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रंजीत सावरकर ने तुषार गांधी को दी चुनौती- साबित करें सावरकर ने माफी मांगी, मैं चरण स्पर्श करूंगा

रंजीत सावरकर ने तुषार गांधी खुली चुनौती देते हुए कहा कि आप मेरे सामने आइये और साबित कीजिये कि सावरकर ने माफ़ी मांगी है. और अगर यह साबित होता है तो मैं आपके चरण स्पर्श करूंगा और मैं यह साबित करूंगा कि ऐसा नहीं हुआ है.  

बहस में आमने सामने आये रंजीत सावरकर और तुषार गांधी बहस में आमने सामने आये रंजीत सावरकर और तुषार गांधी
स्टोरी हाइलाइट्स
  • आमने सामने आए तुषार गांधी और रंजीत सावरकर
  • सावरकर पर बहस में जुड़ा नया चैप्टर

देश के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के वीर सावरकर पर बुधवार को दिए गए बयान 'सावरकर ने खुद नहीं, बल्कि गांधी जी के कहने पर दया याचिका लगाई थी' के बाद पक्ष विपक्ष के बीच तकरार जारी है. इसी बीच गुरुवार को महात्मा गांधी के प्रपौत्र तुषार गांधी ने एक नया खुलासा किया है. तुषार गांधी ने आरोप लगाते हुए कहा कि राजनाथ सिंह पूरा सच नहीं बता रहे हैं. उन्होंने आगे कहा कि वास्तव में सावरकर की शख्सियत महान नहीं बल्कि अंग्रेजों से माफ़ी मांगने वाले शख्स की है. सावरकर अंग्रेजी की पेंशन पर जीवन यापन करते थे, तो महान कैसे हो सकते हैं. ऐसे में तुषार गांधी के इस बयान ने मामले में छिड़े विवाद में एक नया चैप्टर जोड़ दिया है. 

ऐसे में आजतक के मंच पर सावरकर के पोते रंजीत सावरकर और महात्मा गांधी के प्रपौत्र तुषार गांधी का आमना-सामना हुआ, जिसमें तुषार के दिए बयान समेत कई मामलों पर बहस हुई. 

आमने-सामने आए तुषार गांधी और रंजीत सावरकर

तुषार ने बहस में रंजीत सावरकर के बयान 'माफ़ी नहीं मांगी' पर कहा कि उनको जो पसंद हो वो नाम दें, लेकिन यह माफ़ी नामा ही कहा जाएगा. तुषार ने सवालिया अंदाज में कहा कि महात्मा गांधी से पहले माफ़ी मांगने का जो सिलसिला शुरू हुआ था वो किस महात्मा के कहने पर मांगी थी? इस पर रंजीत ने कुछ दस्तावेज दिखाते हुए कहा कि गांधी ने कहा है तो कहा है इस पर गांधी समर्थकों और तुषार गांधी को यह बात मान लेने में दिक्कत क्या है. 

रंजीत सावरकर ने तुषार गांधी को खुली चुनौती देते हुए कहा कि आप मेरे सामने आइये और साबित कीजिये कि सावरकर ने माफ़ी मांगी है. और अगर यह साबित होता है तो मैं आपके चरण स्पर्श करूंगा और मैं यह साबित करूंगा कि ऐसा नहीं हुआ है.  

'सावरकर ने 1913 के बाद कई याचिकाएं लगाई थीं...'

इससे पहले रंजीत सावरकर ने बताया कि 1920 में गांधी ने सावरकर के भाई को याचिका दायर करने के लिए पत्र लिखा था और उसके बाद याचिका लगाई गई थी. उन्होंने कहा, 'सावरकर ने 1913 के बाद कई याचिकाएं लगाई थीं जो सभी कैदियों की रिहाई के लिए थी. इसमें उन्होंने ये भी कहा था कि अगर मेरी रिहाई अन्य कैदियों की रिहाई में आड़े आ रही है तो उन्हें रिहा कर देना चाहिए.'

उन्होंने दावा करते हुए कहा कि सावरकर ने अपने किसी भी लेटर में अंग्रेजों से माफी नहीं मांगी थी और न ही खेद जताया था. बस ये याचिकाएं दायर की थीं, जिन्हें अंग्रेजों ने दया याचिका नाम दे दिया था.

 

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