ईरान युद्ध के चलते दुनिया में बढ़ती आर्थिक अनिश्चितता के बीच भारत एक ऐसे दौर में खड़ा है, जहां जोखिम भी हैं और नए मौके भी. इस बीच पेरिस में जी7 वित्त मंत्रियों की बैठक ऐसे समय में हो रही है, जब ईरान संघर्ष के कारण भू-राजनीतिक तनाव बढ़ा है और तेल की कीमतों में उछाल आया है.
भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता ऊर्जा की है. ईरान और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास किसी भी तरह का तनाव कच्चे तेल की आपूर्ति और कीमतों पर सीधा असर डाल रहा है. भारत अपनी जरूरत का 80 प्रतिशत से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजारों में उतार-चढ़ाव का असर अधिक पड़ सकता है.
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से घरेलू उपभोग और औद्योगिक लागतों पर भी असर पड़ने का खतरा है. ईंधन, परिवहन, लॉजिस्टिक्स और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की लागत बढ़ सकती है. इससे भारतीय रिज़र्व बैंक की मॉनेटरी पॉलिसी तय करना और मुश्किल हो सकता है, खासकर ऐसे समय में जब बाजार ब्याज दरों में नरमी की उम्मीद कर रहे हैं.
वैश्विक बॉन्ड बाजार में हो रही बिकवाली भारत जैसे उभरते बाजारों के लिए एक और प्रमुख चिंता का विषय है. निवेशक यह अनुमान लगा रहे हैं कि ऊर्जा की बढ़ती कीमतों से होने वाले मुद्रास्फीति के दबाव के कारण केंद्रीय बैंकों को ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची रखनी पड़ सकती हैं. अमेरिकी बॉन्ड यील्ड बढ़ने से भारत जैसे बाजारों से विदेशी निवेश निकल सकता है. इससे रुपये पर दबाव पड़ सकता है.
भारतीय बाजारों पर असर शुरू
भारतीय बाजारों में दबाव दिखना शुरू हो गया है. वैश्विक बॉन्ड यील्ड में वृद्धि और कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के बीच, रुपया सोमवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 96.2 के नए रिकॉर्ड निचले स्तर पर आ गया. कमजोर रुपया भारत की आयात लागत को और बढ़ा देता है.
मध्य पूर्व में चल रही उथल-पुथल के चलते कच्चे तेल की वैश्विक कीमतों में आई भारी वृद्धि के बाद सरकार ने पिछले हफ्ते पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 3 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की थी.
दिल्ली में पेट्रोल की कीमतें अब 98 रुपये प्रति लीटर के करीब पहुंच गई हैं, जबकि कई प्रमुख शहरों में डीजल की कीमतें 90 रुपये प्रति लीटर से ऊपर हो गई हैं.
विश्लेषकों का मानना है कि अगर भू-राजनीतिक तनाव जारी रहता है और कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रहती है, तो आने वाले महीनों में ईंधन की कीमतें बढ़ सकती हैं. हालांकि, बदलते वैश्विक आर्थिक माहौल से भारत के लिए रणनीतिक अवसर भी पैदा हो सकते हैं.
जी7 सम्मेलनों में एक बड़ा मुद्दा चीन पर निर्भरता कम करना है, खासकर क्रिटिकल मिनरल्स, रेयर अर्थ्स और इलेक्ट्रिक वाहन, सेमीकंडक्टर व रिन्यूएबल एनर्जी से जुड़ी सप्लाई चेन के मामले में. इससे सरकार द्वारा शुरू की गई पहलों, जैसे उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन योजनाओं, सेमीकंडक्टर निर्माण योजनाओं और क्रिटिकल मिनरल्स से संबंधित साझेदारियों को गति मिल सकती है.
भारत के लिए भू-राजनीतिक संतुलन बनाए रखना लगातार मुश्किल होता जा रहा है. भारत ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक हितों को ध्यान में रखते हुए अमेरिका, रूस, ईरान और खाड़ी देशों के साथ संबंध बनाए हुए है.
(Input: Karishma Asoodani)