मिडिल ईस्ट में ईरान और इजरायल-ईरान क्षेत्र में बढ़ते तनाव और युद्ध की स्थितियों ने वैश्विक स्तर पर ही नहीं, बल्कि सूरत की गलियों में गूंजने वाली लूम्स की आवाजों पर भी ब्रेक लगा दिया है. गुजरात का सूरत, जिसे भारत की 'सिल्क सिटी' कहा जाता है, आज अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीतिक तनाव की मार झेल रहा है. पश्चिम एशिया में बढ़ते युद्ध के संकट ने सूरत की धड़कन कहे जाने वाले टेक्सटाइल उद्योग की कमर तोड़ दी है. इसके साथ ही होली के बाद श्रमिकों का वापस न लौटना और रसोई गैस की ब्लैक मार्केटिंग जैसी समस्याओं ने इस संकट को और गहरा कर दिया है.
शहर की वीविंग यूनिटों ने कच्चे माल की आसमान छूती कीमतों, श्रमिकों की कमी और निर्यात में आई भारी गिरावट को देखते हुए उत्पादन को 50% तक घटाने का ये फैसला स्टॉक जमा होने और घाटे को नियंत्रित करने के लिए लिया गया है. अब ज्यादातर पावरलूम यूनिट्स 24 घंटे की दो शिफ्ट की जगह सिर्फ एक शिफ्ट (12 घंटे) में ही चलाई जा रही हैं. फेडरेशन ऑफ गुजरात वीवर्स एसोसिएशन (FOGWA) के अनुसार, ये कदम बिजली बिल और मजदूरी के बढ़ते खर्च को नियंत्रित करने के लिए उठाया गया है.
यार्न की कीमतों में भारी उछाल
सूरत के कपड़ा उद्योग के लिए सबसे बड़ी चुनौती कच्चे माल यानी 'यार्न' की बढ़ती कीमतें बन गई हैं. सिंथेटिक धागा पेट्रोलियम उत्पादों से तैयार होता है और युद्ध के कारण कच्चे तेल की कीमतों में आए बदलाव ने इसे महंगा कर दिया है.
फेडरेशन ऑफ गुजरात वीवर्स एसोसिएशन के उपाध्यक्ष हरी भाई कथिरिया ने आजतक से बातचीत करते हुए कहा कि सूरत में करीब 7 लाख पावरलूम मशीनें चलती हैं और हर रोज 6 करोड़ मीटर कपड़े का उत्पादन होता है. प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से करीब 20 लाख लोग इस उद्योग से जुड़े हुए हैं.
अब एक शिफ्ट में होगा काम
उन्होंने बताया कि युद्ध के कारण सबसे बड़ा असर 'यार्न' पर पड़ा है. यार्न के दाम दिन-प्रतिदिन बढ़ रहे हैं, जिसने हमारी कमर तोड़ दी है. आज हम जो भी उत्पादन कर रहे हैं, वह घाटे में है. मार्केट में कपड़े की मांग नहीं है और जो कपड़ा बिकता भी है, उसका भुगतान वक्त पर नहीं मिल रहा है. बिजली बिल, कर्मचारियों की तनख्वाह और अन्य खर्चों को देखते हुए वीवर्स ने ये निर्णय लिया है कि अब मशीनें 24 घंटे के बजाय केवल एक शिफ्ट (12 घंटे) ही चलाई जाएंगी, ताकि उद्योग पूरी तरह ठप न हो जाए.
उधर, वीविंग इंडस्ट्री चलाने वाले जयसुख भाई झालावाड़िया ने कहा कि दीपावली के बाद से ही मंदी चल रही थी, लेकिन युद्ध के कारण कच्चे माल (रॉ मटेरियल) की भारी कमी हो गई है. यार्न की कीमतों में 35-40% की बढ़ोतरी हुई है.
मजदूरों का पलायन
दूसरी ओर गैस की कमी और ब्लैक मार्केटिंग की वजह से मजदूर यहां से जा रहे हैं. आज हमारे पास आधा स्टाफ भी नहीं बचा है. हम नुकसान सहकर भी इंडस्ट्री चलाने की कोशिश कर रहे हैं. मजदूर बार-बार कहते हैं कि उन्हें गैस सिलेंडर नहीं मिल रहा है. ब्लैक में सिलेंडर 4,000 से 5,000 रुपये में मिल रहा है जो उनकी क्षमता से बाहर है. अगर हम एक शिफ्ट में काम करते हैं, तब भी बिजली का फिक्स्ड चार्ज और लेबर चार्ज तो पूरा ही लगता है, जिससे हमारा बहुत बड़ा नुकसान हो रहा है.