सुप्रीम कोर्ट ने एडवांस स्टेज में गर्भपात के आदेश पर AIIMS की तरफ से दाखिल क्यूरेटिव याचिका खारिज करते हुए कहा कि आप गर्भवती बच्ची और उसके माता पिता को समझाइए यानी काउंसलिंग दीजिए. कोर्ट ने कहा कि अगर वो तैयार नहीं होते तो उनको क्यूरेटिव पेटिशन के साथ आने दीजिए. आप सरकार यानी स्टेट के अंग हैं. आप फिलहाल तो हमारे आदेशों का पालन कीजिए. सुनवाई के दौरान एम्स की सीनियर गायनेकोलॉजिस्ट और ऑब्स्टेट्रिक्स विभाग की प्रोफेसर और अन्य एक्सपर्ट डॉक्टर कोर्ट में मौजूद थे.
डॉक्टरों का कहना था कि 30 हफ्ते के गर्भावस्था के इस फेज में अबॉर्शन काफी जोखिम भरा है. बच्चा जिंदा है, शरीर लगभग पूरा बन चुका है. वक्त से पहले प्रसव से जन्म के बाद बच्चे को जिंदगी भर विकृतियां और स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं. मां के स्वास्थ्य पर भी गंभीर असर पड़ सकता है.
सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिग रेप पीड़िता के अधिकारों की रक्षा को सबसे ऊपर रखते हुए टिप्पणी की है. कोर्ट ने कहा कि अगर माता-पिता गर्भपात चाहते हैं, तो डॉक्टर अकेले फैसला नहीं ले सकते. कोर्ट ने बच्ची के भविष्य और उसके दिमाग पर पड़े सदमे को प्राथमिकता दी है. मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अनवांटेड प्रेग्नेंसी किसी भी महिला या बच्ची पर थोपी नहीं जा सकती. पीड़िता के माता-पिता अब मेडिकल रिपोर्ट देखने के बाद आखिरी फैसला लेंगे.
कोर्ट में तीखी बहस!
AIIMS की तरफ से दलील देने के लिए एएसजी ऐश्वर्या भाटी पेश हुई थीं. उन्होंने तर्क दिया कि 4 हफ्ते और रुकने पर बच्चा गोद में देने लायक हो जाएगा. हालांकि, सीजेआई ने इस पर कड़ा ऐतराज जताया. उन्होंने कहा, "क्या हम एक 15 साल की बच्ची को जबरन मां बनने के लिए मजबूर कर रहे हैं? यह एक अनचाहा गर्भ है और हर गुजरता सेकंड उस बच्ची के लिए नरक जैसा है." कोर्ट ने कहा कि देश में पहले से ही लाखों बच्चे लावारिस हैं, हमें उन पर ध्यान देना चाहिए, न कि इस पीड़िता पर बोझ बढ़ाना चाहिए.
CJI जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि विशेषज्ञ टीम का कहना है कि बच्चा जिंदा रह सकता है, लेकिन यह गर्भ बच्ची की इच्छा से नहीं हुआ. हमने आदेश भी देखा है. यह साफ तौर से बाल दुष्कर्म का मामला है. अगर बच्चा जिंदा रहता है, तो पीड़िता को जिंदगी भर मानसिक आघात रहेगा. मैं समझता हूं कि डॉक्टरों के सामने नैतिक दुविधाएं हैं.
इस पर ASG ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि अगर 4 हफ्ते और मिल जाएं तो बच्चे के जिंदा रहने की संभावना बढ़ जाएगी. चार हफ्ते बाद वो पूरी विकसित हो जाएगा. उसे किसी को गोद दिया जा सकता है.
CJI ने कहा कि यह भ्रूण बनाम पीड़ित बच्ची का संघर्ष है. अगर इस बच्ची को गर्भ जारी रखने के लिए मजबूर किया गया, तो उसके भविष्य पर क्या असर पड़ेगा? हमें सहानुभूति रखनी चाहिए. इस देश में लाखों बच्चे बिना मां-बाप के हैं. वे तस्करी यानी बेचे जाते हैं. हमें उन पर भी ध्यान देना चाहिए. यह 15 साल की बच्ची की अनचाही गर्भावस्था है.
कोर्ट ने बार-बार कहा कि किसी महिला पर अनचाहा गर्भ नहीं थोपा जाना चाहिए. यह उम्र उसकी पढ़ाई और सपनों की है. जो उसके साथ हुआ है, उसकी भरपाई किसी भी तरह से नहीं की जा सकती है. वह पहले ही बहुत दर्द और आघात झेल चुकी है. चार हफ्ते उसके लिए हर पल दर्दनाक होंगे.
