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मिशन 2024: 5 राज्यों के चुनाव नतीजों के बाद BJP के सामने लोकसभा चुनाव को लेकर क्या हैं चुनौतियां?

पांच राज्यों के चुनाव नतीजों में बीजेपी तीन राज्यों में जीत दर्ज करने में सफल रही है. अब नजरें 2024 के लोकसभा चुनाव पर हैं. 2024 के चुनाव में बीजेपी के सामने क्या चुनौतियां होंगी?

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (फाइल फोटोः पीटीआई)
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (फाइल फोटोः पीटीआई)

देश में पांच राज्यों के चुनाव का शोर नतीजों के ऐलान के साथ ही थम गया है. राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम में से किस प्रदेश में किस दल की सरकार बनेगी, ये तस्वीर भी साफ हो चुकी है. राज्यों के चुनाव के बाद अब लोकसभा चुनाव पर नजरें हैं. पांच में से हिंदी पट्टी के तीन राज्यों में जीत से भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) उत्साहित है तो वहीं कांग्रेस के नेता राज्यों की हार पर चिंतन-मनन कर लोकसभा चुनाव की तैयारियों में जुट जाने की बात कर रहे हैं. बीजेपी के सामने लोकसभा चुनाव में इन पांच राज्यों में क्या चुनौतियां होंगी? इसकी चर्चा से पहले इन राज्यों में सीटों के गणित की बात कर लेते हैं.

इन पांच राज्यों में हैं 83 सीटें

राजस्थान में लोकसभा की 25, मध्य प्रदेश में 29, छत्तीसगढ़ में 11, तेलंगाना में 17 और मिजोरम में एक सीट है. इन पांच राज्यों में कुल सीटों का आंकड़ा देखें तो ये 83 पहुंचता है. साल 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 83 में से 65 सीटों पर जीत मिली थी. इन 65 में से चार सीटें बीजेपी ने तेलंगाना में जीती थीं. यानी बीजेपी के 61 लोकसभा सांसद तीन राज्यों- राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ से ही आते हैं. अब, जब इन राज्यों के चुनाव में जीत के साथ बीजेपी ने सत्ता में वापसी कर ली है, लोकसभा चुनाव में पिछला प्रदर्शन दोहराने की चुनौती होगी.

2019 से कितनी अलग है तस्वीर

पिछले लोकसभा चुनाव और इस बार के लोकसभा चुनाव में तस्वीर काफी अलग होगी. 2019 में बीजेपी पांच साल सरकार चलाने के बाद चुनाव मैदान में उतरी थी, वहीं इस बार 10 साल की सरकार के साथ पार्टी चुनाव में जा रही है. पिछले लोकसभा चुनाव में राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार थी, इस बार बीजेपी सत्ताधारी दल है. तेलंगाना में केसीआर सरकार थी, अबकी सीएम की कुर्सी पर कांग्रेस के रेवंत रेड्डी होंगे. बदले हालात में चुनाव नतीजे देखकर हिंदी पट्टी के तीनों राज्यों को बीजेपी के लिए सबसे मुफीद माना जा रहा है. लेकिन बड़ी बात ये है कि इन प्रदेशों में बीजेपी की सीटें सेचुरेशन पर हैं.

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मध्य प्रदेश में लोकसभा की 29 सीटें हैं और इनमें से 28 पर बीजेपी का कब्जा है. इसी तरह राजस्थान की 25 में से 24, छत्तीसगढ़ की 11 में से नौ सीटों पर बीजेपी काबिज है. अब बीजेपी कम सीटों पर काबिज होगी तो उसकी सीटें बढ़ने की उम्मीद होती. यहां तो पहले से ही सेचुरेशन की स्थिति है. ऐसे में बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती पिछले चुनाव की जीती अपनी सीटें बचाए रखने की होगी. अब सवाल ये भी है कि सेचुरेशन की स्थिति में अपनी सीटें बचाए रखने के लिए बीजेपी क्या रणनीति अपनाती है?

क्या होगी बीजेपी की रणनीति?

कहा जाता है कि बीजेपी ऐसी पार्टी है जिसकी हर चाल चुनावी होती है. पांच राज्यों के चुनाव में बीजेपी ने केंद्रीय मंत्रियों और पूर्व मंत्रियों समेत लोकसभा के 21 सांसदों को चुनाव मैदान में उतारा था जिनमें से 9 सांसद हार गए हैं. अब चुनाव हारने वाले सांसद 2024 में टिकट की रेस से ऐसे ही बाहर माने जा रहे हैं, जो जीतकर आए हैं उन्होंने भी संसद की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है यानी बीजेपी ने विधानसभा चुनाव जीतने वाले सांसदों को दिल्ली से सूबे की सियासत में भेज दिया है. इसे एंटी इनकम्बेंसी से निपटने के लिए बीजेपी की टिकट काटने वाली रणनीति से जोड़कर भी देखा जा रहा है.

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राजनीतिक विश्लेषक अमिताभ तिवारी ने कहा कि बीजेपी न सिर्फ माइक्रो लेवल पर काम करती है, उसकी रणनीति भी माइक्रो ही होती है. पार्टी ने विधानसभा चुनावों में किसी भी नेता को सीएम फेस घोषित किए बिना पीएम मोदी के चेहरे पर चुनाव लड़ा और जीता. ये एक तरह से पीएम मोदी की लोकप्रियता, एंटी इनकम्बेंसी का लिटमस टेस्ट था. एंटी इनकम्बेंसी या तो सरकार और सरकार के अगुवा के खिलाफ होती है या फिर जनप्रतिनिधि के खिलाफ. चुनाव नतीजों से कम से कम एक बात तो साफ हो गई कि पीएम मोदी या केंद्र सरकार को लेकर एंटी इनकम्बेंसी नहीं है.

