ये अवसर 21-22 नवम्बर 1992 में स्वदेशी जागरण मंच के 1 साल पूरा होने पर मुंबई में हुए अधिवेशन का उदघाटन सत्र का था. संस्थापक के रूप में दत्तोपंत ठेंगड़ी को इस सत्र में सम्बोधित करके सम्मेलन की शुरूआत करनी थी. उन्होंने एक दिलचस्प बात बताई, जो आज की पीढ़ी के लिए भी हैरानी भरी हो सकती है, शायद ही कहीं इस गुमनाम नायक के बारे में कभी बताया गया हो. उन्होंने बताया कि, “इस बैठक के सभागार का नाम ‘बाबू गेनू सभागृह’ रखा गया है. स्वदेसी के इतिहास में बाबू गेनू का स्थान विशिष्ट है. दिनांक 12 दिसम्बर 1930 को मुंबई के इस कपड़ा बाजार के इस कामगार ने कालबादेवी रोड पर विदेशी वस्त्रों की गाड़ी को रोकने के प्रयास में हौतात्म्य स्वीकार कर लिया था. स्वदेसी के जागरण का सूत्रपात वैसे तो लाल-बाल-पाल तथा युवा सावरकर के समय में ही हो चुका था, किंतु इस प्रयास में प्रत्यक्ष आत्मबलिदान करने वाले प्रथम हुतात्मा ‘बाबू गेनू’ थे. उनकी स्मृति स्वदेशी भक्तों के लिए सदैव प्रेरणा दायक रहेगी’’. इस घटना से पता चलता है कि संघ कोई भी आंदोलन या अभियान हाथ में लेता है तो उसकी बुनाई बड़ी बारीकी से करता है.
संघ का एक पुराना मंत्र है, जो अक्सर आप उनके वरिष्ठ स्वयंसेवकों से सुनेंगे कि संघ देश के लोगों को दो ही भागों में बांटता है, एक जो संघ में हैं, और दूसरे जिन्हें संघ में लाना है. स्वदेशी जागरण मंच के गठन में तो ये चरितार्थ भी हुआ. दत्तोपंत ठेंगड़ी के इसी सम्बोधन की कुछ लाइनें और पढ़िए, “नागपुर बैठक की एक उपलब्धि यह भी रही कि केंद्रीय संयोजन समिति के प्रमुख के रूप में हमें डॉ. म. गो. बोकरे प्राप्त हुए. वे सुप्रसिद्ध अर्थशास्त्रज्ञ हैं तथा कुछ समय नागपुर विद्यापीठ के उपकुलपति भी रह चुके हैं. वे कट्टर मार्क्सवादी रहे हैं कम्युनिस्ट पार्टी के एक चोटी के विचारक के तौर पर उन्हें मान्यता प्राप्त थी. बौद्धिक प्रामाणिकता है, वास्तव में शास्त्र शुद्ध ढंग से विचार करते रहने के उनके स्वभाव के कारण उनके विचारों में उचित परिवर्तन हुआ. उनकी हिंदू 'Hindu Economics' यह पुस्तक आगामी मकर संक्रमण महोत्सव के शुभ मुहूर्त पर प्रकाशित होने वाली है.”
कट्टर मार्क्सवादी को बना दिया गया पहला राष्ट्रीय संयोजक
आम आदमी के लिए ये बहुत रोचक तथ्य हो सकता है कि कोई इतना कट्टर मार्क्सवादी हो और उसे स्वदेशी जागरण मंच के पहले राष्ट्रीय संयोजक के तौर पर चुन लिया जाए. इस बारे में वर्तमान में स्वदेशी जागरण मंच के राष्ट्रीय संगठन मंत्री कश्मीरी लाल ने अपने ब्ल़ॉग में लिखा है कि, “स्वदेशी जागरण मंच के प्रथम अखिल भारतीय संयोजक डॉ. एम. जी. बोकरे बने, स्वयं डॉ. बोकरे इस देश के गिने चुने मार्क्सवादी बुद्धिजीवियों में थे. डॉ. बोकरे ने एक बडे़ ग्रन्थ ‘हिन्दू-इकोनोमिक्स’ की रचना की. डॉ. बोकरे नागपुर विश्वविद्यालय के वाइस-चांसलर और अर्थशास्त्र के अध्यापक थे. उन्होंने अपने पहले उद्बोधन में कहा कि माननीय दत्तोपंत ठेंगड़ी जी को जितनी गालियां नागपुर में पड़ीं, उसमें देने वालों में पहला नाम डॉ. बोकरे का था. वही बोकरे दत्तोपंत ठेंगड़ी जी द्वारा स्थापित, स्वदेशी जागरण मंच के पहले संयोजक बने. उन्होंने कहा कि मैंने रिटायरमेन्ट के बाद हिन्दू धर्मग्रन्थों का अध्ययन किया. जैसे कौटिल्य का अर्थशास्त्र, शुक्रनीति, वेदों एवं उपनिषदों का. इनके अध्ययन के बाद मुझे लगा कि भारत में अर्थशास्त्र के अध्ययन की सुदीर्घ परम्परा रही है. इसके बाद मैंने हिन्दू इकोनोमिक्स लिखा. इस प्रकार स्वदेशी जागरण मंच का शुभारम्भ हुआ.”
