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बिहार SIR पर सुनवाई में आया ट्रंप का जिक्र, EC बोला- उन्होंने मादुरो को उठाया, अब ग्रीनलैंड मांग रहे

बिहार में SIR को लेकर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई के दौरान अमेरिका के न्यायिक प्रोसेस और डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयानों का जिक्र किया. याचिकार्ताओं ने ट्रंप के कई बयानों का जिक्र किया, जिस पर आयोग के वकील ने आपत्ति ज़ाहिर की. वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकता को लेकर कई अहम सवाल पूछे. अब इस मामले में सुनवाई अगले सप्ताह होनी है.

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बिहार SIR केस में SC ने माइग्रेशन और नागरिकता के फर्क पर उठाए सवाल (Photo: ITG)
बिहार SIR केस में SC ने माइग्रेशन और नागरिकता के फर्क पर उठाए सवाल (Photo: ITG)

सुप्रीम कोर्ट में बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर मामले पर चल रही सुनवाई के दौरान अमेरिका के न्यायिक प्रोसेस और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का मुद्दा गूंजा. सुनवाई के दौरान मामला राजनीतिक से अंतरराष्ट्रीय संदर्भों में चला गया. सुनवाई के दौरान शुरुआत में चर्चा भले ही बिहार की वोटर लिस्ट संशोधन प्रक्रिया को लेकर हुई. हालांकि, बाद में चर्चा का केंद्र जल्द ही 'ड्यू प्रोसेस' और दुनियाभर के उदाहरण पेश किए गए. 

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं का कहना है कि बिहार में वोटर लिस्ट संशोधन प्रक्रिया के दौरान लाखों लोगों के नाम मनमाने ढंग से हटाए जा सकते हैं. इस संदर्भ में याचिकाकर्ताओं ने अमेरिका समेत अन्य देशों के न्यायिक उदाहरणों को हवा देते हुए 'ड्यू प्रोसेस' पर बात रखी. 

याचिकाकर्ताओं के तर्क पर चुनाव आयोग ने कड़ी आपत्ति ज़ाहिर की. आयोग के वकील ने कहा कि विदेशों के मामले, ख़ासकर अमेरिका के उदाहरण को भारत में लागू नहीं किया जा सकता. वहां कि परिस्थितियां अलग हैं. अमेरिका में तो ख़ुद ही 'ड्यू प्रोसेस' की परिभाषा विवादों में घिरी रहती है. 

क्या-क्या कोर्ट में हुआ?

चुनाव आयोग की दलील के दौरान अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयानों का संदर्भ सामने आया. आयोग के वकील ने कोर्ट में बताया कि अमेरिका में ट्रंप ने खुले तौर पर ऐसे बयान दिए हैं जिनमें उन्होंने ग्रीनलैंड जैसे विदेशी इलाकों को लेकर आक्रामक टिप्पणियां कीं और अंतरराष्ट्रीय कानून की सीमाओं पर बहस छेड़ी. आयोग का तर्क था कि जब अमेरिका जैसे विकसित देश में भी कार्यपालिका के आचरण और ‘ड्यू प्रोसेस’ को लेकर इतनी असहमति है, तो वहां के उदाहरणों को भारत की संवैधानिक व्यवस्था पर थोपना उचित नहीं होगा.

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यह भी पढ़ें: पश्चिम बंगाल में SIR को लेकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अमल शुरू, चुनाव आयोग ने दिए ये निर्देश

चुनाव आयोग ने यह साफ़ किया कि भारत में चुनावी प्रक्रिया पूरी तरह संविधान और कानून के तहत संचालित होती है. अनुच्छेद 324 और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत आयोग को मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करने का अधिकार और जिम्मेदारी मिली है. इसका उद्देश्य केवल मृत, स्थानांतरित या डुप्लिकेट मतदाताओं को हटाना है, न कि नागरिकता निर्धारित करना.

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान ये पूछा कि क्या आयोग की प्रक्रिया नागरिकता निर्धारण की सीमा में प्रवेश कर रही है. अदालत ने कहा कि संविधान नागरिकों को अंतर-राज्यीय आवागमन और बसने का अधिकार देता है और इसे अवैध माइग्रेशन से नहीं जोड़ा जा सकता. कोर्ट ने यह भी बताया किया कि नागरिकता से जुड़े सवाल विधायी ढांचे के अंतर्गत आते हैं, न कि केवल चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में.

अदालत ने फिलहाल संतुलित रुख अपनाते हुए आधार कार्ड को पहचान के दस्तावेज के रूप में स्वीकार किया, लेकिन साफ किया कि आधार नागरिकता का प्रमाण नहीं है. साथ ही यह भी कहा कि किसी भी मतदाता का नाम हटाने से पहले प्राकृतिक न्याय और पारदर्शी प्रक्रिया का पालन आवश्यक है.

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इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला न केवल बिहार बल्कि पूरे देश में भविष्य की वोटर लिस्ट संशोधन प्रक्रियाओं के लिए मार्गदर्शक साबित होगा. अगली सुनवाई 28 जनवरी को होगी.

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