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संघ के 100 साल: RSS के पहले सिख प्रचारक की कहानी, जन्मदिन पर संघ प्रमुख ने दिए थे 85 लाख

पंजाब में जब भाषा आंदोलन शुरू हुआ तो दरारें पैदा होने लगी. इसी समय सरदार चिरंजीव सिंह जी ने एम एस गोलवलकर से संपर्क किया था. तब गोलवलकर पंजाब आए और कहा कि पंजाब में रहने वाले सभी सिखों, हिंदुओं और मुसलमानों की मातृभाषा पंजाबी है और उन्हें अपनी मातृभाषा पंजाबी के रूप में दर्ज करानी चाहिए. इस कदम ने तत्काल मरहम का काम किया. RSS के 100 सालों के सफर की 100 कहानियों की कड़ी में आज पेश है वही कहानी.

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सरदार चिरंजीव संघ के सबसे पहले सिख प्रचारक थे. (Photo: AI generated)
सरदार चिरंजीव संघ के सबसे पहले सिख प्रचारक थे. (Photo: AI generated)

ये 2015 की बात है, दिल्ली के एक कार्यक्रम में सरदार चिंरजीव सिंह की पुस्तक ‘इहि जनम तुम्हारे लेखे’ का विमोचन होना था. ये दिन भी इसलिए चुना गया था क्योंकि उस दिन उनका जन्मदिन था. विमोचन करने खुद संघ प्रमुख मोहन भागवत आए थे, पुस्तक विमोचन के बाद भागवत ने उन्हें एक बैग सौंपा और कहा कि आपके 85वें जन्मदिन पर हमारी तरफ से आपको ये छोटी सी भेंट. उस बैग में 85 लाख रुपए कैश थे. सरदार चिरंजीव सिंह की आंखों की चमक साफ बता रही थी कि वो बहुत खुश भी हैं और हैरान भी. उन्होंने वहीं ऐलान कर दिया कि इस राशि का उपयोग सिख इतिहास के शोध में खर्च किया जाएगा. उन्होंने ये धन केशव स्मारक समिति को सौंप दिया गया जिसे बाद में भाई मनि सिंह गुरमत रिसर्च एंड स्टडीज ट्रस्ट को भेज दिया गया. हमेशा सिखों की बेहतरी के लिए सोचने वाले सरदार चिरंजीव उस वक्त संघ के सबसे पुराने प्रचारक थे और सिखों में सबसे पहले.
 
2023 में जब उनकी मृत्यु हुई तो उनके परिवार से मिलने आने वालों में प्रमुख थे हरियाणा का तत्कालीन मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर. वो उन्हें अपना ‘मेंटर’ मानते थे, मीडिया ने भी ऐसे ही इस खबर को कवरेज दिया. इतने लम्बे प्रचारक जीवन में सरदार चिंरजीव ने खट्टर जैसे ना जाने कितने प्रचारकों, स्वयंसेवकों को संघ से जोड़ा और तराशा भी. सरदार चिंरजीव के नाम और जन्म की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है. सरदार चिरंजीव का जन्म एक अक्तूबर, 1930 को पटियाला में एक किसान श्री हरकरण दास (तरलोचन सिंह) तथा श्रीमती द्वारकी देवी (जोगेन्दर कौर) के घर में हुआ था. उनकी मां सरकारी विद्यालय में शिक्षिका थीं. उनके  पहले भी दो बेटे पैदा हुए थे, लेकिन वो बच नहीं पाए और बीमारी के चलते बड़ी जल्दी चल बसे. ऐसे में उनकी मां गुरुद्वारों में ही नहीं मंदिरों में भी भगवान से यही मांगती थीं कि उनके बच्चों की लम्बी उम्र हो.
 