स्वदेशी जागरण मंच अचानक से बनकर नहीं उठ खड़ा हो गया, संघ के संगठनों का इतिहास भी देखेंगे तो पाएंगे कि कोई संगठन अचानक बनाना भी पड़ता है तो भी उसको सही स्वरूप में आने में समय लगता है. विद्यार्थी परिषद और विश्व हिंदू परिषद इसके उदाहरण हैं. इस दौरान बहस होती हैं, देश भर के स्वयंसेवकों, विद्वानों, हितैषियों की राय ली जाती है. स्वदेशी जागरण मंच जैसे किसी संगठन की जरूरत स्वतंत्रता के बाद से ही समझ आने लगी थी. यूं स्वदेशी आंदोलन तो बंग भंग से ही शुरू हो गया था, लेकिन लगा था कि देश स्वतंत्र हो जाएगा, तो विदेशी ताकतों का हस्तक्षेप खत्म हो जाएगा. लेकिन ऐसा हुआ नहीं, 1965 का सिंधु जल समझौता जब विश्व बैंक के दवाब में हुआ था, तो संघ को यह बहुत अखरा था. गुरु गोलवलकर बाहरी दवाब में कोई निर्णय लेने के समर्थन में नहीं थे.
उसके बाद 1982 में दत्तोपंत ठेंगड़ी ने इस दिशा में एक नया शब्द दिया, ‘आर्थिक स्वतंत्रता का दूसरा संग्राम’. तभी से ये बहस और जोर पकड़ने लगी कि देश को आत्मनिर्भर बनाना पड़ेगा, शायद यहीं से आज के नारे ‘आत्मनिर्भर भारत’ का मूल निकला था. 2 साल बाद 1984 में दत्तोपंत ठेंगड़ी ने भारतीय मजदूर संघ के इंदौर अभ्यास वर्ग में कार्यकर्ताओं के सामने स्वदेशी व भारत की आर्थिक स्वतंत्रता को लेकर अपने विचार विस्तार से रखे. जाहिर है वहां देश भर की अलग अलग यूनियंस के मजदूर नेता उपस्थित थे, सो बात वहां से निकलकर देश के कौने कौने तक जानी थी और नीचे तक जानी थी. उसी साल अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के मुंबई के राष्ट्रीय अधिवेशन में भी भारत की आर्थिक स्वतंत्रता और स्वदेशी को लेकर प्रस्ताव पारित किए गए थे. इस तरह एक ही साल में देश के कौने कौने से आए मजदूरों और छात्रों के प्रतिनिधिय़ों तक स्वदेशी का विचार रोप दिया गया और जाहिर है साल भर की गतिविधियां भी इसी दिशा में होनी थीं. बिना संगठन बनाए ही स्वदेशी का जागरण तो शुरू हो चुका था.
