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संघ के 100 साल: RSS मनाता है ये 6 पर्व, लेकिन होली-दीवाली नहीं, समझें दिलचस्प कहानी

अप्पा जी जोशी के एक कहते ही सबने अपने सीने पर दाहिने हाथ को इस तरह से रखा कि केवल अंगूठा सीने पर लगा हो और हथेलियां जमीन की तरफ हों, दो, कहते ही सिर झुक गए और तीन कहते ही हाथ नीचे लाकर सामान्य स्थिति में आ गए. RSS के 100 सालों के सफर की 100 कहानियों की कड़ी में आज पेश है संघ के त्योहारों से जुड़ी कहानी.

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संघ हिंदू साम्राज्य दिवस भी मनाता है (Photo: AI generated)
संघ हिंदू साम्राज्य दिवस भी मनाता है (Photo: AI generated)

यूं संघ की स्थापना तो 1925 में ही हो गई थी, लेकिन अगले चार साल तक सरसंघचालक जैसा कोई पद अस्तित्व में नहीं था. डॉ हेडगेवार की जीवनी लिखने वाले नाना पालकर ने इस बारे में लिखा है कि अक्टूबर 1929 के महीने में संघ की एक बड़ी सभा की तैयारी नागपुर में करवाने की चर्चा चल रही थी. फिर डॉ. हेडगेवार को लगा कि निष्ठावान, संकल्पित कार्यकर्ताओं की बैठक ज्यादा जरूरी है, सो उन्होंने 19 अक्तूबर 1929 को सभी प्रदेशों के संघचालकों को पत्र भेजकर उनसे 9,10 नवंबर में बैठक के लिए नागपुर आने का अनुरोध किया, साथ में मूल उद्देश्य के लिए संकल्पित स्वयंसेवकों को भी लाने को कहा.

जब सारे प्रचारक, संघ चालक और स्वयंसेवक पहले दिन एक जगह इकट्ठा हुए तो उन्हें ये महसूस हुआ कि एक प्रशासनिक व्यवस्था की भी जरूरत है,  और उसकी अगुवाई के लिए एक मुखिया की भी जरूरत है. अप्पाजी जोशी संघ की स्थापना के शुरूआती महीनों में इस बात से परेशान थे कि डॉ हेडगेवार कोई पद नहीं ले रहे थे, संघ का कोई प्रमुख भी नहीं था. दिलचस्प था कि इन चर्चाओं से डॉ. हेडगेवार को दूर रखा गया. विश्वनाथ राव केलकर, बालाजी हुद्दार, अप्पाजी जोशी, कृष्णाराव मोहरिर, तात्याजी कालिकर, बापूराव मुथाल, बाबा साहेब कोल्टे और मार्तंड राव जोग आदि संघ के वरिष्ठ अधिकारियों ने इस चर्चा में भाग लिया. अगले दिन इन सबके साथ नागपुर के स्वयंसेवकों का एक संयुक्त कार्यक्रम हुआ, इसके लिए जगह चुनी गई मोहिते का बाड़ा.

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जिस समय डॉ हेडगेवार भगवा ध्वज के पास खड़े थे, सभी लोग प्रवेश द्वार के पास खड़े थे, अचानक वर्धा के संघचालक अप्पा जी जोशी ने तेज आवाज में कहा.. सरसंघचालक प्रणाम एक.. दो.. तीन. इस तरह का प्रणाम संघ में आमतौर पर भगवा ध्वज को किया जाता है, जिसे ‘गुरु’ माना गया है. एक कहते ही सबने अपने सीने पर दाहिने हाथ को इस तरह से रखा कि केवल अंगूठा सीने पर लगा हो और हथेलियां जमीन की तरफ हों, दो कहते ही सर झुक गए और तीन कहते ही हाथ नीचे लाकर सामान्य स्थिति में आ गए. डॉ. हेडगेवार अवाक खड़े थे. इधर अप्पाजी जोशी ने कल हुई बैठक में लिए गए निर्णयों की जानकारी सभी को दी कि कैसे संघ की प्रशासनिक व्यवस्था खड़ी की जा रही है, जिसके शीर्ष पर सरसंघचालक होगा, पहले सरसंघचालक के तौर पर डॉक्टर हेडगेवार को चुना गया है.