नाम को मिला ‘जी’ का सम्मान तो RSS के हो गए

सरदार चिरंजीव का नाम भी इसलिए ये रखा गया ताकि वो लम्बी उम्र तक जिएं, लेकिन उनको क्या पता था कि उनका बेटा ना केवल लम्बी उम्र जिएगा, बल्कि हजारों जिंदगियों को जीने की राह दिखाएगा. 1944 में कक्षा सात में पढ़ते समय वे अपने मित्र रवि के साथ पहली बार शाखा गए थे. वहां के खेल, अनुशासन, प्रार्थना आदि से वे बहुत प्रभावित हुए लेकिन सबसे ज्यादा उन्हें पसंद आया कि उन्हें बाकी स्वयंसेवकों ने ‘चिरंजीव जी’ बोला. वे इस बात से प्रभावित हुए कि शाखा में कोई भी हो, छोटा या बड़ा, सब एक दूसरे के नाम के पीछे ‘जी’ लगाकर बोलते हैं. उन्होंने उसी दिन से शाखा आना शुरू कर दिया. शाखा में वे अकेले सिख थे. उसके बाद तो वो शाखा के ही होकर रह गए. 1946 में उन्होंने प्राथमिक शिक्षा वर्ग में भाग लिया. इसके बाद 1947, 50 और 52 में तीनों प्रमुख संघ शिक्षा वर्ग कर लिए. इस तरह वे प्रचारक बनने के योग्य हो गए.

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अभी प्रथम वर्ष का संघ शिक्षा वर्ग ही किया था कि गांधीजी की हत्या हो गई और संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया. स्वयंसेवकों ने इसके खिलाफ सत्याग्रह किया और हजारों स्वयंसेवकों ने देश भर में गिरफ्तारियां दीं तो सरदार चिरंजीव भी पीछे नहीं रहे और 2 महीने के लिए जेल में भी रहे. अगर वे संघ के प्रचारक ना बनते तो अध्यापक होते. विभाग प्रचारक बाबू श्रीचंद्र जी उनके काफी निकट थे, उन्होंने प्रचारक जीवन के विषय में बताया तो 1953 में प्रचारक बन गए.

RSS के सौ साल से जुड़ी इस विशेष सीरीज की हर कहानी 

मलेर कोटला, संगरूर, पटियाला, रोपड़, लुधियाना में तहसील, जिला, विभाग व सह संभाग प्रचारक रहे. लुधियाना 21 वर्ष तक उनका केन्द्र रहा। संघ शिक्षा वर्ग में वे 20 वर्ष शिक्षक और चार बार मुख्य शिक्षक रहे। 1984 में उन्हें विश्व हिन्दू परिषद, पंजाब का संगठन मंत्री बनाया गया। इस दायित्व पर वे 1990 तक रहे. वर्तमान में विश्व हिंदू परिषद के कार्याध्यक्ष आलोक कुमार ने उनकी श्रद्धांजलि सभा में कहा था कि, “जब वो संघ के द्वितीय शिक्षण वर्ग में गए तो सरदार जी वहां मुख्य शिक्षक थे. जिस समय पंजाब में आतंकवाद का दौर था. हर दिन भाजपा और संघ के लोगों की हत्याएं होती थीं. संघ ने ही हमें सिखाया कि ये सिखों की गलती नहीं है, बल्कि ये तो कुछ आतंकवादियों की गलती है और इसलिए पूरे समाज को दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए”.
 