इंदिरा गांधी के समय की आर्थिक नीतियों से ही उठने लगा था आक्रोश
दरअसल इंदिरा गांधी के समय देश के आर्थिक हालात बेहद खराब हो चले थे. ‘’अर्थव्यवस्था को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने के बजाय इंदिरा गांधी ने शिकंजा कसे रखा जिसकी वजह से (जैसा कि उम्मीद थी) कुल मिलाकर अक्षमता और भ्रष्टाचार ही बढ़ा. हालांकि अंततः 1991 में अर्थव्यवस्था का उदारीकरण हुआ, लेकिन दो दशक वैचारिक हठधर्मिता और निजी सुविधा की भेंट चढ़ गए’’. ये लाइनें जवाहर लाल नेहरू के प्रशंसक इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने बीबीसी के अपने एक लेख में लिखी थीं और इनसे साफ अंदाजा लगाया जा सकता है कि आमतौर पर संघ विरोधियों की भी यही राय थी कि इंदिरा गांधी के जमाने में अर्थव्यवस्था गर्त में ही चली गई थी. यूं इंदिरा गांधी का बैंकों के राष्ट्रीयकरण के फैसले को बैंकों की शाखाओं में बढ़ोत्तरी से कांग्रेस जायज ठहराती रही है, लेकिन उनके तमाम वित्त विश्लेषकों का मानना है कि आज (मोदी सरकार आने से पहले) एनपीए और बुरे कर्ज के जो हालात थे, वो सब इसी राष्ट्रीयकरण की देन थे, सरकारी धन था, सो उसके वापसी के सही तरीके से ना तो प्रयास किए, उलटे उसको लुटाने के नए नए तरीके खोजने में बैंकों के कर्मचारी ही जुटे रहे. बैंकों के सरकारीकरण से उनकी क्षमता में कमी आई सो अलग. रहा सहा काम चिदम्बरम काल में फोन बैंकिंग के जरिए कर दिया गया, इतना पैसा कभी एनपीए में नहीं गया था कभी.
इंदिरा गांधी के दौर में खराब आर्थिक हालातों को लेकर नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष अरविंद पानगड़िया ने दैनिक जागरण को एक विशेष साक्षात्कार में कहा था, ‘’1969 से 1976 की अवधि में बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया तथा लाइसेंस राज को और कठोर किया गया. उसी समय एमआरटीपी कानून बनाया गया जिसके तहत 20 करोड़ रुपये से ज्यादा की संपत्ति वाली कंपनी को बड़ी कंपनी मान लिया गया. जो बड़ी कंपनियां थीं, उनके लिए नियम बना दिया कि वे अधिक पूंजी निवेश वाले उद्योगों से बाहर नहीं जा सकतीं. ऐसे में रोजगार के अवसर कहां से पैदा होते? इसके अलावा कोयला और बीमा का राष्ट्रीयकरण किया गया. साथ ही श्रम कानूनों को भी कठोर बनाया गया. छोटी कंपनियों के लिए उत्पाद को लेकर आरक्षण कर दिया गया. कुछ उत्पाद ऐसे थे, जो सिर्फ छोटी कंपनियां ही बना सकती थीं. उसी दौर में चीन में इस तरह की कोई रोक टोक नहीं थी. इससे भारत पिछड़ गया और चीन का निर्यात बढ़ता चला गया”.
मनमोहन सिंह ने अर्थव्यवस्था को दुनिया के लिए खोला तो चिंता बढ़ी
1991 देश की आर्थिक नीतियों में बदलाव के लिए ऐतिहासिक साल था, पीवी नरसिंह राव के नेतृत्व में केन्द्र में कांग्रेस की सरकार बनी और उन्होंने वित्त मंत्री के तौर पर किसी नेता को नहीं बल्कि रिजर्व बैंक के पूर्व गर्वनर मनमोहन सिंह को चुना. उन्होंने जब अपने बजट भाषण में अर्थव्यवस्था को खोलने का ऐलान किया तो उस भाषण में इंदिरा गांधी की एक भी आर्थिक नीति का जिक्र ना करना भी ये बताता है कि मनमोहन सिंह भी उनसे इस मामले में खुश नहीं थे. दूसरे मनमोहन सिंह ने जिस तरह से बताया कि हमारे पास विदेशी मुद्रा भंडार इतना ही बचा है कि केवल 15 दिन के आयात का बिल चुका सकें, राजकोषीय घाटा 8 प्रतिशत तक पहुंच गया था. साफ था कि देश को आर्थिक रूप से सबल बनाने की जरुरत थी, जिसे मनमोहन सिंह ने फौरी तौर पर अर्थव्यवस्था के दरवाजे दुनियां के लिए खोलकर किया, और कई क्षेत्रों में 51 प्रतिशत तक विदेशी निवेश की अनुमति दे दी.
