ईरान-अमेरिका युद्ध के कारण भारत से बासमती चावल का निर्यात बुरी तरह प्रभावित हो रहा है. ईरान, जो भारत का सबसे बड़ा बाजार है, वहां अनिश्चितता बढ़ने से व्यापार ठप पड़ने की स्थिति में है. रियाल की गिरावट, बढ़ती तेल कीमतें और टैरिफ के असर से भारतीय निर्यातकों की चिंता बढ़ गई है.
ईरान पर इजरायल और अमेरिका के हमलों और ईरानी ऑयल फील्ड्स पर खतरे की आशंका ने पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ा दिया है. इस बढ़ती अनिश्चितता का सीधा असर भारत के आर्थिक हितों पर दिखाई देने लगा है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने लगी हैं, जिससे भारत जैसे आयातक देशों पर अधिक बोझ पड़ सकता है. लेकिन तेल के साथ-साथ एक और बड़ा क्षेत्र प्रभावित हो रहा है, वह है भारतीय बासमती चावल का निर्यात. ईरान भारतीय बासमती चावल का सबसे बड़ा बाजार है, और इस युद्ध से इस व्यापार पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं. आपको बता दें कि साल 2025 में अकेले भारत ने ईरान को 10,944 करोड़ रुपये का बासमती चावल एक्सपोर्ट किया था.
ईरान में बासमती की बड़ी मांग
युद्ध की स्थिति बनने से पहले पिछले दो महीनों में ईरानी आयातकों ने भारत से बड़ी मात्रा में बासमती चावल के ऑर्डर दिए थे. इस बढ़ती मांग का असर भारत के स्थानीय बाजारों में भी दिखा और बासमती चावल की कीमत करीब 10 रुपये प्रति किलो तक बढ़ गई. निर्यातकों को उम्मीद थी कि यह साल अच्छा रहेगा, लेकिन जैसे ही युद्ध की खबरें तेज हुईं, बाजार में अनिश्चितता बढ़ गई. अब निर्यातकों को चिंता है कि दिए गए ऑर्डर पूरे हो पाएंगे या नहीं और भुगतान समय पर मिलेगा या नहीं.
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कुल निर्यात में ईरान और इराक की बड़ी हिस्सेदारी
ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के अनुसार, भारत से होने वाले कुल बासमती चावल निर्यात का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा ईरान को जाता है, जबकि करीब 20 प्रतिशत निर्यात इराक को होता है. इन दोनों देशों को मिलाकर हर साल 20 लाख टन से ज्यादा बासमती चावल भेजा जाता है, जिसकी कुल कीमत 18,267 करोड़ रुपये से अधिक है. पिछले वर्ष भारत ने लगभग 10,944 करोड़ रुपये का बासमती चावल सिर्फ ईरान को निर्यात किया था. ऐसे में अगर युद्ध लंबा खिंचता है तो यह व्यापार बुरी तरह प्रभावित हो सकता है. डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ कमर्शियल इंटेलिजेंस एंड स्टेटिस्टिक्स (DGCIS) के मुताबिक भारत ने साल 2024-25 के दौरान ईरान को 8,897 करोड़ रुपये के कृषि उत्पादों का एक्सपोर्ट किया, जिसमें से 6,374 करोड़ रुपये तो अकेले बासमती का हिस्सा है. कुल बासमती एक्सपोर्ट में ईरान का हिस्सा इस समय 12.67 फीसदी है.
ट्रांजिट में फंसी खेप और भुगतान की चिंता
निर्यातकों के अनुसार, युद्ध शुरू होते ही भारत से ईरान जाने वाला बासमती चावल लगभग ठप हो गया है. एक बड़ी खेप अभी ट्रांजिट में है, लेकिन मौजूदा हालात में यह साफ नहीं है कि ईरानी आयातक उस माल की डिलीवरी ले पाएंगे या नहीं. यदि भुगतान में देरी होती है या माल वापस लौटता है, तो भारतीय व्यापारियों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है. इसके अलावा भारत से ईरान जाने वाली चाय का निर्यात भी प्रभावित होने की आशंका है. वर्ष 2024-25 में भारत ने करीब 700 करोड़ रुपये की चाय ईरान को निर्यात की थी, जो अब जोखिम में है.
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ईरान की कमजोर अर्थव्यवस्था और गिरती करेंसी
युद्ध से पहले ही ईरान की अर्थव्यवस्था राजनीतिक अस्थिरता और अंदरूनी विरोध के कारण दबाव में थी. हाल ही में अमेरिका ने ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगाने की घोषणा की थी. इसका असर ईरान की करेंसी रियाल पर पड़ा और उसकी कीमत लगभग 50 प्रतिशत तक गिर गई. रियाल की कमजोरी से वहां के लोगों की खरीदने की क्षमता काफी कम हो गई है. ऐसे में महंगा बासमती चावल खरीदना ईरानी आयातकों और उपभोक्ताओं दोनों के लिए मुश्किल हो सकता है.
मध्य एशिया के बाजार पर भी असर
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि युद्ध लंबा चलता है तो इसका असर केवल ईरान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे मध्य एशिया में चावल के निर्यात पर असर पड़ेगा. इराक को होने वाला निर्यात भी प्रभावित हो सकता है. इससे भारतीय बासमती उद्योग, किसानों और व्यापारियों को बड़ा झटका लग सकता है.
आगे क्या हो सकता है?
फिलहाल स्थिति अनिश्चित है. यदि हालात जल्दी सामान्य नहीं होते, तो निर्यातकों को नए बाजारों की तलाश करनी पड़ सकती है. साथ ही सरकार को भी व्यापारियों के हितों की रक्षा के लिए कदम उठाने होंगे. बासमती चावल भारत के लिए एक महत्वपूर्ण निर्यात उत्पाद है, और इस पर संकट का असर सीधे किसानों और अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा. इसलिए सभी की नजर अब पश्चिम एशिया की स्थिति पर टिकी हुई है.