महाराष्ट्र नगर महापालिका चुनाव के बाद अब सभी की निगाहें इस बात पर लगी हैं कि मुंबई से लेकर ठाणे तक का मेयर कौन होगा. शिंदे के नेतृत्व वाला शहरी विकास विभाग गुरुवार को लॉटरी सिस्टम के जरिए मेयर पद के आरक्षण का फैसला कर लेगा. इस बार महाराष्ट्र में बदले मुस्लिम वोटिंग पैटर्न ने मालेगांव नगर महापलिका का सियासी गेम ही पूरी तरह से बदल दिया है, क्योंकि यहां के मतदाताओं ने महायुति और महाविकास अघाड़ी से अलग राह चुनी है.
मुंबई से लेकर पुणे और ठाणे तक भले ही बीजेपी और शिंदे की सियासी केमिस्ट्री हिट रही हो, लेकिन मुस्लिम बहुल मालेगांव में सियासी गेम पूरी तरह से अलग रहा. मालेगांव नगर निगम में इंडियन सेक्युलर लार्जेस्ट असेंबली ऑफ महाराष्ट्र (ISLAM) पार्टी ने सबसे ज्यादा 35 सीटें जीतकर अब अपने मेयर बनाने जा रही है तो असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM मुख्य विपक्षी दल होगी.
महाराष्ट्र में भले ही 12 फीसदी मुस्लिम आबादी हो, लेकिन मालेगांव में 78 फीसदी से ज्यादा मुसलमान हैं. आजादी के बाद से अभी तक हुए चुनावों में मुस्लिम वोटर मालेगांव में कांग्रेस का समर्थन करते रहे. मुस्लिम वोटरों का यह ट्रेंड 2024 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों में भी दिखा, लेकिन इस बार के शहरी निकाय चुनाव में मालेगांव के मुसलमानों का मिजाज बदला हुआ नजर आया. यहां मुसलमानों की पहली पसंद ISLAM पार्टी बनी. ऐसे में सवाल उठता है कि ये पार्टी कब बनी और किसने बनाई?
ISLAM पार्टी कब बनी और किसने बनाई
इंडियन सेक्युलर लार्जेस्ट असेंबली ऑफ महाराष्ट्र, जिसका शार्ट नाम ISLAM है. इसका गठन कांग्रेस के पूर्व विधायक शेख आसिफ ने 2024 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से पहले की थी. विधानसभा चुनाव में उन्हें सफलता तो नहीं मिली, लेकिन निकाय चुनाव में उन्होंने बाजी मार ली. अब मालेगांव में ISLAM पार्टी का मेयर बनने जा रहा है.
पूर्व विधायक शेख आसिफ दिवंगत नेता शेख रशीद के बेटे हैं. शेख आसिफ मालेगांव के मेयर के रूप में काम करने के बाद 2014 में कांग्रेस के टिकट पर विधायक चुने गए थे. कांग्रेस के साथ उनके रिश्ते विधायक बनने के बाद से ही बिगड़ने लगे थे और 2022 में यह मतभेद काफी बढ़ गया. इसके बाद शेख आसिफ ने कांग्रेस छोड़ दी और एनसीपी के साथ हाथ मिला लिया.
शेख आसिफ ने क्यों बनाई ISLAM पार्टी
शेख आसिफ एनसीपी में भी बहुत दिन नहीं रह सके और उन्होंने अपनी अलग राजनीतिक पार्टी बनाने का फैसला किया. इस तरह 2024 के विधानसभा चुनाव से पहले शेख आसिफ ने इंडियन सेक्युलर लार्जेस्ट असेंबली ऑफ महाराष्ट्र( ISLAM) नाम से पार्टी बनाई. महाराष्ट्र में मुस्लिम सियासत को खड़े करने के मकसद से पार्टी बनाई.
ISLAM पार्टी बनाने का ख्याल कैसे आया, इस बात को जवाब शेख आसिफ ने खुद दिया था. उन्होंने बताया कि बीजेपी के सत्ता में आने के बाद राज्य में ही नहीं बल्कि देशभर में सियासी माहौल बदला है. इस्लाम धर्म को लगातार टारगेट किया जा रहा है और बार-बार टिप्पणियां की जा रही हैं. मुसलमानों के साथ लगातार भेदभाव के मामले बढ़ रहे हैं. इस बात को हम कभी बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं कि हमारे मजहब को बुरा भला कहा जाए. इस बात का जवाब देने के लिए इंडियन सेक्युलर लार्जेस्ट असेंबली ऑफ महाराष्ट्र का गठन किया गया है.
