पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कई मौकों पर बंगाली बनाम बाहरी मुद्दे को भुनाती रही हैं. ऐसे में आगामी लोकसभा चुनाव में बंगाल में बीजेपी के बढ़ते जनाधार को रोकने के लिए वह बांग्ला राष्ट्रवाद का दांव चल रही हैं. हाल ही में कोलकाता के ब्रिगेड परेड ग्राउंड में हुई मेगा रैली में उन्होंने लोकसभा चुनाव के लिए टीएमसी के उम्मीदवारों की लिस्ट जारी की. इस दौरान उन्होंने ये संदेश दे दिया था कि इस बार का चुनाव भी बांग्ला राष्ट्रवाद की पिच पर लड़ा जाएगा.
तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवारों की लिस्ट में युवाओं से लेकर दिग्गजों तक को टिकट दिया गया है लेकिन 2019 लोकसभा चुनाव की तुलना में इस बार कम महिलाओं को टिकट मिला है. लेकिन इस लिस्ट में यूसुफ पठान, कीर्ति आजाद और शत्रुघ्न सिन्हा को टिकट देना सबसे अधिक चौंकाने वाला रहा, जिसने बंगाली बनाम बाहरी विवाद फिर से खड़ा हो गया है.
बोहिरागोटो क्यो?
तृणमूल कांग्रेस के नेता और पश्चिम बंगाल की राजनीति के लोकप्रिय चेहरे के तौर पर ममता बनर्जी ने नरेंद्र मोदी को बोहिरगोटो (बाहरी) बताते हुए निशाना साधा था. उन्होंने मोदी पर निशाना साधते हुए कहा था कि वो बंगाली लिख, पढ़ या बोल नहीं सकते. उनके पास बंगाल के लोगों का प्रतिनिधित्व करने की कोई योग्यता नहीं है. ममता ने बोहिरागोटो शब्द का बढ़-चढ़कर इस्तेमाल राज्य में बीजेपी का मुकाबला करने की मंशा से ही किया.
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मुर्शिदाबाद की बहरामपुर सीट से यूसुफ पठान, दुर्गापुर-बर्धमान सीट से कीर्ति आजाद और आसनसोल से शत्रुघ्न सिन्हा को टिकट देने के फैसले पर अब बीजेपी सवाल उठा रही है कि पीएम मोदी को बाहरी बताने पर तुली ममता ने अब बाहरियों को टिकट कैसे दे दिया? इससे ये भी सवाल उठा है कि क्या ममता को लगता है कि चुनाव लड़ने के लिए अब बंगालियों की कमी हो गई है, लेकिन टीएमसी ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है.
इससे पहले ऐसा कहा जा रहा था कि पुराने नेताओं के बजाए नए चेहरों को टिकट देने को लेकर ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक के बीच विवाद है, लेकिन टीएमसी की इस लिस्ट से ये अटकलें ही साबित हुई क्योंकि दमदम से सौगत रॉय, कोलकाता नॉर्थ से सुदीप बंदोपाध्याय और हावड़ा से प्रसून बनर्जी को दोबारा टिकट दिया गया है. हालांकि, बंदोपाध्याय को दोबारा टिकट देने से थोड़ा विवाद भी है क्योंकि उन पर आरोप है कि वो बीजेपी के लिए काम कर रहे हैं और ये आरोप बीते हफ्ते बीजेपी में शामिल हुए तापस रॉय ने लगाए. हालांकि, ममता बनर्जी ने दोबारा बंदोपाध्याय को टिकट देकर इन आरोपों को दरकिनार कर दिया. उन्हें कोलकाता नॉर्थ से चुनावी मैदान में उतारा गया है, जहां बड़ी संख्या में ऐसे मतदाता है, जो बंगाली भाषी नहीं है.
इस बार टीएमसी की लिस्ट में 2019 लोकसभा चुनाव की तुलना में राजनीतिक नौसिखिए कम हैं. इसका कारण ये है कि पांच साल पहले की तुलना में इस बार पार्टी को बीजेपी से कड़ी टक्कर मिल रही है. क्योंकि बीजेपी बंगाल में मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरी है.
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वहीं, रियलिटी शो स्टार रचना बंदोपाध्याय एक अपवाद है क्योंकि उनका कहना है कि वो सालों से ममता बनर्जी के साथ काम कर रही हैं. उन्हें हुगली सीट से टीएमसी ने टिकट दिया है, जहां उनका मुकाबला बीजेपी की लॉकेट चटर्जी से होगा.
बता दें कि जाधवपुर से सयानी घोष को टिकट दिया गया है और तमलुक से देबांशु भट्टाचार्य को चुनावी मैदान में उतारा गया है. देबांशु भट्टाचार्य को चुनाव में कड़ी टक्कर का सामना करना पड़ेगा क्योंकि ये सीट बीजेपी के आक्रामक नेता सुवेंदु अधिकारी की मिदनापुर ईस्ट सीट का हिस्सा है. घोष ने तृणमूल कांग्रेस की युवा इकाई की अध्यक्षता की है. भट्टाचार्य टीएमसी के प्रभावी प्रवक्ता रहे हैं. टीएमसी ने इस बार नुसरत जहां के बजाए हाजी नजरुल इस्लाम को टिकट दिया है. पार्टी ने बीरभूम से शताब्दी रॉय को टिकट दिया है.
कृष्णानगर से महुआ मोइत्रा को टिकट दिया गया है लेकिन इस सीट से दोबारा मोइत्रा को उतारना चौंकाने वाला रहा क्योंकि उन्हें भ्रष्टाचार के आरोप में लोकसभा से निष्कासित किया गया है. ममता बनर्जी ने महुआ को नादिया जिले का प्रबारी नियुक्त किया. इस जिले की सीमा बांग्लादेश से सटी है और यहां मतुआ समुदाय के मतदाता अधिक हैं. इसके अलावा टीएमसी की इस लिस्ट में कई दल-बदलू भी हैं. बीजेपी से टीएमसी में आए बिश्वजीत दास को भी टिकट दिया गया है. वहीं, मतुआ समुदाय से ताल्लुक रखने वाले कृष्णा कल्याणी और मुकुटमणि अधिकारी भी चुनावी मैदान में उतारा गया है.