मिडिल ईस्ट में युद्ध की आग भड़की हुई है. कच्चे तेल की कीमतें उफान पर हैं. दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं दबाव में हैं. एक के बाद एक देश पेट्रोल-डीजल महंगा कर रहे हैं. लेकिन भारत में एक अलग ही तस्वीर दिख रही है. यहां मई 2022 से पेट्रोल और डीजल की कीमतें लगभग जस की तस बनी हुई हैं.
पिछले 50 से ज्यादा दिनों में अफरा-तफरी के बीच भारत के पेट्रोल पंपों पर 'चमत्कार' हो रहा था. स्कूटर और कारों की टंकियां उसी दर पर भरती रहीं, जो चार साल पहले थी. डेटा एग्रीगेटर globalpetrolprices. com के मुताबिक, भारत से उलटा 120 से ज्यादा देश ईंधन की कीमतों में 40 फीसदी तक बढ़ोतरी कर चुके हैं.
दिलचस्प बात ये है कि भारत इस मामले में लगभग अकेला नहीं है. मेडागास्कर जैसे कुछ गिने-चुने देशों ने भी कीमतें स्थिर रखी हैं. लेकिन किसी बड़ी अर्थव्यवस्था ने भारत जैसा कदम नहीं उठाया. दुनिया के हालात देखें तो तस्वीर साफ है. अमेरिका, जिसके पास तेल भंडार और रिफाइनिंग क्षमता है, उसने भी कीमतें बढ़ाईं.
28 फरवरी को ईरान के साथ युद्ध शुरू होने के बाद से अमेरिका ने गैसोलीन (पेट्रोल) की कीमतों में 40 फीसदी तक की बढ़ोतरी की है. फरवरी में अमेरिका में रेगुलर गैसोलीन की राष्ट्रीय औसत कीमत करीब 2.94 डॉलर प्रति गैलन था, वहीं अप्रैल की शुरुआत तक ये 4.11 से 4.14 डॉलर तक पहुंच गया.
पड़ोस में पाकिस्तान ने पेट्रोल की कीमत 42.7 फीसदी बढ़ाकर 458.40 पाकिस्तानी रुपए प्रति लीटर कर दी. पाकिस्तान के पेट्रोलियम मंत्री अली परवेज मलिक ने कहा कि कीमतों में यह बढ़ोतरी आपूर्ति और मूल्य निर्धारण में वैश्विक अस्थिरता के कारण हुई है.
नेपाल और श्रीलंका भी पाकिस्तान की राह पर चले. बांग्लादेश ने चुनाव के बाद कीमतें बढ़ा दीं. ईंधन की कीमतें सिर्फ गाड़ियों तक सीमित नहीं होतीं. ये सीधे महंगाई को प्रभावित करती हैं. कच्चा तेल महंगा होता है तो उद्योगों की रफ्तार धीमी पड़ती है. सरकारों पर वित्तीय दबाव बढ़ता है. भारत जैसे देश के लिए ये और चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि यहां करीब 90 फीसदी तेल आयात होता है.

चीन ने इस चुनौती को अलग तरीके से संभाला. उसने कीमतों में करीब 20 फीसदी की बढ़ोतरी की है, लेकिन उद्योगों और नागरिकों को राहत देने के उपाय भी किए है. उसने संतुलन बनाने की कोशिश की है. भारत में कीमतें स्थिर हैं, लेकिन ये मतलब नहीं कि लागत नहीं बढ़ी है. मैक्वेरी ग्रुप की एक रिपोर्ट के अनुसार, यहां सरकारी तेल कंपनियों को पेट्रोल पर 18 रुपए और डीजल पर 35 रुपए प्रति लीटर का नुकसान है.
दिल्ली में पेट्रोल 94.77 रुपए और डीजल 87.67 रुपए प्रति लीटर है. कुछ निजी कंपनियों ने हल्की बढ़ोतरी की, लेकिन सरकारी कंपनियों ने ईंधन की कीमतों को नहीं छुआ. सरकार ने इथेनॉल ब्लेंडिंग को बढ़ावा दिया है, ताकि आयात कम करना पड़े. इसके साथ ही एक्साइज ड्यूटी में कटौती करके कंपनियों का बोझ कम किया गया है.
