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जस्टिस यशवंत वर्मा महाभियोग मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सुरक्षित रखा फैसला, कोर्ट ने ठुकराई राहत देने की मांग

सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ चल रही महाभियोग की कार्यवाही पर सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया है. कोर्ट ने जस्टिस वर्मा की पेशी से राहत पाने की मांग को सिरे से खारिज कर दिया. अब उन्हें 12 जनवरी को लोकसभा स्पीकर की कमेटी के सामने पेश होना होगा.

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जस्टिस यशवंत वर्मा की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई पूरी. (Photo:PTI)
जस्टिस यशवंत वर्मा की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई पूरी. (Photo:PTI)

सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस यशवंत वर्मा को पद से हटाने के लिए संसद में चल रही कार्यवाही से जुड़े मामले में अपनी सुनवाई पूरी कर ली है. जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एससी शर्मा की बेंच ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद गुरुवार को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया. साथ ही कोर्ट ने दोनों पक्षों को सोमवार तक लिखित जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है.

ये मामला पिछले साल मार्च में जस्टिस वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी आवास में आग लगने की घटना से जुड़ा है, जहां से भारी मात्रा में जले हुए नोट बरामद हुए थे. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट की इन-हाउस जांच समिति ने उन्हें कदाचार का दोषी पाया और कोर्ट ने उनसे अपने पद से इस्तीफा देने का निर्देश दिया. हालांकि, जस्टिस वर्मा ने इस्तीफा देने से इनकार कर दिया है. इसके बाद कोर्ट ने संसद से उनके खिलाफ महाभियोग लाने की सिफारिश की थी, जिसके बाद संसद में महाभियोग की प्रक्रिया शुरू हुई.

लोकसभा स्पीकर ने गठित की कमेटी

दरअसल, लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने अगस्त 2025 में महाभियोग प्रस्ताव स्वीकार किया और तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की थी. इस समिति ने नवंबर 2025 में जस्टिस वर्मा से लिखित जवाब मांगा था. जवाब देने की समय सीमा बढ़ाकर 12 जनवरी 2026 कर दी गई है, जबकि व्यक्तिगत पेशी 24 जनवरी को निर्धारित है.

जस्टिस वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर लोकसभा स्पीकर द्वारा गठित समिति की वैधता को चुनौती दी है. उनकी दलील है कि महाभियोग प्रस्ताव दोनों सदनों में एक ही दिन पेश किया गया था, इसलिए समिति का गठन लोकसभा स्पीकर और राज्यसभा चेयरमैन द्वारा संयुक्त रूप से किया जाना चाहिए था. जस्टिस वर्मा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी और सिद्धार्थ लूथरा ने पैरवी की.

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने प्रथम दृष्टया इस दलील से असहमति जताई कि राज्यसभा में प्रस्ताव खारिज होने से लोकसभा की कार्यवाही रुक जानी चाहिए. कोर्ट ने पूछा कि क्या एक सदन में प्रस्ताव खारिज होने पर दूसरे सदन में स्वीकार प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ सकता? लोकसभा स्पीकर की ओर से कहा गया कि राज्यसभा में प्रस्ताव कभी स्वीकार ही नहीं किया गया था, क्योंकि वह गलत था.

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कोर्ट ने ठुकराई जस्टिस वर्मा की मांग

जस्टिस वर्मा ने समिति के सामने लिखित जवाब दाखिल करने और व्यक्तिगत पेशी की समय सीमा बढ़ाने की मांग की थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उनकी इसे मांग को ठुकरा दिया.

कोर्ट ने दोनों पक्षों से लिखित जवाब दाखिल करने को कहा था. अब फैसला सुरक्षित होने के बाद इस मामले पर कोर्ट का अंतिम निर्णय आने का इंतजार है.

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