scorecardresearch
 

अग्निपथ स्कीम क्या पेंशन बोझ घटाने के लिए आई है? जानें एक सैनिक के लिए कितनी जरूरी है पेंशन

सेना में चार साल की भर्ती के लिए लाई गई केंद्र सरकार की अग्निपथ योजना का विरोध जारी है. विरोध करने वालों का कहना है चार साल बाद सेना में भी नहीं रहेंगे और पेंशन भी नहीं मिलेगी. लेकिन सेना में पेंशन के खर्च को लेकर क्यों उठते रहते हैं सवाल? और सरकार कितनी रकम पेंशन पर खर्च करती है? जानें...

X
चार साल बाद सेवा से मुक्त होने के बाद 75% अग्निवीरों को पेंशन नहीं मिलेगी. (फाइल फोटो-PTI) चार साल बाद सेवा से मुक्त होने के बाद 75% अग्निवीरों को पेंशन नहीं मिलेगी. (फाइल फोटो-PTI)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • इस साल पेंशन पर 1.19 लाख करोड़ रुपये खर्च होंगे
  • अग्निपथ से 20 साल में पेंशन खर्च कम होने की उम्मीद
  • 85% सैनिक 38 साल की उम्र में हो जाते हैं रिटायर

दो साल पहले नवंबर 2020 में रक्षा मामलों के विभाग ने रक्षा मंत्रालय को एक सुझाव दिया था. ये विभाग रक्षा मंत्रालय के अधीन आता है. सुझाव था कि रक्षा मंत्रालय पेंशन पर अपना खर्च कैसे कम कर सकता है? जब ये सुझाव दिया गया था, तब दिवंगत जनरल बिपिन रावत को चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ बने 11 महीने ही हुए थे. उन्होंने सेना के आधुनिकीकरण पर जोर दिया था और उनकी इस पहल को भी इसी कोशिश के तौर पर देखा गया था.

उस समय रक्षा मामलों के विभाग ने रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाने के साथ-साथ ये सुझाव भी दिया था कि जो जितने समय तक सेना में सेवा दे, उसे उतनी पेंशन दी जाए. सुझाव था कि कर्नल की रिटायरमेंट की उम्र 54 से बढ़ाकर 57 साल कर दी जाए. साथ ही ब्रिगेडियर की रिटायरमेंट उम्र 56 से 58 साल और मेजर जनरल की उम्र 58 से 59 कर दी जाए. यही सुझाव नौसेना और वायुसेना के लिए भी था.

इसी तरह, ये भी सुझाया गया था कि जो सेना में 26 से 30 साल के लिए सेवा दे, उसे 60% पेंशन मिले. वहीं, 31 से 35 साल सेवा देने वाले को 75% और 35 साल से ज्यादा समय तक सेवा देने पर 100% पेंशन दी जाए. हालांकि, ये सुझाव माने नहीं गए.

रक्षा मामलों के विभाग के ये सुझाव सार्वजनिक नहीं हुए थे, बल्कि सोशल मीडिया पर लीक हो गए थे. इसके बाद कुछ पूर्व सैनिकों और रक्षा विशेषज्ञों ने इस कदम की सराहना की थी, तो कइयों ने इसे बेतुका कदम बताया था.

इस सुझाव के दो साल बाद केंद्र सरकार 'अग्निपथ योजना' लेकर आई है. इस योजना के तहत चार साल के लिए युवाओं को सेना में शामिल किया जाएगा. इन्हें 'अग्निवीर' कहा जाएगा. चार साल बाद 75 फीसदी अग्निवीरों को सेवा से मुक्त कर दिया जाएगा, जबकि बाकी के 25 फीसदी अग्निवीरों को सेना में बरकरार रखा जाएगा. जो 75 फीसदी अग्निवीर चार साल बाद सेवा मुक्त होंगे, उन्हें न तो पेंशन मिलेगी और न ही ग्रेच्युटी. अग्निपथ योजना के विरोध का एक कारण ये भी है. युवाओं का कहना है कि चार साल बाद वो बेघर हो जाएंगे और उन्हें पेंशन भी नहीं मिलेगी. हालांकि, सरकार का कहना है कि इन अग्निवीरों को करीब 11 लाख रुपये से ज्यादा का सेवा निधि पैकेज दिया जाएगा.