उसके बाद विश्वनाथ राव केलकर ने अपना प्रभावशाली सम्बोधन दिया. हालांकि उस वक्त तो डॉ हेडगेवार चुप रहे, लेकिन बाद में उन्होंने अप्पाजी जोशी को अपनी नाराजगी जताई, खासतौर पर जिस तरह से उनके सम्मान में ‘सरसंघचालक प्रणाम’ आयोजित किया गया. लेकिन अप्पाजी जोशी ने इसकी जरूरत उन्हें समझाई कि संगठन के सुचारू रूप से चलाने के लिए एक औपचारिक मुखिया की आवश्यकता थी और बाकी सब जोश में होता चला गया. ये भी कहा कि अगर आपको पहले बताते तो आप राजी ही नहीं होते. लेकिन अब बाकायदा एक पर्व साल में होता है, जिस दिन डॉ हेडगेवार को ‘आद्य सरसंघचालक प्रणाम’ किया जाता है.
 
हिंदू नववर्ष या चैत्र शुक्ल प्रतिपदा

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ साल में 6 उत्सव या पर्व संगठन के तौर पर मनाता है और अगर आप पहले से नहीं जानते होंगे तो ये जानकर अचरज में पड़ जाएंगे कि उन पर्वों में सनातनियों के दोनों सबसे बड़े पर्व दीवाली और होली शामिल नहीं हैं. अगर आप इन 6 पर्वों को जानेंगे तो पाएंगे कि इन पर्वों को संघ किसी ना किसी विशेष कारण से मनाता है. जो पूरे सनातन समाज को ही नहीं बल्कि दुनियां को भी एक संदेश देते हैं. ऐसा नहीं है कि उनके होली या दीवाली से कोई परेशानी है, लेकिन ये 6 पर्व पूरे सनातन समाज को एक विशेष सूत्र में बांधते हैं. इन्हीं में से एक है हिंदू नववर्ष या चैत्र शुक्ल प्रतिपदा. इतिहास में इसी दिन से विक्रम संवत की शुरुआत हुई थी. वर्ष प्रतिपदा के दिन ही संघ के संस्थापक डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार जी का जन्म हुआ था. संघ के सभी उत्सवों में से यह विशेष होता है और इस दिन सभी की उपस्थिति गणवेश में अनिवार्य होती है. इस उत्सव के दौरान डॉ हेडगेवार को याद किया जाता है और उनके सम्मान में सिर झुकाकर उन्हें ‘आद्य सरसंघचालक प्रणाम’ किया जाता है. यह प्रणाम वर्ष में सिर्फ एक बार होता है.

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यूं साल भर संघ भगवा ध्वज को ही प्रणाम करता है, लेकिन ये एक दिन डॉ हेडगेवार के नाम होता है. जब तक वो जीवित थे, ऐसी प्रथा नहीं थी. लेकिन गुरु गोलवलकर ने और फिर बाद में तीसरे सरसंघचालक बाला साहब देवरस ने भी जोर दिया कि केवल आद्य सरसंघचालक को ही इस तरह से सम्मान मिलने चाहिए कि उनकी भव्य समाधि बने, उनके चित्र लगें, हालांकि बालासाहब ने पहले और दूसरे सरसंघचालक के चित्रों को हर कार्यक्रम में भारत माता के चित्र के साथ लगाने के निर्देश दिए थे, तब से यही परम्परा बन गई है. इसी तरह वर्ष प्रतिपदा के दिन ‘आद्य सरसंघचालक प्रणाम’ की भी परम्परा है. अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से उनका जन्म 1 अप्रैल, 1889 को हुआ था पर संघ भारतीय पंचांग के हिसाब से चलता है और उसके अनुसार डॉ. हेडगेवार का जन्म वर्ष प्रतिपदा के दिन हुआ था

सुरुचि प्रकाशन ने इन 6 पर्वों को चुनने व मनाने को लेकर एक पुस्तिका ‘संघ उत्सव’ प्रकाशित की है, जिसमें गुरु गोलवलकर व बालासाहब देवरस के अलग अलग समय पर व्यक्त किए गए विचारों के जरिए ये बताया गया है कि संघ ने कोई भी उत्सव नया शुरू नहीं किया बल्कि ये आदिकाल से चले आ रहे सनातनी उत्सव ही हैं. इन 6 को चुनने की वजह उनको सीधे राष्ट्र भाव से जोड़ने का विचार था. उन उत्सवों को जानने पर ये विचार भी समझ आता है. वैसे भी इस दिन महाराज विक्रमादित्य ने हूणों को हराकर और राष्ट्र को विदेशी दासता से मुक्त कराकर इस दिन को विक्रम संवत के रूप में प्रतिष्ठित किया था. इसलिए भारतीय इतिहास के लिए ये गौरव का दिन है. ऐसा भी माना जाता है कि भगवान राम का राज्याभिषेक इसी दिन हुआ था. महर्षि दयानंद सरस्वती ने भी इसी दिन आर्यसमाज की स्थापना की थी.
 
विजयादशमी का पर्व

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ऐसे तो ये पर्व भगवान राम की रावण पर विजय के तौर पर सदियों से मनाया जाता रहा है. रावण के पुतले फूंके जाते हैं, रणभूमि से भगवान राम और लक्ष्मण सीताजी को लेकर लौटते हैं. लेकिन संघ के लिए ये पर्व इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इस दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना भी हुई थी. सो उसकी याद में नागपुर में हर साल एक भव्य कार्यक्रम किया जाता है, देश, दुनियां, समाज के किसी अति महत्वपूर्ण व्यक्ति को मुख्य अतिथि के तौर पर बुलाया जाता है. पांडवों की परम्परा के आधार पर शस्त्र पूजा भी की जाती है. ऐसे में संघ भले ही अहिंसा का समर्थक हो, लेकिन शस्त्रों का विरोधी भी नहीं है. वो ये मानता है कि हर भगवान के हाथ में शस्त्र है, इस दुनियां में कुछ लोग ताकत की भाषा ही समझते हैं.

लेकिन ये भी दिलचस्प है कि लगभग हर पर्व की कहानी संघ संस्थापक डॉ हेडगेवार के जीवन से जुडी हुई है. देखा जाए तो डॉ हेडगेवार के जीवन का एक बड़ा विरोध प्रदर्शन विजयादशमी के दिन से ही जुड़ा हुआ है. उनके एक मामाजी आबाजी नाडकर्णी सरकारी नौकरी में थे. जो एमपी के बालाघाट जिले की रामपायली नामक जगह पर तैनात थे. 1907 या 1908 के दशहरे यानी विजयादशमी का दिन था. उन दिनों देश में स्वदेशी आंदोलन चल रहा था, बच्चे बच्चे की जुबान पर वंदेमातरम था. ये स्थान उन स्थानों में गिना जाता है, जहां भगवान राम वनवास के दौरान आए थे. रामपयाली में विजयदशमी के दिन एक जुलूस में सीमा पार जाते थे और फिर वहां रावण दहन करते थे. ड़ॉ हेडगेवार उस समय मुश्किल से 18-19 साल के थे.

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उन्होंने अपने दोस्तों के साथ मिलकर स्वदेशी के प्रचार की जुगत निकाली और बैंडबाजों के साथ निकलने वाले उस जुलूस में शामिल हो गए. उस कस्बे के संभ्रांत नागरिकों के साथ प्रशासन भी उस जुलूस में साथ चलता है. उस साल ये जुलूस थोड़ा ज्यादा ही लम्बा था, क्योंकि किशोरों की टोली भी शामिल हो गई थी. जैसे ही जुलूस रावण के पुलते के पास पहुंचने वाला था, अचानक केशव ने जोर से आवाज लगाई वंदे..मातरम. जवाब में सारे लड़के चिल्लाए.. वंदे...मातरम. दूसरी बार केशव ने बोला तो जवाब में सारे लोग नारे लगाने लगे. वंदेमातरम के नारों के बीच केशव ने वहां एक जोरदार भाषण भी दे डाला, केशव ने पूछा कि रावण का पुतला क्यों जलाया जाता है और इशारों ही इशारों में अंग्रेजों को भी रावण जैसा हश्र होने की बात भी कह डाली. वहां आए सारे लोग हैरान थे. मामला काफी गंभीर हो गया था. केशव के दो करीबी साथियों को स्कूल से निकाल दिया गया. बच्चों को ता बाद में माफ कर दिया गया था, लेकिन केशल के मामा आबाजी का वहां से तबादला कर दिया गया था. 2022 में मध्य प्रदेश सरकार ने ड़ॉ हेडगेवार की यादों को समेटते हुए यहां एक संग्रहालय बनवाया है.
 
