महाकुंभ के आयोजन से प्रयागराज की चर्चा विश्वभर में है. इस विशाल धार्मिक आयोजन में दशनामी नागा संन्यासियों की परंपरा का खास महत्व है. चे संन्यासी न सिर्फ सनातन के रक्षक हैं, बल्कि अध्यात्म के प्रेरणा भी हैं. इस परंपरा के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व को इतिहासकार यदुनाथ ने बहुत स्पष्ट तरीके से अपनी किताबों में दर्ज किया है. इसे लेखक धनंजय चोपड़ा ने भी अपनी पुस्तक "भारत में कुंभ" में रेखांकित किया है.
दशनामी नागा संन्यासी आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित एक विशिष्ट परंपरा का हिस्सा हैं. यह परंपरा संन्यासियों को चार विभागों में विभाजित करती है. यह न सिर्फ परंपरा का वर्गीकरण है, बल्कि यह संन्यासियों की आध्यात्मिक उन्नति के स्तर का आधार भी है. इन संन्यासियों का वर्गीकरण कुटीचक, बहुदक, हंस और परमहंस के तौर पर वर्गीकृत किया गया है.
कुटीचक: ये वे संन्यासी होते हैं जो सांसारिक मोह-माया से पूरी तरह मुक्त होकर जंगलों में एक कुटी बनाकर रहते हैं. धार्मिक चिंतन, पूजा, और ध्यान में लगे रहते हैं. ये किसी यात्रा या सामाजिक गतिविधियों में भाग नहीं लेते और भिक्षाटन में जो भी मिलता है, उसी पर निर्भर रहते हैं.
बहुदक: बहुदक संन्यासी भ्रमणशील होते हैं और भिक्षा में केवल अन्न आदि ही ग्रहण करते हैं. इनके लिए एक स्थान पर तीन दिनों से अधिक रुकना वर्जित होता है. ये अपनी यात्रा के माध्यम से धर्म का प्रचार करते हैं. इनका उद्देश्य देशाटन ही होता है और ये लगातार तीर्थों का भ्रमण करते रहते हैं.
हंस: हंस संन्यासी वे होते हैं जो वेदांत दर्शन में पारंगत होते हैं. इनका उद्देश्य परब्रह्म का संपूर्ण ज्ञान प्राप्त करना होता है. वे योगाभ्यास और भिक्षा पर निर्भर रहते हैं और समाज को आध्यात्मिक शिक्षा प्रदान करते हैं.
परमहंस: परमहंस आध्यात्मिक विकास की सर्वोच्च स्थिति है. यह माना जाता है कि इस स्तर के संन्यासियों ने मोक्ष प्राप्त कर लिया होता है और उनकी आत्मा परब्रह्म में लीन हो चुकी होती है. इन्हें मानव समाज का सर्वोच्च शिक्षक और आध्यात्मिक ज्ञान का परम आचार्य माना जाता है. वर्तमान में, इन्हीं को महामंडलेश्वर और आचार्य महामंडलेश्वर का पद प्रदान किया जाता है.
दशनामी नागा संन्यासियों के वर्ग
दशनामी नागा संन्यासियों को दो प्रमुख वर्गों में विभाजित किया गया है:
शास्त्रधारी: ये संन्यासी शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और अपने आध्यात्मिक, धार्मिक, और वैचारिक विकास पर ध्यान केंद्रित करते हैं. ये समाज को धार्मिक और आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करते हैं.
शस्त्रधारी: शस्त्रधारी नागा संन्यासी धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए अस्त्र-शस्त्र चलाने में निपुण होते हैं. इनका उद्देश्य हिंदू सनातन धर्म की रक्षा करना होता है. परिस्थितियों के अनुसार, ये शास्त्र और शस्त्र दोनों का उपयोग करते हैं.
महाकुंभ जैसे आयोजनों में दशनामी नागा संन्यासियों की उपस्थिति आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं की सुरक्षा का प्रतीक है. ये संन्यासी पेशवाई के दौरान अपने शस्त्रों और पारंपरिक वेशभूषा के साथ अखाड़ों की प्रतिष्ठा को दर्शाते हैं. महाकुंभ के दौरान नागा संन्यासी अपने दोनों पहलुओं को प्रस्तुत करते हैं. इनमें शास्त्र और शस्त्र दोनों ही शामिल हैं. वे धार्मिक प्रवचन और योग साधना के माध्यम से श्रद्धालुओं का मार्गदर्शन करते हैं. साथ ही, वे अखाड़ों की मर्यादा और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अपनी शस्त्र कौशल का प्रदर्शन भी करते हैं.
महाकुंभ में दशनामी नागा संन्यासियों के नेतृत्व का केंद्र महामंडलेश्वर और आचार्य महामंडलेश्वर होते हैं. ये पद उन्हें उनकी आध्यात्मिक योग्यता और अखाड़ों में योगदान के आधार पर प्रदान किए जाते हैं.
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संन्यासी के लिए जरूरी नियम
1. भिक्षाटन के लिए जाते समय संन्यासी दो वस्त्रों में होगा. एक वस्त्र से कमर के नीचे और घुटनों के ऊपर के हिस्से के ढकेगा और दूसरा वस्त्र कंधे पर रखेगा.
2. किसी भी संन्यासी को सात से अधिक घरों से भिक्षा मांगने की मनाही है, हालांकि इस नियम में कुटीचक शामिल नहीं है.
3. प्रत्येक संन्यासी रात-दिन में केवल एक बार ही भोजन ग्रहण करना होता है.
4. संन्यासी को बस्ती से दूर अपनी कुटी बनानी चाहिए.
5. संन्यासी को भूमि पर शयन करना चाहिए.
6. संन्यासी न तो किसी का अभिवादन करेगा, न ही प्रशंसा और न ही किसी की निंदा ही करेगा.
7. वह केवल अपने से श्रेष्ठ और अपने से पूर्वकालीन संन्यासी को ही प्रणाम करेगा या अभिवादन करेगा.
8. संन्यासी केवल गेरुआ रंग का ही वस्त्र धारण करेगा