गुजरात के सूरत शहर में घरेलू रसोई गैस (एलपीजी) की भारी कमी और ब्लैक मार्केट में कीमतों के आसमान छूने से प्रवासी मजदूरों का बड़े पैमाने पर पलायन शुरू हो गया है. उधना रेलवे स्टेशन पर बिहार, उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों के मजदूरों की लंबी कतारें लगी हुई हैं. कई श्रमिक अपना सारा सामान- बर्तन, चूल्हा, बाल्टी आदि लेकर ट्रेन में सवार होकर गांव लौट रहे हैं. उनका कहना है कि जब तक गैस की स्थिति सामान्य नहीं होती वो वापस नहीं आएंगे. वहीं, कई मजदूरों का कहना है कि वो गैस की किल्लत की वजह से खाना नहीं बना पा रहे हैं.
सरकार भले ही कह रही हो कि देश में गैस की कोई कमी नहीं है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है.जिन लोगों के पास गैस कनेक्शन नहीं है, उन्हें गैस सिलेंडर भरने के ब्लैक मार्केट पर निर्भर रहना पड़ता है और बढ़ी हुई कीमतों के कारण वो सूरत छोड़ने पर मजबूर हैं.
पलायन की बेबस तस्वीर
सूरत का उधना रेलवे स्टेशन इन दिनों बेबसी की तस्वीरों का गवाह बना हुआ है. 'आज तक' की टीम ने जब स्टेशन के वेटिंग एरिया में मजदूरों से बात की तो दर्जनों लोगों ने गैस की किल्लत को ही पलायन का मुख्य कारण बताया. योगेश कुमार मंडल ने अपना दर्द साझा करते हुए कहा कि उनके पास खाना बनाने के लिए गैस नहीं है, इसलिए वो बिहार लौट रहे हैं.
उन्होंने बताया कि यहां गैस नहीं मिल रहा है. खाना नहीं बना पा रहे हैं. हम लोग खाएंगे क्या? ड्यूटी कैसे करेंगे? कंपनी तो गैस भरवा कर नहीं देगी. उसकी व्यवस्था तो हम ही लोगों को करनी होगी और गैस मिल नहीं रही है, इसलिए हम घर जा रहे हैं.
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400-500 रुपये किलो मिल रही है गैस
योगेश ने बताया कि परसों रात जब गैस खत्म हुई तो उन्हें केवल सादा चावल खाकर सोना पड़ा, क्योंकि सब्जी बनाने के लिए ईंधन नहीं था. उन्होंने बताया कि वो लोग ब्लैक में गैस खरीदते हैं. पहले तो गैस 130 रुपये किलो मिल जाती थी, लेकिन अब 400-500 रुपये किलो तक पहुंच गईं और वो भी नहीं मिल पा रही है. अगर गैस नहीं मिलेगी तो हम लोग खाना कैसे खाएंगे. जब गैस पूरी तरह मिलने लगेगी तो फिर लौटकर यहां वापस आएंगे.
पलायन करने वाले मुकेश कुमार राय ने बताया कि वो भागलपुर जा रहे हैं, क्योंकि पिछले 15 दिनों से उन्हें गैस नहीं मिली है. उन्होंने कहा कि ब्लैक में एक लीटर गैस के 400 से 500 रुपये मांगे जा रहे हैं जिसे खरीदना एक मजदूर के लिए नामुमकिन है.
होटलों में भी महंगा हुआ खाना
मुकेश के अनुसार, पहले वो 100 रुपये किलो गैस खरीद लेते थे, लेकिन अब होटल में खाना भी महंगा हो गया है. इसी तरह सत्यनारायण नामक श्रमिक ने बताया कि मजदूर आदमी इतना महंगा ईंधन खरीदकर कितने दिन रह सकेगा? यही वजह है कि वो अब अपना बोरिया-बिस्तर समेटकर ट्रेन के अनारक्षित कोचों की लंबी लाइनों में लगने को मजबूर हैं.
मजदूरों ने बताया कि गैस संकट के साथ-साथ उन्हें आर्थिक मार भी झेलनी पड़ रही है. साड़ी पेंटिंग का काम करने वाले एक श्रमिक ने बताया कि कंपनियों में काम कम हो गया है और खर्च बढ़ गया है.
वहीं, रजनीश नामक युवक ने खुलासा किया कि उसका दो महीने का पेमेंट ठेकेदार लेकर भाग गया, जिसके कारण उन्हें घर से पैसे मंगाकर गांव वापस जाना पड़ रहा है. इसी तरह हरेराम ने सवाल उठाया कि जब दिहाड़ी ही 300 रुपये है तो कोई 300-400 रुपये किलो गैस भरवाकर अपना पेट कैसे भरेगा?
कनेक्शन न होने का खामियाजा
योगेश, मुकेश और रजनीश जैसे तमाम प्रवासी मजदूरों के पास खुद का कोई आधिकारिक गैस कनेक्शन नहीं होता है. ये लोग छोटे सिलेंडरों में गैस भरवाकर अपना गुजारा करते हैं, जिसके लिए उन्हें हमेशा ब्लैक मार्केट के डीलरों पर निर्भर रहना पड़ता है. जब से गैस की सप्लाई में दिक्कत आई है, इन डीलरों ने कीमतें आसमान पर पहुंचा दी हैं या सप्लाई बंद कर दी है. जिसके कारण ये शहर अब इन मजदूरों के लिए कमाई का जरिया नहीं, बल्कि बोझ बन गया है.
उधना स्टेशन की लंबी लाइनों में खड़े ये मजदूर अब उसी दिन वापस आने की बात कह रहे हैं, जब गैस की स्थिति पूरी तरह सामान्य हो जाएगी. प्रशासन के दावों और मजदूरों की इस जमीनी हकीकत के बीच सूरत का औद्योगिक ढांचा अब श्रमिकों की कमी से जूझने को तैयार है.