हालांकि, अंदरखाने ये भी चर्चा है कि सरकारी तेल कंपनियां कीमतें बढ़ाना चाहती हैं. ऐसे में सवाल है कि तेल की कीमतें बढ़ क्यों नहीं रहीं? इस सवाल का जवाब सियासी गलियारे में छिपा दिखता है. कई राज्यों जैसे कि पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में चुनाव हो रहे हैं. 4 मई को नतीजे आने हैं. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर व्यंग्यकार और स्तंभकार कमलेश सिंह लिखते हैं, ''28 अप्रैल 'टैंकफुल डे' है". वो पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के मतदान के अंतिम दिन का ज़िक्र कर रहे हैं.
चुनाव के मद्देनजर पेट्रोल-डीजल की कीमतें स्थिर रखकर बताने की कोशिश की जा रही है कि सब सरकार के नियंत्रण में है. बांग्लादेश का उदाहरण भी यही दिखाता है. वहां भी चुनाव के बाद ही कीमतें बढ़ाई गईं. वहां शनिवार (18 अप्रैल) को पेट्रोल की कीमतें 19 टका बढ़ाकर 135 टका प्रति लीटर और डीजल की कीमतें 15 टका बढ़ाकर 115 टका कर दी गईं.
भारत ने उसे डीजल सप्लाई कर मदद भी की, लेकिन वहां लोगों को पेट्रोल के लिए घंटों कतार में लगना पड़ा. भारत ने अपने ईंधन की सप्लाई को सुरक्षित बताया है. मार्च के आखिर में PIB ने कई रिपोर्टों में कहा गया कि घबराने की कोई जरूरत नहीं है. 27 मार्च को X पर पोस्ट PIB ने लिखा, "भारत के पास कुल 74 दिनों की रिजर्व क्षमता है और मौजूदा स्टॉक करीब 60 दिनों का है."
हालांकि, सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि ईंधन उपलब्ध रहे और LPG सिलेंडरों के मामले में देखी गई घबराहट जैसी कोई स्थिति पैदा न हो, फिर भी कीमतें बढ़ना तय है. इस बीच राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो चुकी है. विपक्ष का आरोप है कि चुनाव खत्म होते ही ईंधन की कीमतें बढ़ेंगी. वहीं सत्ता पक्ष पर दबाव है कि वह महंगाई को काबू में रखे. हालांकि, अंतरराष्ट्रीय हालात तेजी से बिगड़ रहे हैं.
सोमवार को ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत 6.10 फीसदी बढ़कर 95.89 डॉलर प्रति बैरल हो गई. ऐसा तब हुआ जब अमेरिका ने होर्मुज के पास ईरान के झंडे वाले एक जहाज को ज़ब्त कर लिया. ईरान ने अमेरिकी सैन्य जहाजों पर ड्रोन हमले किए. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चेतावनी दी है कि मुश्किल समय आने वाला है. भारत को कोविड के समय की तरह ही एकजुट होकर खड़ा होना होगा.
होर्मुज की नाकेबंदी और खाड़ी क्षेत्र में तेल के बुनियादी ढांचे में लगी आग की वजह से स्थिति इतनी जल्दी सामान्य नहीं होगी. इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी ने कहा है कि यह दुनिया के लिए अब तक का सबसे बड़ा तेल संकट है. लेकिन क्या भारतीयों को सच में कोई झटका महसूस हो रहा है? LPG की कमी और फैक्ट्रियों से गैस का डायवर्जन छोड़कर, उन्हें तो ऐसा कुछ महसूस नहीं हो रहा.
फिलहाल तो पेट्रोल पंपों पर सब सामान्य दिख रहा है. लेकिन ये 'चमत्कार' कब तक चलेगा, इसका जवाब शायद भविष्य में ही मिल पाएगा.