हिंदू साम्राज्य दिवस

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ये अकेला ऐसा पर्व है, जिसे आम हिंदू घरों में नहीं मनाया जाता है. विक्रम संवत 1731, ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी के दिन ही छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक हुआ था और उन्होंने हिन्दू साम्राज्य की घोषणा की थी. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस उत्सव के माध्यम से हिंदू समाज में ये संदेश देना चाहता है कि इतनी विषम परिस्थितियों में शिवाजी ने इतने बड़े दुश्मन के आगे हार नहीं मानी और अंत तक लड़ते रहे और कई किले खोने के बावजूद उन्हें बाद में वापस लेने में कायम रहे. उनकी बहादुरी प्रेरणा देती है औऱ हमेशा देती रहे इसलिए इस पर्व को मनाने का निश्चय किया गया. इस उत्सव के दिन सभी स्वयंसेवक छत्रपति शिवाजी महाराज को याद कर उन्हें नमन करते हैं और राष्ट्र की रक्षा की कसम खाते हैं.

19 मई 1674 को काशी के विद्वान गागा भट्ट ने उनका विधिविधान से रायगढ़ के किले में राज्याभिषेक किया था. इस पर्व के दौरान छत्रपति शिवाजी और उनके गुरु समर्थ गुरु रामदास के चित्रों की पूजा की जाती है और शिवाजी द्वारा राजपूत राजा जय सिंह को लिखा गया प्रसिद्ध पत्र भी पढ़ा जाता है, जिसमें राजपूतों से मुगलों के लिए मराठा भाइयों का खून ना बहाने की बात कही गई थी. कुल मिलाकर ये प्रेरणा देने वाला पर्व है. जो आम घरों में भले ना सही लेकिन अब लाखों शाखाओं और स्कूलों में मनाया जाता है. संघ की शाखाओं में इस दिन छत्रपति शिवाजी और उनके कार्यों को याद किया जाता है. उनके शौर्य, पराक्रम व सुशासन से जुड़ी घटनाओं का पुन: स्मरण किया जाता है. साथ ही तानाजी जैसे उनके असंख्य वीर व बलिदानी सहयोगियों तथा उनकी माता जीजाबाई के जीवन से जुड़े प्रेरक प्रसंगों को याद किया जाता है.
 
इस पर्व के बारे में भी आप पाएंगे कि डॉ हेडगेवार के इतिहास में इसके भी बीज मिलते हैं. पहले संघ की प्रार्थना भी मराठी थी, संघ के पद दायित्व हों या प्रशिक्षण की कमांड्स ज्यादातर मराठी में ही रहे हैं, मराठी भूमि से उपजा संगठन छत्रपति शिवाजी महाराज को ही आदर्श मानता था. जरी पटका मंडल जैसे नाम इस संगठन के लिए शिवाजी महाराज से जोड़कर ही सोचे जा रहे थे. बचपन में अपने शिक्षक के घर से शिवाजी की छापामार पद्धति से सुंरग बनाकर सीताबर्डी किले पर शिवाजी का भगवा ध्वज फहराने की योजना भी डॉ हेडगेवार ने बनाई थी. पहला आम चुनाव हुआ था तो गुरु गोलवलकर चुनावी सरगर्मियों से दूर शिवाजी के किले परिसर में बने तिलक के बंगले में रहने चले गए थे.  
 
