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पॉक्सो मामले में भाषा पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, इलाहाबाद HC आदेश पर लिया स्वत: संज्ञान

पॉक्सो केस में इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया. फैसलों की भाषा को संवेदनशील बनाने और जजों के स्पेशल ट्रेनिंग पर जोर दिया गया.

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सीजेआई ने मामले पर सख्त टिप्पणी की है. (File Photo- PTI)
सीजेआई ने मामले पर सख्त टिप्पणी की है. (File Photo- PTI)

सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2025 में पारित इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस आदेश पर स्वत: संज्ञान लिया है, जिसमें पॉक्सो मामले के आरोपों को 'छेड़छाड़' तक सीमित कर दिया गया था. सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी से न्यायाधीशों को विशिष्ट प्रशिक्षण देकर संवेदनशील बनाने पर गौर करने को कहा है. इस मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता ने कहा कि संबंधित फैसले में जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया गया है, वह अपराध की गंभीरता को कमतर बनाने वाले लगते हैं. वे 11 साल की बच्ची को पुलिया के नीचे खींच ले गए, उसके कपड़े उतारने की कोशिश की. सलवार का नाड़ा तोड़ दिया.

इस मामले में हाईकोर्ट जज कहते हैं, "क्योंकि वह उनके साथ जाने के लिए सहमत हो गई थी, इसलिए आपने आरोपी को ऐसी हरकत करने को आमंत्रित किया है. कोलकाता रेप मामले में भी ऐसा ही हुआ था. फैसले में इस तरह की भाषा का उपयोग नहीं किया जाना चाहिए."

उन्होंने आगे कहा कि केरल के विधिक सेवा प्राधिकरण पीड़ित अधिकार केंद्र के सहयोग से हम उम्र के अनुरूप भाषा के संबंध में संवेदीकरण का काम भी कर रहे हैं.

'हम चिंतित हैं...'

सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, "इस संबंध में दो मुद्दे हैं. मुख्य मामला वह है, जहां हम पीड़ित के बारे में चिंतित हैं. यह अपमानजनक और उम्र भर पीड़ादायक अनुभव बन जाता है. पीड़ित भावनात्मक रूप से टूट जाता है. दूसरा मुद्दा इस तरह के मामलों में प्रयोग की जाने वाली भाषा के संबंध में ध्यान में रखे जाने वाले दिशा-निर्देशों और व्यापक सिद्धांतों का है. इस बारे में बार भी सहायता करे."

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चीफ जस्टिस ने आगे कहा कि हम अदालत में इस्तेमाल की जाने वाली भाषा पर न्यायिक दिशा-निर्देश निर्धारित कर सकते हैं. 

सीनियर एडवोकेट एचएस फूलका ने कहा कि ऐसी ही कवायद 2021 में भी की गई थी. तब इस संबंध में हैंडबुक बना कर प्रकाशित की गई थी, लेकिन उसका उपयोग नहीं किया जा रहा है.

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सीजेआई ने कहा कि वह पुस्तिका जटिल 'हार्वर्ड भाषा' का उपयोग कर रही है. कहां और किन परिस्थितियों में किस तरह की भाषा का प्रयोग किया जाना चाहिए, इस बात का तार्किक संबंध होना चाहिए. यह सिर्फ एक छोटी सी पुस्तिका नहीं हो सकती. सामाजिक लोकाचार, सांस्कृतिक संवेदनाओं आदि को ध्यान में रखा जाना चाहिए.

चीफ जस्टिस ने आगे कहा, "हम नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के कुलपति या ऐसे सीनियर प्रोफेसरों को आमंत्रित कर सकते हैं, जो कानून के जानकार हैं. हम उनसे सहायता करने की गुजारिश कर सकते हैं."

सीजेआई ने आगे कहा कि एक बार न्यायिक अकादमी के विचार-विमर्श करने के बाद हम उन्हें न्यायाधीशों को प्रशिक्षित करने के लिए भी कहेंगे. न्यायिक आदेश में निर्देश पारित करने के लिए पर्याप्त नहीं है. पूर्ण और अच्छी ट्रेनिंग की जरूरत है.

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