पंजाबी भाषा के लिए गुरु गोलवलकर से की अपील

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उनके पूर्व सहयोगी और राष्ट्रीय सिख संगत के पूर्व महासचिव अवतार सिंह शास्त्री के हवाले से मीडिया में उनके बारे में एक और दिलचस्प बात पता चली, कि कैसे कटुता के दौर में सरदार चिरंजीव ने गुरु गोलवलकर से अपील की कि पंजाबी भाषा को सभी पंजाबी चाहे वो किसी भी धर्म के क्यों ना हों, पंजाबी भाषा को मातृभाषा के तौर पर दर्ज करवाएं. गुरु गोलवलकर कहेंगे तो सभी पंजाबी हिंदू भाई मान जाएंगे. अवतार सिंह ने बताया कि, “पंजाबी सूबा आंदोलन के दौरान आर्य समाज के कुछ लोगों ने पंजाबी हिंदू समुदाय से जनगणना में अपनी मातृभाषा के रूप में हिंदी का उल्लेख करने पर जोर दिया था. इससे समाज में कटुता पैदा हो गई थी. उस समय चिरंजीव सिंह जी ने एम एस गोलवलकर से संपर्क किया था... तब गोलवलकर पंजाब आए और कहा कि पंजाब में रहने वाले सभी सिखों, हिंदुओं और मुसलमानों की मातृभाषा पंजाबी है और उन्हें अपनी मातृभाषा पंजाबी के रूप में दर्ज करानी चाहिए. पंजाबी भाषा को बढ़ावा देने में चिरंजीव सिंह का बहुत बड़ा योगदान था.”

दरअसल 1961 में जनगणना होने वाली थी, और उससे काफी पहले हिंदी बनाम पंजाबी शुरू हो गया था. बाद में गुरु गोलवलकर की सलाह मानते हुए विद्या भारती के पंजाब के सैकड़ों  स्कूलों में भी पंजाबी को प्राथमिकता देना शुरू हो गया था. ‘पंजाब कल्याण फोरम’ बनाकर सभी पंजाबियों में प्रेम बनाए रखने के प्रयास भी किए जा रहे थे. 1982 में अमृतसर में एक धर्म सम्मेलन भी हुआ. 1987 में स्वामी वामदेव जी व स्वामी सत्यमित्रानंद जी के नेतृत्व में 600 संतों ने हरिद्वार से अमृतसर तक यात्रा की और अकाल तख्त के जत्थेदार दर्शन सिंह जी से मिलकर एकता का संदेश गुंजाया. अक्तूबर 1986 में दिल्ली में एक बैठक हुई. उसमें गहन चिंतन के बाद गुरु नानकदेव जी के प्रकाश पर्व (24 नवम्बर, 1986) पर अमृतसर में ‘राष्ट्रीय सिख संगत’ का गठन हो गया. सरदार शमशेर सिंह गिल इसके अध्यक्ष तथा चिरंजीव जी महासचिव बनाए गए. 1990 में शमशेर जी के निधन के बाद सरदार चिरंजीव इसके अध्यक्ष बने.

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चिरंजीव जी ने संगत के काम के लिए देश के साथ ही इंग्लैड, कनाडा, जर्मनी, अमरीका आदि में प्रवास किया. उनके कार्यक्रम में हिन्दू और सिख दोनों आते थे. 1999 में ‘खालसा सिरजना यात्रा’ पटना में सम्पन्न हुई. वर्ष 2000 में न्यूयार्क के ‘विश्व धर्म सम्मेलन’ में वे 108 संतों के साथ गए, जिनमें आनंदपुर साहिब के जत्थेदार भी थे. ऐसे कार्यक्रमों से संगत का काम विश्व भर में फैल गया. इसे वैचारिक आधार देने में पांचवें सरसंघचालक सुदर्शन जी का भी बड़ा योगदान रहा.

वर्ष 2003 में वृद्धावस्था के कारण उन्होंने अध्यक्ष पद छोड़ दिया. इसके बाद वे पहाड़गंज, दिल्ली में संगत के कार्यालय में वर्ष 2021 तक रहे. उसके बाद सरदार चिरंजीव लुधियाना संघ कार्यालय में आ गये. पिछले कुछ महीनों से अस्वस्थ चल रहे थे. 20 नवम्बर 2023 को वे इस संसार को छोड़कर चले गए. उसके बाद सरसंघचालक मोहन भागवत व सरकार्यवाह दत्रात्रेय होसबले का जो श्रद्धांजलि संदेश जो जारी किया, अरसे से इतना लम्बा श्रद्धांजलि संदेश देखा नहीं गया है.
 