एम्स के डॉक्टरों ने अपनी चिंताओं को कोर्ट के सामने रखा. एएसजी ने बताया कि इस स्थिति में केवल 'भ्रूण हत्या' का ही विकल्प बचता है, जो इंजेक्शन के जरिए किया जाता है या फिर बड़ी सर्जरी करनी पड़ती है. डॉक्टरों का कहना था कि यह मां के स्वास्थ्य के लिए भी खतरनाक हो सकता है. जस्टिस बागची ने इस पर कहा कि राज्य को नागरिकों के लिए फैसला लेने के बजाय उन्हें चुनने का मौका देना चाहिए. उन्होंने कहा कि डॉक्टरों का काम इलाज मुहैया कराना है, फैसला थोपना नहीं. कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 142 के तहत वह नाबालिग के अधिकारों की रक्षा के लिए आदेश दे सकता है.
ASG ने कहा कि अब अबॉर्शन मुमकिन नहीं है. भ्रूणहत्या यानी फीटिसाइड ही विकल्प है. यह प्रक्रिया भ्रूण के दिल में इंजेक्शन देकर या सर्जरी के जरिए की जाती है. यह गर्भवती बच्ची के लिए भी सुरक्षित नहीं है. हम एक ‘प्रो-चॉइस’ देश हैं.
इसके बाद CJI ने तकनीकी पहलुओं पर कहा कि आपकी यह क्यूरेटिव याचिका है. अब आप बताइए कि इसमें कौन सी कानूनी गलती है, जिसे सुधारा जाए? आप मेडिकल रिपोर्ट बच्ची और उसके माता-पिता को दिखाएं. वे ही फैसला लेंगे. हम डॉक्टरों की नैतिकता का सम्मान करते हैं.
सुनवाई के दौरान एम्स के डॉक्टरों ने एक पुराने मामले का उदाहरण दिया, जहां एक साल का बच्चा आज भी वेंटिलेटर पर है और उसका मानसिक विकास रुक गया है. सीजेआई ने जवाब दिया कि डॉक्टरों के लिए यह एक 'मेडिकल चैलेंज' हो सकता है, लेकिन कोर्ट के लिए यह उस 15 साल की बच्ची की जिंदगी है, जिसका चेहरा भी हम नहीं देख सकते. सीजेआई ने भावुक होते हुए कहा कि उस बच्ची को स्कूल जाना चाहिए, लेकिन वह इस दर्दनाक आघात से गुजर रही है. उन्होंने कहा कि कुछ भी उस नुकसान की भरपाई नहीं कर सकता, जो बच्ची के साथ हुआ है.
अबॉर्शन की समय सीमा की दलील
ASG ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि MTP कानून में 24 हफ्ते की सीमा इसलिए है क्योंकि उसके बाद ही भ्रूण में जीवन संभव होता है. 2021 में इसमें बदलाव हुआ है.
CJI ने कहा कि यह कैसी स्थिति है? एक रेप पीड़िता नाबालिग को गर्भ जारी रखने के लिए मजबूर किया जा रहा है. कानून ने तो इसे सुधार दिया है. पीड़िता को गर्भ खत्म करने में कोई कानूनी बाधा नहीं होनी चाहिए. डॉक्टर अपनी नैतिक जिम्मेदारी निभाएं, लेकिन इस बच्ची को शांति से जीने दें.
ASG ने दलील देते हुए कहा कि गर्भावस्था के 24 हफ्तों के बाद भ्रूण की सुरक्षा कानून करता है. इस पर CJI ने कहा कि यह तो मेडिकल अनुमान है, आप वास्तविकता देखें. क्या यह बच्ची मां बनने की स्थिति में है? वह तो खुद एक बच्ची है. क्या उस अबोध को जिंदगी भर बच्चे का बोझ उठाना चाहिए?
जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि यह राज्य बनाम नागरिक का मामला नहीं बनना चाहिए. आप डॉक्टरों की मदद से बच्ची और उसके अभिभावकों की काउंसलिंग करें. विकल्प समझाएं, जोखिम बताएं लेकिन फैसला उनका ही होना चाहिए. अगर वे गर्भ जारी रखना चाहते हैं, तो ऐसा करें. अगर खत्म करना चाहते हैं तो करें. फैसला निर्णय उनका होना चाहिए, आपका नहीं. यह नागरिक का फैसला है. AIIMS का काम इलाज देना है, फैसला लेना नहीं.
कोर्ट ने AIIMS को निर्देश देते हुए कहा, "आप काउंसलिंग के बाद आदेश लागू करें. दोबारा कोर्ट न आएं. हमें पता है कि कानून में 24 हफ्ते की सीमा क्यों है, लेकिन जब तक कानून में बदलाव नहीं होता, कोर्ट यह आदेश दे सकती है. कानून में संशोधन कर बाल दुष्कर्म पीड़िताओं के लिए विशेष प्रावधान होना चाहिए, लेकिन डॉक्टर या कोर्ट कोई भी मरीज के लिए फैसला नहीं ले सकता. फैसला पीड़िता या उसके माता-पिता का होगा.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर पीड़िता अबॉर्शन चाहती है, तो उसे छूट दी जाए. साथ ही, बलात्कारी को सख्त सजा देने के लिए कानून मजबूत होना चाहिए. एक नाबालिग पीड़िता को इन सबका सामना क्यों करना पड़े?
ASG ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि इस मामले में आरोपी भी नाबालिग है, इसलिए उस पर भी सख्ती नहीं की जा सकती.