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कृषि क्षेत्र की बिगड़ती हालत संभालने के लिए नई नीतियों की जरूरत

कई दशक से देश की बाकी अर्थव्यवस्था के मुकाबले भारत का कृषि विकास पिछड़ रहा है. इसलिए कृषि विकास को नई गति प्रदान करने के लिए नई नीतियों की जरूरत है.

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2020 में देश की GDP में कृषि का हिस्सा महज 14.65 फीसदी रहा (सांकेतिक-पीटीआई)
2020 में देश की GDP में कृषि का हिस्सा महज 14.65 फीसदी रहा (सांकेतिक-पीटीआई)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • कामकाजी आबादी के 40% कामगारों को रोजगार कृषि से
  • ग्रामीण आबादी का करीब 70 फीसदी लोग खेती पर निर्भर
  • भूमिहीन कृषि मजदूरों की संख्या किसानों की संख्या से ज्यादा

दिल्ली की सीमाओं पर डटे किसानों और सरकार के बीच गतिरोध जारी है. पिछले कुछ वर्षों में जब तक किसान आंदोलन होते रहे हैं और ये दर्शाता है कि नीतियां बनाने में किसानों को लेकर कितना फौरी रवैया अपनाया जाता है. ये हालत तब है ज​ब भारत की कुल कामकाजी आबादी के 40% कामगारों को रोजगार कृषि से मिलता है और ग्रामीण आबादी का करीब 70% इसी पर निर्भर है. हालांकि, खेती से उन्हें बहुत मामूली आमदनी होती है.

वित्त वर्ष 2020 में देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में कृषि का हिस्सा महज 14.65 फीसदी रहा जो कि वित्त वर्ष 2015 के 22.6 फीसदी से कम है. इस अवधि के दौरान कृषि सेक्टर में सालाना 3.6 फीसदी के औसत से वृद्धि हुई, जबकि देश की अर्थव्यवस्था 6.7 फीसदी की दर से बढ़ रही थी.

खेती के हालात पर बारीक नजर डालें तो इसके हर पहलू के बारे में पता चलता है. भूमि, श्रम और पूंजी जैसे उत्पादन कारकों से लेकर मार्केटिंग, व्यापार और फसल को नुकसान से बचाने तक-हर मसले पर एक व्यापक समीक्षा और नई नीतियों की जरूरत है.

भारत में किसान से ज्यादा खेतिहर मजदूर
2011 की जनगणना में पहली बार सामने आया कि भूमिहीन कृषि मजदूरों की संख्या किसानों की संख्या से ज्यादा हो गई है. कृषि पर निर्भर लोगों की दो श्रेणियां हैं. एक किसान और दूसरे भूमिहीन कृषि मजदूर. कृषि पर निर्भर लोगों में भूमिहीन मजदूर 55 फीसदी हैं और इनकी संख्या 14.4 करोड़ है. वहीं काश्तकार किसानों का प्रतिशत 45 है और इनकी संख्या महज 11.8 करोड़ है.

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कृषि को विकास के रास्ते पर ले जाना या विकास बनाए रखना मुश्किल है क्योंकि कृषि मजदूरों को कोई नीतिगत मदद या निवेश के लिए कोई सहायता नहीं मिलती.

बीज, उर्वरक, कीटनाशक, मशीनरी, सिंचाई, भूमि विकास सहायता जैसे सभी लाभ सिर्फ उन लोगों के लिए हैं जो जमीन पर अपना मालिकाना साबित कर सकते हैं.

हालांकि खेती करने वाले सभी लोग किसान नहीं हैं. अब ऐसे किसानों की संख्या बढ़ रही है जो खुद भूमिहीन किसान हैं और जमींदारों से उनकी जमीन लीज, बटाई या पट्टे पर लेकर खेती करते हैं. 2007 के किसान आयोग (NCF) और 2017 की अशोक दलवई समिति जैसे कई सरकारी निकायों ने सिफारिश की है कि भूमिहीन किसानों को भी किसान माना जाए और उन्हें सभी लाभ दिए जाएं लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ.