क्या करती है सिख संगत

राष्ट्रीय सिख संगत की स्थापना की पृष्ठभूमि में 1984 के सिख विरोधी नरसंहार रहे हैं, ऐसा माना जाता है. 1984 में प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी की हत्या के बाद 4 हजार से अधिक सिख मारे गए थे. इससे राष्ट्रवादी विचारधारा के लोग बड़े चिंतित हुए, क्योंकि सनातन के लिए जो सिख गुरूओं और सिख योद्धाओं ने किया है, वो भुलाया नहीं जा सकता. ऐसे लोगों का मानना था कि हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए ही खालसा पंथ की स्थापना हुई थी, यानी सिख, हिन्दुत्व के रक्षक रहे हैं. हिन्दुत्व के इन रक्षकों की सामूहिक हत्या से देश में एक विचित्र स्थिति उत्पन्न हो गई थी. सिख भाई नाराज थे. ऐसे में कई राष्ट्रवादी संगठनों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन नेतृत्व से सम्पर्क किया और उनसे निवेदन किया कि समाज में किसी भी जाति, पंथ के साथ ऐसी घटना न घटे, उनका मनोबल न टूटे इसलिए एक सशक्त मंच बनाएं.

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काफी विचार-मंथन के पश्चात् राष्ट्रीय सिख संगत की स्थापना 1986 में अमृतसर की पावन धरती पर की गई. अवसर था, श्रीगुरु नानकदेव जी का प्रकाश पर्व. इसके लिए एक गरिमामय कार्यक्रम का आयोजन हुआ था और उसकी अध्यक्षता की थी लखनऊ के प्रसिद्ध सिख विद्वान सरदार शमशेर सिंह ने, यही राष्ट्रीय सिख संगत के प्रथम अध्यक्ष भी बने. इसके बाद वरिष्ठ प्रचारक सरदार चिरंजीव सिंह को अध्यक्ष का दायित्व दिया गया. इनके समय में संगत की देश में एक विशिष्ट पहचान बनी. वर्तमान में जयपुर के सरदार गुरुचरण सिंह गिल संगत के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.

राष्ट्रीय सिख संगत ने अपने 25 वर्ष के इतिहास में अनेक बड़े आयोजन किए हैं, जिनसे समाज को एक नई दिशा और सोच मिली है. कुछ वर्ष पूर्व नई दिल्ली में संगत ने उन भक्तों और भट्टों के वंशजों को सम्मानित किया था, जिनकी वाणी श्री गुरुग्रंथ साहिब में हैं. 300 साला गुरुता गद्दी वर्ष के अवसर पर श्री हजूर साहिब (नांदेड़) में संगत द्वारा लंगर का आयोजन किया गया. इसके अलावा शहीदी प्रदर्शनी, शस्त्र प्रदर्शनी आदि भी आयोजित हुर्इं. इससे पूर्व मुम्बई में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों ने पथसंचलन किया और दादर स्थित गुरुद्वारे में मत्था टेका.

सिख संगत के प्रयास से ही श्री गुरु गोविन्द सिंह द्वारा औरंगजेब को लिखे गये पत्र ‘जफरनामा’ पर नई दिल्ली में संगोष्ठी हुई और उसका हिन्दी अनुवाद भी पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया गया. श्री गुरु गोविन्द सिंह जी ने ‘जफरनामा’ के माध्यम से औरंगजेब को उसकी कमियां गिनाई थीं और उसे चेताया भी था. गुरुओं की वाणी को लोगों तक पहुंचाने के लिए राष्ट्रीय सिख संगत की एक मासिक पत्रिका "संगत संसार" भी है. कुल मिलाकर राष्ट्रवादी सिखों का एक मंच है ऱाष्ट्रीय सिख संगत, जिसे अपने हिंदू रिश्तों पर आपत्ति नहीं गर्व है.

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पिछली कहानी: वो चेहरे जो सनातन और संघ के इतिहास लेखन की नींव के पत्थर हैं 

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