संघ से जुड़े आर्थिक मामलों के दिग्गज इन सभी बदलावों को बारीकी से देख रहे थे और देश पर पड़ने वाले इसके असर के भी दूरगामी परिणामों का आकलन कर रहे थे. एक दौर तो वो आया कि देश का 67 टन सोना इंगलैंड में गिरवी रखना पड़ गया. ये ऐसा माहौल था कि जिसमें पता लगाना मुश्किल था कि जो चकाचौंध विदेशी ब्रांड्स की भरमार से दिख रही है, वो आगे लाभ करेगी या ईस्ट इंडिया कम्पनी की तरह लूट कर ले जाएंगे बाकी जो बचा है वो भी.
एक साल के अंदर ही संघ को लग गया था कि एक मंच बनाने की बेहद जरूरत है, जो भारत को आर्थिक रूप से विदेशी हाथों का खिलौना बनने से रोक सके. 22 नवम्बर 1991 के दिन नागपुर में स्वदेशी जागरण मंच का गठन किया गया और स्वदेशी जागरण मंच की संचालन समिति बनायी गई. जिसमें सात प्रमुख संगठन थे. मजदूर क्षेत्र में काम करने वाला भारतीय मजदूर संघ, किसान क्षेत्र में काम करने वाला भारतीय किसान संघ, विद्यार्थियों के बीच काम करने वाला अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, शिक्षा के लिए विद्या भारती, महिलाओं के लिए काम करने वाली राष्ट्र सेविका समिति और बीजेपी भी. हालांकि अगले साल बीजेपी सम्मेलन में नहीं थी. उल्लेखनीय है कि स्वदेशी जागरण मंच का गठन एक संस्था के रुप में नहीं हुआ, बल्कि संघ के लोग उसे आंदोलन मानते हैं.
जस्टिस अय्यर ने कहा, ‘भारतीय बुद्धिजीवी अमेरिका की कालगर्ल्स बन गये हैं’
गठन के 3 महीने के बाद ही फरवरी 1992 में पहली बार 15 दिनों का पूरे देश भर में एक जन सम्पर्क अभियान किया गया. लगभग तीन लाख गांवों में मंच के कार्यकर्ता गए. सबको एक सूची दी गई, कि स्वदेशी वस्तु क्या है, विदेशी वस्तु क्या है? कौन सा ब्रांड नाम से लगता तो स्वदेशी है, लेकिन असल में विदेशी है. साथ ही जनता से आग्रह किया कि अगर हमें इस आर्थिक संग्राम में विजयी होना है तो स्वदेशी वस्तु को प्रयोग करना शुरू करें और विदेशी वस्तु का बहिष्कार करें. कश्मीरी लाल आगे लिखते हैं कि, “इसका पहला अखिल भारतीय सम्मेलन 3,4,5 सितम्बर 1993 को दिल्ली में हुआ और आपको यह जानकार आश्चर्य होगा कि उस सम्मेलन का उद्घाटन इस देश के बहुत बडे मार्क्सवादी विचारक और सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस वी.आर. कृष्ण अय्यर ने किया और उद्घाटन भाषण में उन्होंने कहा कि उन्हें उनके कई मित्रों ने इसमें आने के लिए मना किया था, क्योंकि स्वदेशी जागरण मंच आरएसएस का है, मित्रों की बातों को दरकिनार करते हुए मैं यहाँ आया हूं और मंच के माध्यम से, जस्टिस अय्यर ने कहा था कि देश का भला सोचने वाले सारे लोगों को अपने मतभेदों को दरकिनार करते हुए स्वदेशी के मंच पर आना चाहिये और देश में एक नया स्वदेशी आन्दोलन खड़ा करना चाहिए. जस्टिस अय्यर ने इस देश के नकली बुद्धिजीवियों को लताड़ा. कठित बुद्धिजीवियों के लिए कठोर शब्दों का प्रयोग किया. अंग्रेजी में उन्होंने कहा कि आज के भारतीय बुद्धिजीवी अमेरिका की कालगर्ल्स बन गये हैं. जस्टिस अय्यर ने राजनेताओं का आह्वान किया कि सारे मतभेदों को भुलाकर स्वदेशी जागरण मंच पर आइये. यह देश की आवश्यकता है”.
