बिहार चुनाव के ठीक पहले भारतीय जनता पार्टी ने साबिर अली को दोबारा पार्टी में शामिल कर लिया. महागठबंधन के पसमांदा नेता और राष्ट्रीय जनता दल के महासचिव डॉ एजाज अली ने आरोप लगाया है कि अली को पार्टी में दोबारा शामिल करने के पीछे बीजेपी की चाल है ताकि वो मुसलमानों की सबसे बड़ी आबादी पसमांदा पर डोरे डाल सके.
मेरी पार्टी जात-पात में भरोसी नहीं करती: साबिर अली
हालांकि, साबिर अली नहीं मानते कि पसमांदा होने की वजह से उनकी पार्टी में वापसी हुई है. उन्होंने कहा, 'मेरी पार्टी जात-पात में भरोसा नहीं करती. हां मैं
पसमांदा जरूर हूं लेकिन मेरे लिए कोई एक जाति मायने नहीं रखती.'
पसमांदा वोट बैंक में सेंध से सीधे नीतीश को नुकसान
दरअसल, यानी मुसमानों में दलित समुदाय से आते हैं. पार्टी में मतभेद के बावजूद साबिर अली का बीजेपी में आना एक सोची समझी
रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है. राजनीतिक जानकारों के मुताबिक पसमांदा है और इसमें कोई भी नुकसान से सीधे
नीतीश कुमार को नुकसान होगा.
नीतीश कुमार पिछले 10 साल से इस जाति के लोगों का विश्वास जीतते आ रहे हैं. नीतीश ने अब तक जिन तीन मुसलमानों- अली अनवर, एजाज अली, कहकशां परवीन- को राज्यसभा भेजा वो सभी पसमांदा थे.
मुख्तार अब्बास नकवी से मतभेद के चलते थे सस्पेंड
लोकसभा चुनाव 2014 से ठीक पहले साबिर अली ने जनता दल यूनाइटेड छोड़ बीजेपी का कमल थाम लिया. लेकिन मुख्तार अब्बास नकवी के खिलाफ
बयानबाजी के आरोप में उन्हें सस्पेंड कर दिया गया था.
साबिर नरेन्द्र मोदी के भी पसंद है और बिहार के सीतामढी इलाके में अपना प्रभाव रखते हैं.