दोहराने का मौका फिर से मिला है. जब मोदी, नायडू और नीतीश चर्चा के लिए बैठेंगे तो किसी न किसी रूप में दोनों राज्यों के लिए स्पेशल कैटेगरी का दर्जा निश्चित रूप से चर्चा में होगा. आंध्र प्रदेश को इसकी जरूरत इसलिए भी है क्योंकि उसका खजाना खाली है और राजधानी अमरावती को पिछले पांच सालों में वाईएसआरसीपी सरकार ने भूतहा शहर में बदल दिया है.
यह भी पढ़ें: 'नीतीश कुमार की लीडरशिप में लड़ेंगे बिहार विधानसभा का चुनाव', बीजेपी का बड़ा ऐलान
लेकिन भले ही नीतीश और नायडू को यह अच्छा लगे कि उन्हें नई दिल्ली के विवादास्पद फैसलों पर वीटो पावर मिल जाएगा, लेकिन वे अपने खेमे में एकनाथ शिंदे से सावधान रहेंगे. बीजेपी की छवि अन्य राजनीतिक दलों को विभाजित करने की रही है और इसके लिए 8 टीडीपी सांसदों और 6 जेडीयू सांसदों की जरूरत होती है. काल्पनिक रूप से कहें तो अगर टीडीपी बाहर चली जाती है, तो जगनमोहन रेड्डी अपने चार सांसदों के साथ इसमें शामिल होने के लिए तैयार हो जाएंगे.
क्या INDIA ब्लॉक का ऑफर स्वीकार करेंगे नायडू और नीतीश?
बीजेपी, नीतीश और नायडू दोनों से समान रूप से सावधान रहेगी. दोनों नेताओं के बीजेपी के साथ अच्छे-बुरे रिश्ते रहे हैं और वे एनडीए से कई बार तलाक ले चुके हैं. दोनों नेताओं ने अतीत में कांग्रेस के साथ भी दोस्ती की है. जहां नीतीश ने बिहार में बीजेपी और आरजेडी-कांग्रेस के बीच अपने उतार-चढ़ाव के कारण 'पलटू कुमार' का नाम कमाया, वहीं नायडू ने अपना करियर कांग्रेस से शुरू किया था और 1970 के दशक में आंध्र प्रदेश में कांग्रेस सरकार में मंत्री थे. उन्होंने 2018 में तेलंगाना चुनाव साथ मिलकर लड़ने के लिए कांग्रेस से हाथ भी मिलाया लेकिन राज्य के विभाजन के लिए आंध्र प्रदेश के लोगों द्वारा कांग्रेस को अभी भी माफ नहीं किए जाने के कारण, वह फिलहाल INDIA ब्लॉक प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार करने की संभावना नहीं रखते हैं.
यह भी पढ़ें: अग्निवीर स्कीम पर नीतीश कुमार की JDU का बड़ा बयान, अर्पिता आर्या के साथ देखें 'ब्रेकिंग न्यूज'
साल 1999 से 2004 के बीच नायडू ने वाजपेयी सरकार में मंत्रियों के खिलाफ फैसला किया और केवल जीएमसी बालयोगी को लोकसभा अध्यक्ष के रूप में चुना. हालांकि, 2014 में मोदी सरकार में उनके दो मंत्री थे- अशोक गजपति राजू और वाईएस चौधरी. चूंकि बीजेपी के साथ गठबंधन ने टीडीपी को मुस्लिम वोट से वंचित नहीं किया, इसलिए नायडू एनडीए सरकार का हिस्सा बनने के लिए हिचकेंगे नहीं. इस बार वह क्या कर दिखाते हैं, यह देखना दिलचस्प होगा क्योंकि इस बार उन्होंने नई दिल्ली सर्वर में एक बड़ी और शक्तिशाली राजनीतिक RAM के साथ लॉग इन किया है.