चंद्रशेखर जैसे समाजवादी भी जुड़े और बांटा बालासाहब देवरस का पत्रक
चन्द्रशेखर जैसे समाजवादी नेता ने भी स्वदेशी जागरण मंच के अभियान में साथ दिया था. देश के पाँच स्थानों पर इस अभियान में भाषण दिया. दिल्ली में स्वदेशी जागरण मंच के प्रेस कार्यक्रम में उनके आने से पूर्व वही पत्रक बाँटा गया जो कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक बालासाहब देवरस के नागपुर में स्वदेशी के कार्यक्रम में बांटा गया था. उन्होंने स्पष्ट किया कि जो बात बालासाहब बोलना चाहते थे, इस आर्थिक संकट के बारे में, मेरा भी वही मत है, अतः मैंने उन्हीं का प्रेस ब्रीफ जानबूझकर पहले बंटवाया है. चन्द्रशेखर समाजवादी थे, आरएसएस के आलोचक थे, लेकिन स्वदेशी के मंच पर आये. जार्ज फर्नांडीज़ बहुत बड़े समाजवादी नेता थे, एसआर कुलकर्णी पोस्ट एण्ड टेलिग्राफ वर्कर्स यूनियन के अध्यक्ष थे, वे भी स्वदेशी के मंच पर आये.
मार्क्सवादी निखिल चक्रवर्ती मुस्लिम मालिक देखकर स्वदेशी से जुड़े
दिल्ली से एक साप्ताहिक पत्रिका निकलती थी ‘मेनस्ट्रीम’, उसमें इमरजेंसी के दौरान एक कार्टून छपा, जिसमें बेटा पिता से पूछता है कि संजय गांधी ने पांच सूत्रीय कार्यक्रम का ही क्यों ऐलान किया है. तो पिता का जवाब था- ‘क्योंकि संजय गांधी को इतनी ही गिनती आती है’. इंदिरा गांधी की तरह संजय गांधी ने भी कहीं अपनी पढ़ाई पूरी नहीं की थी. सो उसको काफी बुरा लगा और वीसी शुक्ला को सम्पादक निखिल चक्रवर्ती को सबक सिखाने को कहा था. निखिल चक्रवर्ती इस घटना के बाद बहुत चर्चा में आ गए थे.
यही निखिल चक्रवर्ती जो देश के एक बडे़ वामपंथी पत्रकार-सम्पादक माने जाते थे. उनके पास जब स्वदेशी जागरण मंच के कार्यकर्ता जब पहुंचे तो वे उनकी पोशाक को देखकर भड़क गये, और बोले कि ‘सब आरएसएस वाले हैं’. जब एक कार्यकर्ता ने स्वदेशी का पत्रक दिखाया तो उसे वो बड़े ध्यान से देखते रहे और कहा कि, “लगता है आरएसएस ने नया शिगूफा छोड़ा है, अरे जनसंघ और आरएसएस, पूंजीपतियों और बनियों के पहले से दलाल हैं. और नयी आर्थिक नीतियों के कारण देशी पूंजीपति समाप्त होने वाले हैं, जिन्हे बचाने के लिए ये शिगूफा छोड़ा गया है”. पत्रक पढ़ते-पढ़ते उनकी नज़र एक जगह अटक गयी और पूछा कि ‘‘क्या प्रचार कर रहे हो, आप लोग? टॉर्च में, जीप टॉर्च लेनी चाहिये, एवररेडी नहीं लेनी चाहिये?’’
उसका मालिक तो मुसलमान है
अब निखिल चक्रवर्ती को पता था कि जो जीप वाली टॉर्च है, उसका मालिक एक मुसलमान है, उन्होंने कार्यकर्ताओं से पूछा कि, “तुम्हें पता है कि जीप टॉर्च कौन बनाता है?” तो एक कार्यकर्ता ने कहा कि, “हैदराबाद के अमन भाई बनाते हैं”. हैरान निखिल चक्रवर्ती ने फिर पूछा, ‘‘वो तो मुसलमान हैं, और तुम लोग आरएसएस वाले हो, उसका प्रचार क्यों कर रहे हो?’’ तो कार्यकर्ता ने कहा- ‘‘कुछ भी हो, जीप स्वदेशी है, इसलिए हम इसका प्रचार कर रहे हैं.’’ इतना सुनकर निखिल चक्रवर्ती का दिमाग हिल गया और जब वे देहरादून से दिल्ली आये तो एक लम्बा क़ॉलम लिखा, जिसमें देश के सभी विचारधारा वाले लोगों से आपसी मतभेद भुलाकर, स्वदेशी से जुड़ने का आग्रह किया. बाद में मद्रास में भी एक कार्यक्रम में स्वदेशी जागरण मंच की तारीफ की.