तेजी से सिकुड़ रही जमीन की जोत
राष्ट्रीय स्तर पर कृषि भूमि का औसत साइज 1970-71 में 2.28 हेक्टेयर था, जो 2015-16 में घटकर 1.08 हेक्टेयर हो गया है. ऑस्ट्रेलिया (4,331 हेक्टेयर), कनाडा (315 हेक्टेयर), अमेरिका (180 हेक्टेयर) और यूरोपीय संघ (16 हेक्टेयर) की तुलना में ये बेहद कम है.

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जमीन के वितरण का ट्रेंड और भी खतरनाक है. सीमांत और छोटे किसानों (क्रमशः 1 हेक्टेयर और 2 हेक्टेयर से कम) की संख्या बहुत ज्यादा (खेती की कुल जमीन का 85 फीसदी से ज्यादा हिस्सा) है. सीमांत किसानों की संख्या में नाटकीय रूप से वृद्धि हुई है और बड़े किसानों (2 हेक्टेयर से ज्यादा) की संख्या में गिरावट आई है.

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भारत में अनाज उत्पादन के मामले में पंजाब और हरियाणा सबसे ऊपर हैं. पंजाब में एवरेज लैंडहोल्डिंग 3.6 हेक्टेयर है, जबकि हरियाणा की 2.2 हेक्टेयर के साथ तीसरे स्थान पर है. राजस्थान 2.7 हेक्टेयर के साथ दूसरे स्थान पर है.

पिछले कुछ दशकों में किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) और कॉन्ट्रैक्ट खेती को बढ़ावा देने जैसी विभिन्न नीतियों से छोटे और सीमांत किसानों ने बहुत कुछ हासिल नहीं किया है. दलवई समिति ने यहां तक चेतावनी दी थी कि वैश्विक अनुभव से पता चलता है कि कॉन्ट्रैक्ट खेती ने छोटे और सीमांत किसानों को आकर्षित नहीं किया है.

भूमिहीन, छोटे और सीमांत किसानों को मिलाकर कृषि पर आधारित कुल वर्कफोर्स 93.7 फीसदी है. उनके कल्याण के बिना खेती का कल्याण नहीं हो सकता. 

कृषि निवेश में गिरावट
निवेश विकास की चाबी है. सीमित राजकोषीय स्थिति को देखते हुए भारत की सरकारें निजी निवेश को बढ़ावा दे रही हैं. दलवई समिति ने सिफारिश की थी कि 2022-23 तक किसानों की आय दोगुनी करने के लिए 6.39 लाख करोड़ रुपये के अतिरिक्त निवेश की जरूरत होगी. हालांकि, आंकड़े कुछ कहानी कहते हैं.

अर्थव्यवस्था में सकल पूंजी निर्माण (GCF) के रूप में कृषि का प्रतिशत वित्त वर्ष 12 में 8.5 से घटकर वित्त वर्ष 19 में 6.5 आ गया है. ऐसा इसलिए क्योंकि निजी निवेश घट रहा है. हालांकि सार्वजनिक निवेश बढ़ गया है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है.

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छोटी अवधि का कृषि कर्ज बढ़ा, दीर्घकालिक निवेश घटा
कृषि क्षेत्र में जो भी पूंजी मौजूद है वह खेती की तत्काल जरूरतों के लिए है. यह विकास (भूमि विकास, टेक्नोलॉजी, रिसर्च वगैरह) के लिए लंबी अवधि के निवेश के रूप में नहीं है.

कृषि ऋण पर समीक्षा को लेकर सितंबर 2019 में जारी आरबीआई की रिपोर्ट में कहा गया था कि कृषि के लिए ऋण का प्रवाह तात्कालिक जरूरतों के लिए ज्यादा है. निवेश के लिए लंबी अवधि के कर्ज में तेजी से गिरावट आ रही है.

आरबीआई ने प्राथमिकता क्षेत्र ऋण (पीएसएल) के दिशा-निर्देशों में बदलाव का सुझाव दिया, लेकिन यह स्पष्ट रूप से पर्याप्त नहीं था. निजी निवेश को आकर्षित करने की विफलता को समझने और परिवर्तन के लिए इस पर ध्यान देने की जरूरत है.