गुरु पूर्णिमा

1925 में स्थापना होने के 3 साल बीत गए थे, धन की आवश्यकता पड़ने पर कुछ लोगों से आर्थिक सहायता ली जा रही थी. लेकिन अब नई व्यवस्था लानी थी, कुछ साथियों ने सुझाव दिया कि लॉटरी सिस्टम से धन इकट्ठा किया तो किसी ने कहा धन इकट्ठा करने के लिए ड्रामा टिकट्स बेची जानी चाहिए. ऐसे में एक विचार उठा कि क्यों ना जो इसके स्वयंसेवक हैं, वही धन दें और बाहर से धन लिया ही ना जाए. ये धुन गुप्त तरीके से लिफाफे में लिया जाए ताकि गरीब, अमीर सब बराबर रहें.

नाना पालकर डॉ हेडगेवार की जीवनी में इसका श्रेय डॉक्टरजी को ही देते हैं. वो लिखते हैं कि 1928 में गुरु पूर्णिमा के दिन डॉ. हेडगेवार ने नागपुर के सभी स्वयंसेवकों से गुरु पूर्णिमा के दिन शाखा में गुरु पूर्णिमा उत्सव के लिए कुछ फूल और श्रद्धानुसार गुरुदक्षिणा लिफाफे में लाने के लिए कहा. स्वयंसेवक इस बात से हैरान थे कि गुरुदक्षिणा अर्पित किसको करेंगे, फूल किसको चढ़ाएंगे? मन में था कि या तो डॉ हेडगेवार खुद होंगे या अन्ना सोहोनी (प्रशिक्षण प्रमुख)?

लेकिन जब सभी लोग शाखा में जमा हुए, तब उनको भगवा ध्वज पर फूल चढ़ाने व गुरुदक्षिणा अर्पित करने को कहा गया. स्वयंसेवकों के लिए ये नया अनुभव था, हालांकि शाखा की रोज की गतिविधि भगवा ध्वज को प्रणाम करके ही शुरू होती थी. नाना पालेकर लिखते हैं, किसी भी व्यक्ति डॉ. हेडगवार गुरु का दर्जा नहीं देना चाहते थे.  इस कार्यक्रम में डॉ. हेडगवार ने कहा, “भगवा ध्वज हजारों सालों से इस संस्कृति के लिए प्रेरणा श्रोत रहा है, कोई भी व्यक्ति कितना भी महान क्यों ना हो उसमें कुछ खामियां होती ही हैं. इसलिए किसी व्यक्ति की जगह भगवा ध्वज ही हमारा गुरु होगा”. ये उनकी दूरदर्शिता ही थी कि तमाम संगठनों के पैसों पर उनके अंदर से ही सवाल उठते रहे हैं लेकिन संघ पर उसकी कोई छाया नहीं आई.

यो पहला गुरूदक्षिणा उत्सव था औऱ इसमें कुल 84 रुपए 50 पैसे की गुरुदक्षिणा आई, आज की कीमतों के हिसाब से ये 10 से 15 हजार रुपयों के बीच होगी. कुछ स्वयंसेवकों ने तो आधे पैसे तक गुरुदक्षिणा दी थी. अभी भी संघ गुरुदक्षिणा के बजट से ही चलता है, सैकड़ों प्रचारकों और कार्यालयों का खर्च उसके स्वयंसेवकों के ही धन से चलता है. कभी आपको संघ का स्वयंसेवक अपने संगठन के लिए चंदा मांगता नजर नहीं आएगा और ऐसे ऐसे लोग गुरुदक्षिणा देते आए हैं, जिनके नाम चौंकाते हैं. गुरुदक्षिणा देने वालों की संख्या का अंदाजा आप इंडियन एक्सप्रेस की इसी खबर से लगा सकते हैं कि 2017 में केवल दिल्ली के ही 95000 लोगों ने गुरुदक्षिणा दी थी. यह उत्सव यूं तो आषाढ़ की पूर्णिमा को मनाया जाता है, लेकिन संघ की अलग अलग शाखाओं में इसे अलग अलग दिनों में भी मनाया जाता है क्योंकि गुरूदक्षिणा के हिसाब से भी इसके समय में बदलाव होते हैं.
 
मकर संक्रांति

यह हिंदुओं के लिए सबसे पवित्र दिनों में से एक है. सूरज इस दिन से अपनी दिशा बदलता है और दिन बड़े होने लगते हैं तथा रातें छोटीं. भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में मकर संक्रांति को अंधेरे से प्रकाश की ओर यात्रा का पर्व माना गया है. इस दिन संघ की दैनिक शाखा के उपरांत स्वयंसेवकों में गुड़ व तिल का वितरण होता है. इससे पूर्व वरिष्ठ कार्यकर्ता भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं के संदर्भ में इस पर्व के महत्व के बारे में स्वयंसेवकों को जानकारी देते हैं.

देखा जाए तो इस पर्व से ढंग से सम्पर्क में डॉ हेडगेवार कोलकाता (तब कलकत्ता) में पढ़ाई के दौरान आए थे. बंगाल में ये पर्व बड़े जोर शोर से मनाया जाता रहा है, वहां इस जाड़े के दिनों की विदाई के तौर पर मनाया जाता रहा है. नाना पालेकर ने डॉ हेडगेवार की जीवनी में इस पर्व का जिक्र तब है, जब ड़ॉ हेडगेवार बंगाल की बाढ़ में गहन स्तर पर राहत कार्यों से जुड़ते हैं. तब हैजा भी फैलने से वहां के लोगों का ये पर्व भी खराब हो जाता है. इसलिए कहीं ना कहीं डॉ हेडगेवार के मन में इस पर्व को सेवा से जोड़ने का रहा होगा.

संघ उत्सव में कहा गया है कि, “यह वह समय है जब स्वयंसेवकों को ये सोचना चाहिए कि उन्होंने देश के लिए व्यक्तिगत रूप से क्या किया है. इस अवसर पर एक नई शुरूआत की जानी चाहिए, और स्वयंसेवकों को ये संकल्प लेना चाहिए कि वे समाज के कल्याण के लिए निस्वार्थ भाव से काम करेंगे.’’
 
रक्षा बंधन

ये शायद पहला पर्व था जिसे डॉ हेडगेवार ने मनाने का निश्चय संघ शाखाओं में किया था. संघ को पूरा एक साल भी नहीं हुआ था. जून 1926 की बात है, हर महीने के पहले रविवार को कार्य समीक्षा के लिए, आगे की योजनाओं के लिए एक बैठक उन दिनों हुआ करती थी. ये आशा की जाती थी कि नागपुर का हर स्वयंसेवक महीने में कम से कम एक या दो बार तो डॉ हेडगेवार से मिल ही ले. नया संगठन था सो व्यक्ति निर्माण पर ज्यादा जोर दिया जा रहा था. एक एक स्वयंसेवक से घनिष्ठ बातचीत की जाती थी, उसकी शंकाओं का समाधान किया जाता था. ऐसी ही एक बैठक में डॉ हेडगेवार ने सुझाव दिया कि संघ को रक्षा बंधन पर्व मनाना चाहिए. सैकड़ों सालों से भारत में रक्षा बंधन मनाया जा रहा था. आम तौर पर इसे उत्तर का पर्व माना जाता था और बहन की रक्षा का पर्व माना जाता था.
लेकिन डॉ हेडगेवार के मन में कुछ और था, वे इसे हर हिंदू की रक्षा के पर्व के तौर पर मनाना चाहते थे. वे चाहते थे कि इसे पूरे देश में मनाया जाना चाहिए, हर हिंदू भाई दूसरे हिंदू भाई की रक्षा का संकल्प ले, तभी सच्चा रक्षाबंधन होगा. इस तरह पहला रक्षाबंधन 1926 में नागपुर के तुलसीबाग की एक बैठक में मनाया गया था. इस दिन स्वयंसेवक एक दूसरे की कलाई पर राखी बांधकर एक दूसरे की रक्षा करने का संकल्प लेते हैं. इसके बाद स्वयंसेवक अपने आसपास की गरीब बस्तियों या निर्धन व सामाजिक रूप से पिछड़े परिवारों में जाकर वहां बहनों से राखी बंधवाते हैं और उनके साथ भोजन करते हैं. इन परिवारों के साथ स्वयंसेवक साल भर लगातार संपर्क में रहते हैं.
 