स्वदेशी जागरण मंच की कामयाबी या नाकामयाबी को लेकर तमाम तरह की बातें, कयास और मत हो सकते हैं, लेकिन इतना तय है कि यह मंच अपने नाम में लगा शब्द ‘जागरण’ करने में पूरी तरह सफल रहा. चाहे बिजली कम्पनी एनरॉन के खिलाफ लड़ाई हो, 3000 किमी की समुद्र यात्रा का अभियान चलाकर मछुआरों की समस्याओं जैसे मैकेनाइज्ड फिशिंग करने वाली विदेशी कम्पनियों के जाल को समझना हो. बाद में मछुआरों की समस्याओं को लेकर मुरारी कमेटी बैठी और उसकी रिपोर्ट का आधार पर विदेशी ट्राले का अनुबंध सरकार को रद्द करना पड़ा. सो कई सफलताएं भी थीं जैसे बीड़ी रोजगार रक्षा आंदोलन की कामयाबी, लेकिन जिस तरह यहां जैन समाज अहिंसा को लेकर मछुआरों के विरोध में आया, एनऱॉन के मामले में उनकी ही सरकार ने उसे मंजूरी दी, उससे उन्हें झटका भी लगा.
मुरलीधर राव अरसे तक स्वदेसी जागरण मंच का चेहरा रहे
इस दिशा में एक जरूरी नाम है मुरलीधर राव का, जो कभी स्वदेशी जागरण मंच का प्रमुख चेहरा हुआ करते थे. आजकल भाजपा में हैं. डंकल, गेट, डब्ल्यूटीओ जैसे विदेशी व्यापार से जुड़े मुद्दे हों, सरकारी कम्पनियों में विनिवेश का विरोध हो, स्वदेशी मेलों का आयोजन हो, वकीलों-चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के मुद्दे हों, या पशुधन संरक्षण के लिए विशाल अभियान चलाना हो, मुरलीधर राव अरसे से इन आंदोलनों को खड़ा करने के लिए मीडिया में जाने जाते रहे. लेकिन ये भी सच है कि अरसे से स्वदेशी जागरण मंच नेपथ्य में ही काम करता दिख रहा है. जानकार मानते हैं कि उसी समय रामजन्मभूमि का मुद्दा उठने से भी दिक्कतें हई हैं. आप एक साथ ही दो मुद्दों को लेकर जनता के बीच जाते हैं, तो दिक्कत होनी स्वाभाविक है.
दूसरे बीजेपी या एनडीए की सरकारों में भी स्वदेशी का अभियान आव्हान स्तर पर ज्यादा रहा. जैसे प्रधानमंत्री मोदी के खादी के लिए आव्हान ने खादी की बिक्री कई गुना पहुंचा दी, मेक इन इंडिया अभियान के चलते रक्षा उत्पादों का निर्यात कई गुना बढ़ गया है, जो पहले शून्य जैसा ही था. कभी मोबाइल कम्पनियां या हों या तमाम इलेक्ट्रोनिक्स उत्पादों की कम्पनियां, भारत में तेजी से बढ़ोत्तरी हुई है. रक्षा उत्पाद भारत के निजी क्षेत्र के लिए खोला गया है, भारत तमाम देशों के लिए कम लागत में उपग्रह प्रक्षेपण का केन्द्र बन गया है. मोदी का स्वदेसी सेमीकंडक्डर मिशन परवान चढ रहा है. केन्द्र का आत्मनिर्भर भारत अभियान वंदेमातरम के 150 वर्ष पूरा होने पर 2026 के गणतंत्र दिवस की थीम है, लेकिन केन्द्र की अपनी वैश्विक मजबूरियां भी हैं, रूस से सस्ता तेल औऱ एस-400 सिस्टम और फ्रांस के राफेल विमानों की खरीद बेहद जरूरी है.
ऐसे में स्वदेशी जागरण मंच की चर्चा जरूर इन दिनों कम हुई है, लेकिन काम नहीं थमा है, हालांकि वो शोर तभी मचाता है, जब जरूरत होती है, जैसे चीन के साथ डोकलाम हुआ तो देश में चीनी उत्पादों के खिलाफ अभियान चलाने में अहम भूमिका निभाई, लाखों पत्रक, पत्रिकाएं छपवा कर बांटी गईं थीं. हालांकि स्व विचारों की सरकार हो तो आंदोलन के मौके भी कम ही आते हैं, ज्यादातर जायज मांगें मान ही ली जाती हैं.
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