
किसी बनती हुई सड़क के किनारे खड़ी मशीनें, गर्मी-बरसात को रोकने की नाकाम कोशिश करते टेंट और बिखरे पड़े ये चंद बर्तन. ये सब उन मजदूरों की कहानी का हिस्सा हैं जो आग उगलते मौसम में यहां काम करते हैं. इनके लिए ये संघर्ष किसी 'अग्निपथ' से कम नहीं.
मजदूरों के इस दर्द को बेहतर समझने के लिए हम नोएडा के एलिवेटिड रोड पहुंचे. ये नोएडा के सेक्टर 61 को सेक्टर 18 से जोड़ती है. इसपर पिछले डेढ़ महीने से मरम्मत का काम चल रहा था.
मरम्मत का ये काम ऐसे वक्त पर हुआ जब दिल्ली-NCR में सूरज आग बरसा रहा था. ऐसा मौसम जिसमें कोई बाहर निकलने से पहले दस बार सोच रहा था. भयंकर गर्मी और लू के टॉर्चर के बीच ये मजदूर न सिर्फ उस पुल की मरम्मत कर रहे थे, बल्कि उसी पुल पर रात को सोने को भी मजबूर थे.
सोचिए जिस 48 डिग्री वाली धूप में लोग एसी-कूलर से अलग हटने की सोच भी नहीं सकते, उस वक्त ये मजदूर खुली धूप में पुल पर थे. यहां सोने, सिर छिपाने के लिए इनके पास थे बस कुछ तंबू जो नाकाफी थे.

गर्मी की वजह से टिक नहीं पाते थे मजदूर
पुल की मरम्मत कर रहे राहुल ने हमें बताया कि करीब 16 लोग इस जगह काम कर रहे थे. कुछ ऐसे भी थे जो गर्मी की वजह से वहां टिक नहीं पाए और वापस चले गए. आप क्यों वापस नहीं गए? इस सवाल पर राहुल बोले, 'गरीबी ऐसी चीज है कि संघर्ष तो करना ही पड़ेगा.'
'गालियां भी सुनते हैं, लेकिन चुप रहने को मजबूर'
राहुल ने आगे बताया कि वे लोग रात को यहां काम करते और दिन में उसी गर्म तारकोल पर आराम. क्या सोने का कोई और इंतजाम नहीं था? इस सवाल पर राहुल ने बताया कि उन लोगों ने ठेकेदार से ये बात कही थी तो उसने कहा कि तंबू में ही सोना पड़ेगा.

राहुल आगे बताते हैं, 'ठेकेदार तो AC में रहता है. हम लोगों की दिक्कत से उसे फर्क नहीं पड़ता. वह तो आता है और काम के लिए डांटकर चला जाता है.'
काम के लिए बिहार से नोएडा आए राहुल कहते हैं, 'यहां आने पर लोगों की गालियां भी सुननी पड़ती हैं. लेकिन मैं किसी को पलटकर जवाब नहीं देता क्योंकि क्या पता सड़क पर सोने वाले मुझ गरीब पर कौन गाड़ी चढ़ा दे.'
इस डांट और गालियों के अलावा राहुल जैसे मजदूरों के सामने एक बड़ा संकट और भी है. दरअसल, इनके लिए खाने-पीने का भी कोई ठीक बंदोबस्त नहीं है. इन लोगों को इस चलती सड़क, धूल-मिट्टी में ही खाना बनाना पड़ता है और गर्मी से खौलता पानी पीना पड़ता है. इसके अलावा पानी भी जब ही मिल पाता है जब टैंकर आए. अगर वह नहीं आया तो घंटों प्यासा भी रहना पड़ जाता है.
यानी 48 डिग्री की झुलसाती गर्मी में सड़क पर रहते हुए इनको धूल-मिट्टी में बनी सब्जी और पत्थर से भी कड़क हो चुकी रोटी से भी पेट भरना पड़ता है.

जो उपकरण मिले वो भी नाकाफी
रहने-खाने की दिक्कतों के साथ ये मजदूर सड़क बनाने का जो काम कर रहे हैं वह भी कम खतरनाक नहीं है. इसके लिए मिले उपकरण भी ऐसे हैं जो इतनी गर्मी में दगा दे जाते हैं. बातचीत में मजदूरों ने बताया कि ठेकेदार उनको दस्ताने आदि देता है लेकिन गर्मी में उन्हें पहनकर काम करना नामुमकिन है. वहीं गर्मी सड़क पर काम करते-करते जो इनकी चप्पलों का हाल होता है, उसकी तस्वीर भुलाए नहीं भूल सकती.
अब इस पुल का काम तो पूरा हो चुका है. ये मजदूर अब अगले सफर या यूं कहें संघर्ष पर निकल चुके हैं. शायद यही सोचकर कि पक्की सड़क को छोड़कर चलना होगा, कि मेर घर का रास्ता अभी कच्चा है...