तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और TVK प्रमुख सी. जोसेफ़ विजय ने श्रीलंकाई तमिलों के लिए एकजुटता जाहिर की है. उन्होंने श्रीलंका के मुल्लीवाइक्कल का जिक्र किया, जहां 18 मई, 2009 को श्रीलंकाई सेना ने 'लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम' के संस्थापक और दुनिया के सबसे क्रूर गुरिल्ला नेताओं में से एक, वेलुपिल्लई प्रभाकरन को मार गिराया था.
सोशल मीडिया पोस्ट में विजय ने कहा, "हम मुल्लीवाइक्कल की यादों को अपने दिलों में संजोकर रखेंगे. हम समंदर पार रहने वाले अपने तमिल भाई-बहनों के अधिकारों के लिए हमेशा एकजुट होकर खड़े रहेंगे."
विजय का यह बयान ऐसे वक्त में आया है, जब 18 मई को दुनिया भर में बसे श्रीलंकाई तमिल और भारत में तमिलों का एक धड़ा 'मुल्लीवाइक्कल स्मरण दिवस' के रूप में मनाता है. इस दिन का नाम उसी जगह के नाम पर रखा गया है. इसे 'तमिल नरसंहार स्मरण दिवस' भी कहा जाता है. यह तारीख 2009 में हुए श्रीलंकाई गृहयुद्ध के आखिरी दौर की याद दिलाती है. इस दिन उन हजारों तमिल नागरिकों को श्रद्धांजलि दी जाती है, जो 26 साल लंबे सिविल वॉर के आखिरी दौर में, मुल्लीवाइक्कल के किनारे बसे गांव में मारे गए, घायल हुए या लापता हो गए थे.
जातीय संघर्ष का इतिहास
भारत में LTTE (लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम) अब भी एक प्रतिबंधित संगठन है. इसकी वजह 1991 में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या में इसकी भूमिका है, जिसमें LTTE प्रमुख को मुख्य आरोपी बनाया गया था. श्रीलंका में यह संघर्ष बाद में एक लंबे जातीय संघर्ष में बदल गया, जो लगभग तीन दशकों तक चला, जो श्रीलंकाई तमिलों के लिए एक अलग हिस्से की मांग और भेदभाव के आरोपों के साथ शुरू हुआ था.
वेलुपिल्लई प्रभाकरन का संघर्ष अक्सर तमिलनाडु में सियासी दलों द्वारा तमिलों तक पहुंच बनाने की कोशिशों में एक भावनात्मक जुड़ाव पैदा करता था. हालांकि, AIADMK और DMK जैसे मुख्यधारा की द्रविड़ पार्टियों ने इस मुद्दे को काफी सावधानी से संभाला.
हालांकि, विजय जैसे नए सियासी दलों ने बीते वक्त में 'तमिल सबसे पहले' वाली पहचान जगाने के लिए प्रभाकरन का जिक्र किया है. विजय की सरकार को DMK की सहयोगी पार्टी विदुथलाई चिरुथाइगल काची का बाहरी समर्थन हासिल है, जो अपने LTTE-समर्थक रुख के लिए जानी जाती है.
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तमिलनाडु चुनावों से पहले, विजय ने प्रभाकरन की तुलना श्रीलंकाई तमिलों के लिए एक 'मां' जैसी हस्ती से करके एक विवाद खड़ा कर दिया था, जिन्होंने उन पर मां जैसा प्यार बरसाया था.
हालांकि, हाल के विधानसभा चुनावों में श्रीलंकाई तमिलों का मुद्दा एक बड़ा सियासी मुद्दा बनकर नहीं उभरा, फिर भी विजय ने प्रभाकरन को श्रद्धांजलि देने का मौका नहीं छोड़ा.