किसानों को उचित मूल्य देने में बाजार की विफलता
ये सबको पता है कि निजी बाजार ने किसानों को निराश किया है और यही बात मौजूदा गतिरोध के केंद्र में है. राज्य सरकारों द्वारा संचालित एपीएमसी मंडियों में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के हिसाब से गेहूं और चावल की सरकारी खरीद से जुड़े आंकड़े दिखाते हैं कि किसान निजी बाजार की जगह मंडियों में उपज बेचना पसंद करते हैं.

अगर प्राइवेट बाजार किसानों के प्रति ईमानदार होते तो वे एमएसपी की कानूनी गारंटी की मांग को लेकर इस तरह से विरोध प्रदर्शन नहीं कर रहे होते, जैसा कि आज हो रहा है.

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गिर रहा कृषि उत्पादों का निर्यात
एक तरफ बाजार किसानों को निराश करते हैं तो दूसरी तरफ व्यापार पर सरकार के कड़े नियम और गैर जरूरी हस्तक्षेप (प्याज के निर्यात पर सितंबर में प्रतिबंध लगा दिया गया था, जबकि मूल्य वृद्धि इस स्तर तक नहीं पहुंची थी कि इस तरह के प्रतिबंध को लागू किया जाए जैसा कि तीन नए कृषि कानूनों में से एक में प्रावधान किया गया है) अतिरिक्त लागत की वजह बनते हैं.

ग्राफ में देखा जा सकता है कि कृषि और इससे संबंधित उत्पादों जैसे चावल, कॉफी, चाय, तंबाकू, मसाले, तिलहन, फल और सब्जियां, अनाज और मांस, डेयरी और पोल्ट्री उत्पादों के निर्यात में भारी गिरावट आई है.

सिकुड़ता फसल बीमा का दायरा
ये एक और समस्या है. किसानों को फसल के नुकसान से बचाने के लिए फसल बीमा योजनाएं फेल हो रही हैं. 

2016 में किसानों और कृषि क्षेत्रों की कवरेज का विस्तार करने के लिए भारत ने दो नई फसल बीमा योजनाओं की शुरुआत की. एक, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) और दूसरी पुन​र्गठित मौसम आधारित फसल बीमा योजना (RWBCIS). इन योजनाओं ने बड़े पैमाने पर निजी बीमा कंपनियों के लिए रास्ता खोला.

ये नई योजनाएं शुरुआत में तो अच्छा काम करती दिख रही थीं, लेकिन जल्द ही राज्य सरकारों और किसानों ने देरी या मुआवजे से इनकार करने तथा मुनाफाखोरी जैसी वजहों से इससे बाहर निकलना शुरू कर दिया. कई मामलों में, बीमा कंपनियों ने किसानों और सरकारों से जितना प्रीमियम प्राप्त किया, उससे काफी कम भुगतान किया है. किसानों को बीमा राशि का 1.5% से 5% तक का भुगतान करना होता है और बाकी का भुगतान समान रूप से केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा किया जाता है. 

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बिहार पहला राज्य था जिसने अपनी ही योजना लॉन्च नहीं की. ​पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश ने भी यही रास्ता अपनाया. सरकार की ओर से फसल बीमा स्वैच्छिक करने के बाद इसके कवरेज में​ गिरावट आई है.

नीतिगत मुद्दों पर संवाद और विचार-विमर्श
भारत की राष्ट्रीय कृषि नीति 20 साल पुरानी है. अब तक इस क्षेत्र की जो परेशानियां हैं, उन्हें ठीक करने के लिए इसकी समीक्षा करने की जरूरत है.

इसके लिए जरूरी है कि लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं अपनाई जाएं. नीतियां लागू करने से पहले खुली सार्वजनिक बहस हो, हितधारकों के साथ बातचीत हो और एक सार्वजनिक नीति के हर पहलू और निहितार्थ को स्पष्ट किया जाए. इसके लिए विस्तृत संसदीय जांच की प्रक्रिया अपनाई जाए.

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