बुधवार की सुबह बिहार के नए मुख्यमंत्री के तौर पर सम्राट चौधरी की ताजपोशी हो जाएगी. यूं तो बिहार अपने पुराने लव-कुश समीकरण पर आगे बढ़ चलेगा लेकिन सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने का असर 11 महीने बाद उत्तर प्रदेश में होने वाले चुनाव पर भी पड़ेगा. देखा जाए तो बीजेपी के लिए बिहार के मुख्यमंत्री के पद पर सम्राट चौधरी का चुनाव उत्तर प्रदेश की सियासत को भी साधने का दांव है.
जिस तरह बिहार में कोइरी (कुशवाहा) बिरादरी तादात और सामाजिक प्रभाव के लिहाज से दूसरी सबसे बड़ी पिछड़ी जाति (यादवों के बाद) मानी जाती है. कुछ ऐसा ही उत्तर प्रदेश में भी है, यूपी में भी कुशवाहा जो कि यूपी के अलग-अलग क्षेत्र में अलग-अलग जातियों और उपनाम से जानी जाती है उसकी बड़ी तादाद है.
पूर्वांचल में कुशवाहा, अवध में मौर्य, रुहेलखंड में शाक्य और पश्चिम में सैनी, यह सभी कुशवाहा जाति के ही उपनाम माने जाते हैं. 2014 के बाद इन जातियों ने बसपा छोड़ भाजपा का रुख करना शुरू किया था, और 2016 में केशव मौर्य के प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने के बाद केशव मौर्य कुशवाहा समाज के सबसे बड़े चेहरे बनकर उभरे.
केशव मौर्या मुख्यमंत्री तो नहीं बन पाए लेकिन पिछले 9 सालों से डिप्टी सीएम है, हालांकि 2024 चुनाव के बाद अखिलेश यादव इस बिरादरी को अपनी ओर खींचने में काफी हद तक सफल हो चुके हैं.
कुशवाहा वोट का पैटर्न यूपी में कैसे बदला?
2019 में बीजेपी से इस बिरादरी के दो सांसद जीते थे सलेमपुर से रविंद्र कुशवाहा और बदायूं से संघमित्रा मौर्य जीती थी, लेकिन 2024 में बीजेपी ने अपने दोनों कुशवाहा चेहरे खो दिए. जबकि समाजवादी पार्टी ने इस बिरादरी से तीन सांसद को जीत दिलाई.
यूपी में सबसे बड़े कुशवाहा चेहरे माने जाने वाले बाबू सिंह कुशवाहा समाजवादी पार्टी से सांसद बन गए, एटा से देवेश शाक्य जीते और आंवला से नीरज मौर्य सांसद बन गए. जिसने उत्तर प्रदेश में बीजेपी का कुशवाहा समीकरण पूरी तरीके से गड़बड़ा दिया, लेकिन अब बिहार में कुशवाहा मुख्यमंत्री बनाकर भाजपा उत्तर प्रदेश में इस बिरादरी का दोबारा दिल जीतने की कोशिश कर सकती है.
उत्तर प्रदेश में केशव मौर्य तो बीजेपी के सबसे बड़े ओबीसी चेहरे हैं जो कि इसी कुशवाहा बिरादरी से आते हैं, 2017 में जब भाजपा अपने दम पर उत्तर प्रदेश में चुनाव जीत कर आई तो केशव मौर्य मुख्यमंत्री पद के दावेदार भी थे. अभी भी गाहे-बगाहे उनकी दावेदारी की चर्चा उत्तर प्रदेश में होती रहती है. ऐसे में बिहार में एक कुशवाहा चेहरे का मुख्यमंत्री बन जाना उत्तर प्रदेश में बीजेपी की सियासत के लिए एक वरदान जैसा है.
यूपी का 2024 चुनाव
याद करिए 2024 के चुनाव में बीजेपी उत्तर प्रदेश में अर्श से फर्श तक आ गई, 75 से ज्यादा जीतने का दम भरने वाली बीजेपी 33 सीट पर सिमट गई, और समाजवादी पार्टी और कांग्रेस गठबंधन ने यूपी में बीजेपी की चूलें हिला दी. इस हार की सबसे बड़ी वजह गैर यादव ओबीसी और गैर जाटव दलितों का बीजेपी से खिसक कर सपा के साथ चला जाना था.
इस ओबीसी वोटो में सबसे बड़ा खिसकाव कुशवाहा मौर्य और कुर्मी वोटो का था 2019 और 2014 में सभी कुशवाहा और मौर्य मौर्य बहुल सीटें जीतने वाली भाजपा ने सभी कुशवाहा और मौर्य सीटें 2024 में सपा के हाथों गंवा दिया. बीजेपी एक भी कुशवाहा नहीं जिता पाई जबकि सपा के तीन कुशवाहा सांसद हैं.
पूर्वांचल से लेकर बुंदेलखंड तक कुशवाहा बिरादरी की बड़ी तदाद है, जबकि कुशीनगर से फर्रुखाबाद तक मौर्य और शाक्य के बिरादरी का सियासी प्रभाव है, ऐसे में सम्राट चौधरी का मुख्यमंत्री बनना इन इलाकों में बीजेपी को दोबारा अपने जनाधार को वापस लाने में मददगार हो सकता है.