शेख आसिफ कहते हैं कि 2014 के बाद से तथाकथित सेकुलर कह लाने वाले दलों का मिजाज भी मुसलमानों के प्रति बदल गया है. कांग्रेस से एनसीपी तक के एजेंडे से मुस्लिम बहार गए हैं. ना ही मुसलमानों को उनकी आबादी के लिहाज से टिकट देते हैं और ना ही उनके मुद्दों को पुरजोर तरीके से उठाते हैं. इस बात को लेकर मुस्लिम समुदाय कशमकश में थे, जिसे देखते हुए एक राजनीतिक दल का गठन किया गया है. हम सिर्फ मुसलमानों की बात नहीं करते हैं बल्कि देश के संविधान के लिहाज से सभी की बात करते हैं.
मालेगांव में ISLAM का होगा मेयर
मुस्लिम बहुल मालेगांव में शेख आसिफ की पार्टी ISLAM ने नगर निगम चुनाव में सभी को चौंका दिया है. मालेगांव की 84 सीटों में से AIMIM ने 21 और इस्लाम (ISLAM) ने 35 सीटें जीत हैं. समाजवादी पार्टी ने 5 सीटें हासिल कीं. यहां शिवसेना को 18, कांग्रेस को 3 और बीजेपी को सिर्फ दो सीटें मिलीं. मालेगांव नगर निगम में इस्लाम और सपा गठबंधन अपना मेयर बनाने जा रही जबकि AIMIM मुख्य विपक्षी दल होगी. कांग्रेस का सफाया हो गया है.
इंडियन सेक्युलर लार्जेस्ट असेंबली ऑफ महाराष्ट्र मालेगांव में अपने सहयोगी समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर मेयर बनाने जा रही है. सपा पांच सीटें जीती है, जिसके समर्थन से ISLAM बहुमत का आंकड़ा आसानी से पार कर रही है. यह गठबंधन अब मालेगांव में अपना मेयर बनाने के लिए तैयार है, जिससे मालेगांव राज्य के उन कुछ शहरों में से एक बन गया है जहां सत्ता सत्तारूढ़ महायुति और विपक्षी महा विकास अघाड़ी दोनों से बाहर है.
मुस्लिम सियासत की प्रयोगशाला मालेगांव
महाराष्ट्र के मालेगांव में मुस्लिमों की आबादी 78 फीसदी है, जो शहर की राजनीति में निर्णायक भूमिका अदा करती है. मालेगांव सेंट्रल सीट राज्य के उन दुर्लभ विधानसभा क्षेत्रों में से एक है जिसने आजादी के बाद से लगातार एक मुस्लिम विधायक को चुना है. दशकों तक मालेगांव की राजनीति दो प्रभावशाली परिवारों के इर्द-गिर्द घूमती रही.
समाजवादी नेता निहाल अहमद का परिवार, जिन्होंने जनता दल विधायक के रूप में पांच बार मालेगांव का प्रतिनिधित्व किया और दूसरा शेख रशीद का परिवार है, जो कांग्रेस के टिकट पर दो बार विधायक रहे हैं. शेख रशीद के बाद उनकी सियासत को उनके बेटे शेख आसिफ ने संभाला और 2014 में विधायक चुने गए. इन परिवारों के बीच नगर निगम और विधानसभा की राजनीति पर नियंत्रण बदलता रहा, भले ही पार्टी की वफादारी बदलती रही.
मालेगांव में कैसे बदल गया सियासी गेम
2006 के मालेगांव धमाकों के बाद यह संतुलन बदलना शुरू हुआ, जब एक मौलवी, मुफ्ती इस्माइल, चुनावी राजनीति में आए. 2009 में बिना किसी स्थापित पार्टी के समर्थन के पहली बार जीतने के बाद, मुफ्ती इस्माइल ने धीरे-धीरे अपने लोगों के मंच, कौमी महाज के माध्यम से एक आधार बनाया, और 2019 में ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के लिए मालेगांव सेंट्रल सीट जीती. इसके बाद ही शेख आसिफ ने अपनी राजनीतिक दल बनाने का फैसला किया और इस्लाम पार्टी बनाकर सभी को चौंका दिया है.
मुस्लिम राजनीति की नई प्रयोगशाला मालेगांव बनी है. ओवैसी के सिपहसलार मुफ्ती इस्माइल की AIMIM तमाम कोशिशों के बाद मालेगांव के शहर पर अपना कब्जा नहीं जमा सकी जबकि शेख आसिफ की पार्टी ने सपा के साथ मिलकर मुसलमानों का एकमुश्त वोट हासिल करने में कामयाब रही. यहां पर मुसलमानों ने कांग्रेस, एनसीपी जैसे दलों को पूरी तरह से दरकिनार करके मुस्लिम परस्त पार्टी का साथ दिया. इसी का नतीजा है कि शेख आसिफ की इस्लाम पार्टी सबसे बड़ी पार्टी निगम चुनाव में बनकर उभरी है तो ओवैसी की पार्टी मुख्य विपक्ष दल के रोल में है.