सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की बेंच केरल के सबरीमाला मंदिर सहित कई धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव और धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे पर सुनवाई कर रही है. जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली इस बेंच में जस्टिस बी वी नागरत्ना और जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह सहित अन्य जज शामिल हैं. सुनवाई के दौरान अदालत ने अयप्पा स्वामी मंदिर के मुख्य पुजारी से पूछा कि क्या संविधान उस भक्त का बचाव नहीं करेगा, जिसे देवालय में प्रवेश या प्रतिमा छूने की अनुमति नहीं है.
यह टिप्पणी पुजारी के उस बयान के बाद आई, जिसमें उन्होंने कहा था कि भक्त देवता के स्वभाव और विशेषताओं के विपरीत नहीं हो सकता.
कोर्ट ने स्पष्ट रूप से आस्तिक के अधिकारों और संवैधानिक सुरक्षा के बीच के संबंधों पर सवाल उठाए हैं.
पुजारी पक्ष ने क्या दलील दी?
मंदिर के मुख्य पुजारी (तंत्री) की तरफ से पेश हुए सीनियर वकील वी गिरि ने दलील देते हुए कहा कि किसी भी मंदिर के समारोह और अनुष्ठान धर्म का अभिन्न अंग होते हैं. उन्होंने तर्क दिया कि ऐसी प्रथाओं को जारी रखना एक जरूरी धार्मिक प्रथा है और यह पूजा के अधिकार का हिस्सा है. उनके मुताबिक, जब कोई भक्त मंदिर जाता है, तो वह देवता की विशेषताओं के विरोध में नहीं हो सकता क्योंकि उसे देवता की जरूरी विशेषताओं और दिव्य आत्मा के प्रति समर्पण करना होता है.
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सुनवाई के दौरान जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने एक महत्वपूर्ण दार्शनिक और संवैधानिक सवाल उठाया. उन्होंने कहा कि जब कोई भक्त सौ फीसदी आस्था और साफ दिल के साथ अपने निर्माता के पास जाता है, तो उसे वंश या किसी निश्चित स्थिति की वजह से देवता को छूने से स्थायी रूप से रोका जाना गलत है. जस्टिस अमानुल्लाह ने जोर देकर कहा कि सृष्टि की रचना करने वाले और सृष्टि के बीच भेदभाव नहीं किया जा सकता है. उन्होंने सवाल उठाया कि ऐसी स्थिति में क्या पीड़ित भक्त के बचाव में संविधान नहीं आएगा.
जवाब में अधिवक्ता वी गिरि ने कहा कि अगर किसी के पुजारी बनने पर पूर्ण प्रतिबंध है, तो इसका समाधान अनुच्छेद 25 (2) (बी) या राज्य द्वारा बनाए गए कानूनों के जरिए किया जाएगा. उन्होंने कहा कि पुजारी वह शख्स होता है, जिसे 'शास्त्रों' के मुताबिक पूजा करने के निर्देश दिए गए हैं. बहस इस बिंदु पर केंद्रित रही कि क्या पुजारी बनने और सेवा करने पर लगे प्रतिबंधों को कानूनी या संवैधानिक आधार पर चुनौती दी जा सकती है या यह पूरी तरह धार्मिक परंपरा का हिस्सा है.
संविधान पीठ के समक्ष बड़े मुद्दे
इस संविधान पीठ के सामने मुख्य चुनौती तमाम धर्मों में मौजूद धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत समानता के अधिकारों के बीच संतुलन बनाना है. बेंच में शामिल नौ जज इस पर विचार कर रहे हैं कि धार्मिक संप्रदायों के पूजा के अधिकार किस हद तक संवैधानिक सुरक्षा के अधीन हैं. कोर्ट का रुख यह संकेत दे रहा है कि वह परंपराओं के नाम पर किसी भी आस्तिक के मौलिक अधिकारों के हनन को संवैधानिक चश्मे से देख रहा है.