लोकल लेवल पर सांसद के खिलाफ एंटी इनकम्बेंसी होगी भी तो बीजेपी 30 फीसदी से अधिक टिकट काटने का फॉर्मूला अपनाती रही है. इस बार भी बीजेपी ने पहले ही 21 नए चेहरे उतारने की जमीन तैयार कर ली है. विधानसभा चुनाव में हारे उम्मीदवारों के लिए 2024 में टिकट पाने की संभावनाएं ना के बराबर हैं तो वहीं जो जीत गए उन्हें संसद की सदस्यता से इस्तीफा दिलवाकर पार्टी ने एक तरह से स्टेट पॉलिटिक्स में एक्टिव रहने का संदेश दे दिया है. बीजेपी के लिए अगर कुछ चुनौती नजर आ रही है तो वह केवल यही- 20 नए चेहरे खोजने की.

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बीजेपी के पक्ष में बढ़े वोटिंग परसेंट का संकेत क्या?

हिंदी पट्टी के तीनों राज्यों में बीजेपी के पक्ष में मतदान बढ़ा है. 2014 के बाद का ट्रेंड देखें तो विधानसभा चुनाव के मुकाबले बीजेपी को लोकसभा चुनाव में अधिक वोट मिलते थे. पिछले लोकसभा चुनाव की ही बात करें तो बीजेपी का वोट शेयर 2018 के विधानसभा चुनाव में 41.6 फीसदी के मुकाबले 58 फीसदी से अधिक वोट मिले थे. हाल के विधानसभा चुनाव में बीजेपी का वोट शेयर 48 फीसदी से अधिक रहा है. राजस्थान की बात करें तो 2018 के विधानसभा चुनाव में 39.3 फीसदी वोट मिले थे और लोकसभा चुनाव में वोट शेयर 20 फीसदी से अधिक की उछाल के साथ 59 फीसदी के पार पहुंच गया था. 2023 में बीजेपी को 41.69 फीसदी वोट मिले हैं.

छत्तीसगढ़ में भी पिछले चुनाव के मुकाबले बीजेपी का वोट शेयर बढ़ा है. बीजेपी को 2018 में 45.17 फीसदी वोट मिले थे. 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी का वोट शेयर 51.44 फीसदी रहा था जबकि कांग्रेस 41.50 फीसदी वोट शेयर के साथ महज दो सीटें ही जीत सकी थी. इस बार बीजेपी को 46.27 फीसदी वोट मिले हैं. हिंदी पट्टी में बीजेपी का वोटिंग परसेंट बढ़ना छोटी पार्टियों की खिसकती जमीन का संकेत बताते हुए अमिताभ तिवारी ने कहा कि विधानसभा चुनाव भी अब बाइपोलर हो रहे हैं. लोगों का भरोसा क्षेत्रीय दलों पर कम हो रहा है और जो ताकतवर है, वह क्षेत्रीय पार्टियों के वोट में भी सेंध लगा सकता है.

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तेलंगाना में बीजेपी के लिए कितनी संभावनाएं

दक्षिण भारत के कर्नाटक को छोड़ दें तो बाकी राज्यों में बीजेपी कुछ खास नहीं कर पाई है. कर्नाटक के बाद बीजेपी के लिए तेलंगाना को सबसे अधिक संभावनाओं वाला राज्य माना जाता है. बीजेपी तेलंगाना के पिछले चुनाव में महज एक सीट पर सिमट गई थी. इस बार पार्टी 14 फीसदी वोट शेयर के साथ 8 सीटें जीतने में सफल रही है. लोकसभा चुनाव की बात करें तो बीजेपी को 2019 में 19.65 फीसदी वोट शेयर के साथ चार सीटों पर जीत मिली थी. कहा ये भी जा रहा है कि हिंदी बेल्ट में सेचुरेशन की स्थिति के कारण जो थोड़ा-बहुत सीटों के नुकसान का खतरा है, बीजेपी की रणनीति उसे तेलंगाना जैसे राज्यों से कंपनसेट किए जाने के प्लान पर काम कर रही है. इसके लिए बीजेपी की रणनीति क्या होगी?

राजनीतिक विश्लेषक अमिताभ तिवारी ने टिकट बंटवारे और चुनाव प्रचार का जिक्र करते हुए कहा कि अमित शाह ने सत्ता में आने पर ओबीसी सीएम का वादा कर लाइन क्लियर कर दी थी. तेलंगाना में पिछड़ों की राजनीति में एक शून्य है. बीजेपी तेलंगाना में ओबीसी पॉलिटिक्स की धुरी बनने की रणनीति पर काम कर रही है. पार्टी का फोकस अर्बन, एसटी और ओबीसी पर है. तेलंगाना में 44 फीसदी अर्बन एरिया हैं और बीजेपी की इमेज अर्बन पार्टी की रही है. विधानसभा चुनाव में ओबीसी सीएम का दांव फेल हुआ तो एक वजह ये भी थी कि एक पिछड़े को प्रदेश अध्यक्ष से हटा दिया और अब सीएम का वादा कर रहे हो. लोग यकीन नहीं कर पाए. लेकिन लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चेहरा होगा जो खुद ओबीसी ही हैं. ऐसे में बीजेपी को इसका फायदा मिल सकता है.

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