प्रयागराज में संगम त्रिवेणी स्नान को लेकर चल रहे विवाद पर जगदगुरु शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती ने नाराजगी जाहिर की है. उनका कहना है कि प्रशासन और पुलिस की कार्यप्रणाली इस पूरे मामले में ठीक नहीं हैं. उन्होंने कहा कि पुलिस ने ब्रह्मचारियों और सनातन परंपराओं का अपमान किया है, जिसे किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता.
शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती ने कहा कि जो हुआ है, हम उसकी घोर निंदा करते हैं. राजा का कर्तव्य है प्रजा की रक्षा करना, प्रजा क्या चाहती है. ये भारत देश है, यहां धर्म ही प्रधान है. हम सब हिंदू धर्मावलंबी हैं. सनातन धर्मावलंबी हैं. धर्म का पालन करने वाले लोग हैं. हमारे धर्म में गंगा स्नान है. नर्मदा स्नान है. तुलसी पूजन है. वटवृक्ष पूजन है. मूर्ति पूजन है. देवताओं का पूजन है. कोई कैसे रोक सकता है?
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उन्होंने कहा कि स्नान करने के लिए ज्योतिष पीठाधीश्वर जगतगुरु शंकराचार्य जी जा रहे थे, उनके साथ सौ दो सौ लोग उनके भक्त थे. बटक ब्रह्मचारी भी थे, विद्यार्थी भी थे. तो हिंदू धर्म की पहचान क्या है? सिखा और सूत्र ही पहचान है. छोटे-छोटे विद्यार्थियों की शिखा पकड़कर चोटी पकड़-पकड़ करके घसीटा गया. जो काम विधर्मियों ने नहीं किया, वो वहां के प्रशासन यानी पुलिस प्रशासन ने किया, जो बिल्कुल अनुचित था. उसे उचित नहीं ठहराया जा सकता. प्रशासन को क्षमा मांगना चाहिए और शंकराचार्य जी को ले जाकर के त्रिवेणी में सम्मानपूर्वक स्नान कराना चाहिए.
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उन्होंने कहा कि सनातन धर्म की रक्षा के लिए ही आज से ढाई हजार साल पहले शंकराचार्य जी का अवतार हुआ. जब हमारे देश में विधर्मियों ने आक्रमण किया. बौद्धिक आक्रमण किया. उन्होंने कहा कि वेद: अप्रमाणम. वेद प्रमाण नहीं हैं. तब भगवान शंकराचार्य जी का अवतार हुआ. उन्होंने कहा कि वेद ही प्रमाण हैं. सनातन धर्म की रक्षा के लिए ही उनका अवतार हुआ और अपनी बत्तीस वर्ष की आयु में उन्होंने उस हिंदू धर्म सनातन धर्म की स्थापना की, चार मठों की स्थापना की.
शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती ने कहा कि ब्रह्मचारियों की शिखा (चोटी) और यज्ञोपवीत (सूत्र) सनातन धर्म की पहचान और आस्था का प्रतीक हैं. इनका अपमान न केवल भावनाओं को ठेस पहुंचाता है, बल्कि यह सनातन परंपरा पर सीधा प्रहार है. उन्होंने कहा कि जो काम विधर्मियों ने भी नहीं किया, वह पुलिस द्वारा किया गया है, जो बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है.
स्वामी सदानंद सरस्वती ने कहा कि किसी भी राजा या शासक का पहला कर्तव्य अपनी प्रजा और उनकी आस्था की रक्षा करना होता है. उन्होंने कहा कि राजधर्म का मूल उद्देश्य जनता की सुरक्षा और धार्मिक स्वतंत्रता को बनाए रखना है, लेकिन इस घटना में पुलिस की भूमिका उस जिम्मेदारी के विपरीत नजर आई है.
उन्होंने प्रशासन से मांग करते हुए कहा कि इस पूरे मामले में तुरंत माफी मांगी जाए और शंकराचार्य व संत समाज को ससम्मान त्रिवेणी स्नान कराया जाए. शंकराचार्य ने यह भी कहा कि संतों और ब्रह्मचारियों के सम्मान के साथ किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया जा सकता.