ये भी पढ़ें-- अग्निवीरों को आरक्षण का वायदा, जानें- पूर्व सैनिकों को कितनी नौकरियां दे पाती है सरकार

20 साल में 75% कम हो जाएगा पेंशन खर्च

रक्षा मंत्रालय का 20 फीसदी से ज्यादा खर्च सिर्फ पेंशन पर होता है. 2022-23 में रक्षा मंत्रालय के लिए 5.25 लाख करोड़ रुपये का बजट रखा गया है, जिसमें से 1.20 लाख करोड़ रुपये पेंशन पर खर्च होंगे. यानी रक्षा के कुल बजट का 23% हिस्सा सिर्फ पेंशन पर खर्च हो जाएगा.

इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि रक्षा के लिए जितना बजट हथियारों की खरीद के लिए रखा जाता है, लगभग उतना ही बजट पेंशन के लिए रखा जाता है. यही वजह है कि अक्सर पेंशन खर्च को कम करने की बात कही जाती रही है.

अब जब सरकार अग्निपथ योजना लेकर आई है, तो उसे भी पेंशन खर्च में कटौती से जोड़ा जा रहा है. अगर सब कुछ ठीक रहा और योजना अच्छी तरह से लागू हो गई, तो अगले 20 साल में पेंशन पर खर्च में 75% तक कटौती आने की उम्मीद है.

मार्च 2020 में रक्षा मंत्रालय की संसदीय समिति की रिपोर्ट में बताया गया था कि देश में रक्षा से जुडेख 32.35 लाख से ज्यादा पेंशनर्स हैं, जिनमें से 26.34 लाख पेंशनर्स सशस्त्र बलों से यानी सेना, नौसेना या वायुसेना के जवान और अफसर हैं. इस रिपोर्ट के मुताबिक, हर साल रक्षा से जुड़े 55 हजार से ज्यादा कर्मचारी, जवान और अफसर रिटायर होते हैं.

ये भी पढ़ें-- Agnipath Scheme: सिर्फ 30 दिन की छुट्टी, बैज भी अलग, सैलरी में 30% कटौती, आर्मी के जवान से कितना अलग होगा अग्निवीर?

क्या वन रैंक, वन पेंशन ने बढ़ाया पेंशन पर खर्च?

नवंबर 2015 में सरकार ने वन रैंक-वन पेंशन को लागू करने का नोटिफिकेशन जारी कर दिया. ये योजना 1 जुलाई 2014 से लागू की गई. 2014 के आम चुनाव में बीजेपी ने वन रैंक-वन पेंशन लागू करने का वादा किया था, लेकिन सरकार बनने के बाद जब योजना लागू नहीं हुई तो पूर्व सैनिक सड़क पर उतर आए. इसके बाद सरकार ने इस योजना को लागू कर दिया.

इसके तहत एक समान रैंक पर रिटायर हुए अफसरों को समान पेंशन का प्रावधान हुआ. यानी, अगर कोई 10 साल पहले कर्नल की रैंक पर रिटायर हुआ था, तो उसे भी उतनी ही पेंशन मिलेगी, जितनी आज कर्नल की रैंक पर रिटायर होने वाले को मिल रही है.

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस योजना से रक्षा बजट को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है. इसे ऐसे समझ सकते हैं कि 2015 में पेंशन पर तकरीबन 60 हजार करोड़ रुपये खर्च हुए थे, वहीं इस साल पेंशन के लिए 1.20 लाख करोड़ रुपये रखे गए हैं. यानी 7 साल में पेंशन पर खर्च लगभग दोगुना हो गया है.

लेकिन क्यों जरूरी है सैनिकों के लिए पेंशन?

सरकारी नीतियों के मुताबिक, सेना में सेवा देने वाले सैनिकों को जल्द ही रिटायर होना पड़ता है. 2011 में आई रक्षा मंत्रालय की संसदीय समिति की रिपोर्ट बताती है कि 85% सैनिक 38 साल की उम्र में ही रिटायर हो जाते हैं. वहीं, 10% ऐसे हैं जो 46 की उम्र में रिटायर होते हैं, जबकि 5% ही 56 से 58 साल की उम्र में रिटायर होते हैं. यानी, ज्यादातर सैनिक ऐसे समय में रिटायर होते हैं, जब उन पर परिवार की जिम्मेदारी होती है. इसलिए उन्हें पेंशन जरूरी है.

 

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें