सबरीमाला मामले में जारी सुनवाई में मंगलवार को अदालत का माहौल काफी गर्म हो गया. ये सुनवाई का 11वां दिन रहा और 9 जजों की संवैधानिक बेंच के सामने तीखी बहस हुई. ऐसे में अदालत ने न सिर्फ याचिका की वैधता पर सवाल उठाए, बल्कि यह भी कहा कि ऐसी याचिका को शुरुआत में ही खारिज कर दिया जाना चाहिए था और कूड़े में फेंक दिया जाना चाहिए.
सुनवाई के दौरान इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन की ओर से पेश हुए अधिवक्ता आरके गुप्ता ने दलील दी कि सबरीमाला मामला जिस तरह 9 जजों की बेंच को भेजा गया, वह सुप्रीम कोर्ट के नियमों के अनुसार नहीं था. उन्होंने यह भी कहा कि इस बेंच के सामने सिर्फ कानूनी सवालों पर विचार होना चाहिए था, लेकिन यहां मामले के तथ्यों पर भी बहस हो रही है.
बेंच ने वकीलों के संगठन पर उठाए सवाल
हालांकि, बेंच ने इस दलील पर याचिका की बुनियाद पर सवाल खड़े कर दिए. अदालत ने पूछा कि आखिर एक वकीलों का संगठन, जिसे एक मुस्लिम व्यक्ति लीड कर रहा था, वह मंदिर में प्रवेश जैसे धार्मिक मामले में पीआईएल (जनहित याचिका) कैसे दाखिल कर सकता है. जस्टिस बीवी नागरत्ना ने तो यहां तक कह दिया कि यह समझ से परे है कि ऐसी याचिका को अदालत ने स्वीकार ही कैसे कर लिया.
वकील ने बताया कि तब चीफ जस्टिस ने न सिर्फ याचिका को स्वीकार किया था, बल्कि याचिकाकर्ताओं को जान से मारने की धमकियों के चलते पुलिस सुरक्षा भी दी थी. यह दलील सुनकर बेंच ने कड़ी प्रतिक्रिया दी. अदालत ने कहा कि उस समय के चीफ जस्टिस को ये याचिका 'सीधे कूड़ेदान में फेंक देनी चाहिए थी.'
क्या बोले CJI?
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने भी सख्त टिप्पणी करते हुए पूछा कि इस मामले में जनहित याचिका दायर करने का अधिकार आखिर किस आधार पर बनता है. उन्होंने कहा कि अगर किसी पुजारी के कथित कदाचार से जुड़ी खबर थी, तो अदालत उस पर अलग से ट्रायल का आदेश दे सकती थी, लेकिन उससे यह अधिकार नहीं मिल जाता कि मंदिर के नियमों को चुनौती देते हुए PIL दायर कर दी जाए.
दरअसल, वकील आरके गुप्ता ने दलील दी थी कि यह याचिका महिला सदस्यों की ओर से दायर की गई थी और इसकी प्रेरणा उन खबरों से मिली थी, जिनमें एक मंदिर पुजारी के कथित अनैतिक आचरण का जिक्र था. इसके साथ ही मंदिर प्रशासन के नियमों को भी चुनौती दी गई थी. इस पूरे विवाद के बीच अदालत ने एक बड़े मुद्दे पर भी टिप्पणी की. PIL के दायरे और उसके दुरुपयोग को लेकर जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि अब जनहित याचिकाएं अपने मूल उद्देश्य से भटक चुकी हैं और “पब्लिसिटी इंटरेस्ट, पर्सनल इंटरेस्ट, पैसा इंटरेस्ट और पॉलिटिकल इंटरेस्ट लिटिगेशन” बन गई हैं.
हालांकि, याचिकाकर्ता पक्ष ने यह तर्क दिया कि चूंकि यह मामला पहले दो जजों, फिर तीन जजों और बाद में पांच जजों की बेंच से गुजर चुका है, इसलिए अब इसकी वैधता पर सवाल उठाना उचित नहीं है. उन्होंने यह भी कहा कि यह तर्क गलत है कि न्यायपालिका या राज्य धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकते.
सबरीमाला की सुनवाई में क्यों दिया गया सती प्रथा का उदाहरण
अपने तर्क रखते हुए वकील आरके गुप्ता ने सती प्रथा का उदाहरण दिया और कहा कि जब इसे खत्म किया गया था, तब भी यही तर्क दिया गया था कि यह धार्मिक मामला है और इसमें हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए. उन्होंने कहा कि समाज और सभ्यता के विकास के साथ कई प्रथाएं बदलती हैं और जो पहले स्वीकार्य था, वह अब स्वीकार्य नहीं रह गया है.
सुनवाई के दौरान उन्होंने वैदिक काल की अश्वमेध यज्ञ और पुरुषमेध यज्ञ जैसी प्रथाओं का भी जिक्र किया, जो समय के साथ खत्म हो चुकी हैं. इसी सुनवाई के दौरान एक अन्य अहम मामला भी सामने आया, जिसमें पारसी जोरोस्ट्रियन समुदाय की महिलाओं के अधिकारों से जुड़ा मुद्दा उठाया गया. वरिष्ठ अधिवक्ता डेरियस खंबाटा ने अदालत को बताया कि गुजरात हाईकोर्ट के एक फैसले के अनुसार, अगर कोई पारसी महिला गैर-पारसी पुरुष से शादी करती है, तो उसे 'डिम्ड कन्वर्जन' यानी मानी हुई धर्म परिवर्तन की स्थिति में माना जाएगा और उसे अगियारी (फायर टेंपल) में प्रवेश की अनुमति नहीं होगी.
खंबाटा ने इस फैसले को महिलाओं के अधिकारों के खिलाफ बताते हुए कहा कि यह बहुत दूरगामी असर वाला आदेश है, जो सिर्फ पारसी समुदाय तक सीमित नहीं रहेगा. उन्होंने कहा कि यह महिलाओं की गरिमा का उल्लंघन करता है और यह मान लेता है कि शादी के बाद महिला की कोई स्वतंत्र धार्मिक पहचान नहीं रहती.
जस्टिस नागरत्ना ने भी इस पर सहमति जताते हुए कहा कि शादी को आधार बनाकर इस तरह का वर्गीकरण महिलाओं के खिलाफ भेदभावपूर्ण है. उन्होंने सवाल उठाया कि धार्मिक पहचान जन्म से तय होती है, तो फिर शादी के आधार पर उसे कैसे खत्म किया जा सकता है.