 एक सातवां त्योहार गुरु गोलवलकर ने भी मनाया था

इस त्योहार को यूं संघ के मुख्य पर्वों में मान्यता नहीं है, लेकिन इसका उल्लेख इसलिए भी किया जा रहा है क्योंकि भारत और संघ के इतिहास में ये पर्व भी मील का पत्थर बना गया था. इस पर्व का नाम था ‘सेवा दीपावली’.  1962 की चीन से हार ने हजारों घरों में अंधेरा कर दिया था और उनकी दीवाली भी फीकी कर दी थी. तब गुरु गोलवलकर ने इस पर्व के जरिए उनके जीवन में थोड़ी सी रोशन करने की कोशिश की थी. ये बताने की कोशिश की थी कि देश संकट की इस घड़ी में उनके साथ है. 1963 के ‘सेवा दीपावली अभियान’ को लेकर  ‘बंच ऑफ थॉट्स’ में गुरु गोलवलकर का आव्हान मिलता है, "इस दिवाली, सिर्फ़ अपने घरों को ही रोशन न करें, बल्कि भारत के हर कोने में सेवा के दीप जलाएं. सच्ची समृद्धि आसमान में आतिशबाजी से नहीं, बल्कि हमारे लोगों में आत्मनिर्भरता की ज्योति जलाने से आती है." लेकिन ये केवल आव्हान भर नहीं था बल्कि देश की हर शाखा को सर्कुलर के जरिए दीवाली और उससे जुडे त्यौहारों यानी धनतेरस, छोटी दीवाली, गोवर्धन पूजा और भैया दूज को क्या क्या करना है, इसकी भी जानकारी भेजी गई थी. जैसे धनतेरस और छोटी दीवाली को आस पास की सफाई के अलावा खर्चे कम करते हुए उन्हें गरीबों पर खर्च करना है. स्वयंसेवक गांवों, गरीब बस्तियों में सफाई अभियान चलाएं और युद्ध विधवाओं को बर्तन आदि भेंट दें.
 
दीवाली के दिन पूजा अपने भले के लिए नहीं बल्कि राष्ट्र की समृद्धि के लिए करनी है, दिए अपने घर तो जलाएं ही, अनाथालय या गरीब बस्तियों में जाकर जलाएं. इस बार पटाखों पर पैसे ना खर्च करें. उस पैसे को गरीबों के लिए लगाएं. अकेले नागपुर में ही 500 स्थानों पर दिए जलाने का कार्यक्रम आयोजित हुआ था.  गोवर्धन पूजा और भाई दूज के लिए वृक्षारोपण कार्यक्रम और विस्थापितों के परिवारों से वैसे ही मिलने को कहा गया जैसे अपने भाई बहनों से मिलते हैं, तमाम जगह लोग उनसे मिलकर मिठाई आदि उपहार देकर आए.
 
1963 की सेवा दीवाली ना केवल संघ के लिए बल्कि देश के लिए उदाहरण बन गई. आज भी सेवा भारती और सेवा इंटरनेशनल जैसे संघ से जुडे संगठन दीवाली को ‘सेवा दीपावली’ के तौर पर ही मनाते हैं. 1963 में संघ से स्वयंसेवकों ने ने 50000 से ज्यादा परिवारों को राशन, किताबें, कपड़े, मिठाई आदि पहुंचाई थी और बिना किसी सुप्रीम कोर्ट के आदेश के पटाखों से लगभग परहेज ही किया था. शाखाओं पर भजनों के कार्यक्रम हुए, रामायण को लेकर बौद्धिक हुए, शहीद सैनिकों के परिवारों और विस्थापितों को भी अहसास हुआ कि देश के लोग इस आपदा में उनके साथ हैं.

पिछली कहानी: RSS की चारदीवारी के चार चक्रधरों की रोचक कहानियां

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