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धर्म की आड़ में नहीं छीने जा सकते बुनियादी हक... सबरीमाला मामले में बहस जारी

सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच ने सबरीमाला मामले में धार्मिक स्वतंत्रता, महिलाओं के अधिकार, और समुदायों के मौलिक अधिकारों पर गहन बहस की. पारसी, जैन और आदिवासी समुदायों ने अपना-अपना नजरिया सामने रखा. अदालत ने धार्मिक समुदायों के अधिकारों और उनके नियमों के प्रभावों पर सवाल उठाए.

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सबरीमाला मामले में सुप्रीम कोर्ट में 9 जजों की बेंच सुनवाई कर रही है
सबरीमाला मामले में सुप्रीम कोर्ट में 9 जजों की बेंच सुनवाई कर रही है

सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बड़ी बेंच के सामने सबरीमाला मामले की सुनवाई जारी है. बुधवार को कोर्ट में सुनवाई के दौरान धार्मिक स्वतंत्रता, समुदायों के अधिकार, महिलाओं की समानता और मौलिक अधिकारों को लेकर लंबी बहस हुई. सुनवाई के दौरान पारसी, जैन और आदिवासी समुदायों की ओर से अलग-अलग दलीलें रखी गईं. अदालत में यह सवाल खास तौर पर उठा कि, क्या धार्मिक समुदाय अपने अधिकारों के नाम पर ऐसे नियम बना सकते हैं जो दूसरे मौलिक अधिकारों पर भी असर डालें?

पारसी पंचायत की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता निजाम पाशा ने कहा कि, अदालत को यह देखना होगा कि अधिकारों की कोई ‘हायरार्की’ यानी प्राथमिकता तय की जा सकती है या नहीं. उन्होंने साफ कहा कि पारसी समुदाय में महिलाओं के खिलाफ किसी तरह का औपचारिक बहिष्कार (Excommunication) नहीं है. उन्होंने अदालत से कहा, “पारसी समुदाय की ओर से यह स्पष्ट बयान है कि किसी महिला को समुदाय से बाहर नहीं किया गया.” इस पर जस्टिस जे बागची ने कहा कि अगर वास्तव में किसी का बहिष्कार किया जाता है तो अदालत को उस मामले को देखना पड़ सकता है.

इस पर निजाम पाशा ने जवाब दिया कि हर मामले के तथ्यों को अलग-अलग परिस्थितियों में देखना होगा. उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता का कहना है कि लोगों ने उससे बातचीत बंद कर दी और उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे उसका सामाजिक बहिष्कार हो गया हो, लेकिन कोई औपचारिक बहिष्कार नहीं हुआ. उन्होंने दलील दी कि सामाजिक व्यवहार या लोगों के निजी रिश्तों में अदालत सीधे हस्तक्षेप नहीं कर सकती.

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सुनवाई के दौरान धार्मिक संस्थाओं के प्रशासनिक और आर्थिक अधिकारों पर भी चर्चा हुई. पारसी पंचायत की ओर से कहा गया कि धार्मिक प्रथाओं को “मैनेज” करने के अधिकार में वित्तीय प्रबंधन भी शामिल है. उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) के लिए भी राज्य कुछ नियम तय करता है, लेकिन उसके सदस्य सिख ही होते हैं. यानी प्रबंधन पर कुछ नियमन होने के बावजूद समुदाय के अपने मामलों को संचालित करने का अधिकार बना रहता है.

निजाम पाशा ने यह भी कहा कि इस मामले में अलग-अलग समुदायों के बीच जो एकजुटता दिखाई दे रही है, वह असाधारण है. उन्होंने कहा, “हममें से कई लोग पहली बार एक ही पक्ष में खड़े हैं. यह सभी समुदायों का अपने अधिकारों की रक्षा के लिए एक साथ आना है.” सुनवाई के दौरान आदिवासी समुदायों के अधिकारों का मुद्दा भी उठा. याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि देश के आदिवासी समुदायों के पारंपरिक और स्वदेशी अधिकारों की भी रक्षा होनी चाहिए. अदालत से कहा गया कि प्रकृति की पूजा करने वाले समुदायों, जैसे नियामगिरि हिल्स से जुड़े आदिवासी समूहों और अलग-थलग रहने वाले जनजातीय समुदायों के धार्मिक अधिकारों को भी संवैधानिक सुरक्षा मिलनी चाहिए.

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि अदालत को इन समुदायों के “निर्णायक अधिकारों” यानी अपने धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन को तय करने के अधिकार की रक्षा करनी चाहिए.
इसी दौरान जैन समुदाय की ओर से पेश वकील ने अदालत में एक अहम दलील दी. उन्होंने कहा कि कुछ पक्ष यह तर्क दे रहे हैं कि संविधान के अनुच्छेद 21 यानी जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को अनुच्छेद 25 और 26 से ऊपर रखा जाना चाहिए.

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वकील ने कहा कि अगर ऐसा किया गया तो कई धार्मिक प्रथाएं खतरे में पड़ सकती हैं. उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैन धर्म में कुछ प्रवेश संबंधी नियम हैं. जैसे महिला साध्वियों के कक्ष में पुरुषों का प्रवेश नहीं होता और पुरुष साधुओं के कमरों में महिलाओं को जाने की अनुमति नहीं होती. इसके अलावा पुरुष साधुओं से एक निश्चित शारीरिक दूरी बनाए रखने की परंपरा भी है.

उन्होंने अदालत से कहा कि अगर अनुच्छेद 14 और 21 को हर स्थिति में सर्वोच्च मान लिया गया, तो ऐसी धार्मिक परंपराएं भी खत्म हो सकती हैं. सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी कहा गया कि भारतीय समाज मूल रूप से “ऑटो-थीस्ट” यानी स्वाभाविक रूप से आस्था आधारित समाज है. उन्होंने कहा कि कोई व्यक्ति किसी छोटे से घर या झोपड़ी में दीपक जलाकर भी अपनी आस्था व्यक्त कर सकता है और यही उसकी धार्मिक स्वतंत्रता है.

हालांकि याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि कोई भी समूह धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का इस्तेमाल करके संविधान के भाग-3 में दिए गए मौलिक अधिकारों से अलग नहीं हो सकता. उन्होंने अदालत से कहा कि धर्म के अधिकार के नाम पर किसी दूसरे व्यक्ति के बुनियादी नागरिक अधिकारों को नहीं छीना जा सकता. 
 

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