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Crowd Mentality: इंडोनेश‍िया में कैसे जानलेवा बन गए खेल प्रेमी? समझें भीड़ का मनोविज्ञान

जब खेल या किसी कंपटीशन जैसे आयोजन में हम भाग ले रहे होते हैं तो वहां हमारी मेंट‍िलिटी मैच करने का प्रत‍िशत और ज्यादा बढ़ जाता है. हम यहां समान रुचि साझा करते हैं. गोल होने पर एक साथ चिल्लाना, किसी एक स्लोगन या नारे को एक साथ चिल्लाकर बोलने से हमारे भीतर रोमांच का स्तर बढ़ जाता है.

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इंडोनेश‍िया के स्टेड‍ियम में भगदड़ की तस्वीर (Image:AP)
इंडोनेश‍िया के स्टेड‍ियम में भगदड़ की तस्वीर (Image:AP)

इंडोनेशिया में फुटबॉल मैच के दौरान हुई भगदड़ में 125 के करीब जानें चली गईं. किसी ने सोचा भी नहीं था कि भीड़ का ये गुस्सा इतने बड़े नरसंहार में बदल जाएगा. ऐसे बड़े आयोजनों में भीड़ के मनोविज्ञान को समझना और उसे काबू करना एक चुनौती होता है. मनोदशा विश्लेषकों का कहना है कि कभी भी ऐसे बड़े आयोजनों में भीड़ के मनोविज्ञान को समझते हुए उसे काबू करने की तैयारी करना जरूरी होता है. आइए जानते हैं कि कैसे काम करता है भीड़ का मनोविज्ञान..

निष्क्र‍िय झुंड में कैसे बदलती है क्र‍ियाशील भीड़  
भोपाल के जाने माने मनोचिकित्सक डॉ सत्यकांत त्रिवेदी कहते हैं कि हमेशा भीड़ के सदस्य किसी एक विषय पर एक राय होने के बावजूद उनके व्यक्त‍िगत विचार और कार्यशैली भ‍िन्न होती है. लेकिन जब बड़ी संख्या में लोग एकत्र होते हैं तो उनके स्थ‍िरता का अभाव होता है. वो एक अलग तरह के रोमांच से संचालित होते हैं. मसलन जब कोई मैच देखने गया है तो वो उस समय एक व्यक्त‍ित्व के बजाय भीड़ से संचालित है. इनमें जितना भड़कने के चांसेज होते हैं, उतना ही सुरक्षा-व्यवस्था के पालन का भी भाव होता है. लेकिन सिर्फ स्थिरता के अभाव के किसी परिस्थिति विशेष में क्र‍ियाशील भीड़ एक निष्क्र‍िय झुंड में बदल जाती है. इस भीड़ में निरंकुशता का आना ही भगदड़ और इस तरह की घटनाओं की परिणति कर देती है. 

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आम जिंदगी में भी काम करती है क्राउड मेंट‍िलिटी  
IHBAS दिल्ली के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ ओमप्रकाश कहते हैं कि सामाजिक मनोविज्ञान में इसे मॉब मेंट‍ेलिटी, हर्ड मेंटेलिटी, ग्रुपथ‍िंक या क्राउड साइकोलॉजी के तौर पर बताया गया है. इसमें अध्ययनकर्ताओं ने ये निष्कर्ष पाए हैं कि कैसे भीड़ में कोई व्यक्त‍ि लार्जर ग्रुप से प्रभावित होता है. साल 1950 के दशक में, शोधकर्ताओं ने एक खास प्रयोग के जरिये जाना कि कैसे लोग सामाजिक मानदंडों से मेल खाने के लिए अपने व्यवहार को बहुत आसानी से बदल देते हैं. 

इस प्रयोग में ये पाया गया कि एक व्यक्त‍ि को जब सात लोगों एक गुप्त समूह में रखा गया, तो वो पूरी तरह उनसे प्रभावित हो गया. इस प्रयोग में गुप्त सहयोगियों ने जानबूझकर गलत उत्तर दिया था, लेकिन उस व्यक्त‍ि को सही उत्तर पता होने के बावजूद उसने गलत उत्तर दिया. डॉ ओमप्रकाश कहते हैं कि हर इंसान अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में भी भीड़ से प्रभावित होता है, मसलन हम किसी खास जगह जाते हैं या कोई फिल्म देखने जाते हैं, या क‍ोई खास फूड खाते हैं सिर्फ इसलिए कि हमारे दोस्तों ने ये किया. हम उनसे ड्र‍िवेन हुए. क्राउड मेंट‍िलिटी कई बार किसी एक दुकान की तरफ हमें खींच ले जाती है क्योंकि लगता है जहां भीड़ है, वो कुछ खास वजहों से ही है, भीड़ हमेशा सही कर रही है, हम अपने अधोमष्त‍िस्क में कई बार ऐसी मान्यता दे चुके होते हैं. 

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इंडोनेश‍िया की घटना में इस मानसिकता का क्या रोल रहा 
अब अगर इंडोनेश‍िया की घटना की बात करें तो यहां जुटी भीड़ अपनी खास रुचि शेयर कर रही थी. जब खेल या किसी कंपटीशन जैसे आयोजन में हम भाग ले रहे होते हैं तो वहां हमारी मेंट‍िलिटी मैच करने का प्रत‍िशत और ज्यादा बढ़ जाता है. हम यहां समान रुचि साझा करते हैं. गोल होने पर एक साथ चिल्लाना, किसी एक स्लोगन या नारे को एक साथ चिल्लाकर बोलने से हमारे भीतर रोमांच का स्तर बढ़ जाता है. ऐसे में जब टीम की हार होती है तो उस रोमांच की स्थिति अक्सर आक्रोश में बदलती है. इससे पहले हम लोग स्टेड‍ियम में तोड़ फोड़ या किसी टीम के हारने पर टीवी फोड़ने या ख‍िलाड़‍ियों के पुतले जलाने जैसी घटनाएं सुनते रहे हैं. लेकिन यहां जो हुआ उसे सामूहिक चेतना को एक दिशा में करके रोका जा सकता था. अगर ऐसे आयोजनों में कोई वक्ता एकसाथ सबको संबोध‍ित करे, उन्हें नियम कानूनों का भय दिखाए या उनकी पहचान उजागर होने की बात करे तो भी इसे रोका जा सकता है. लेकिन अगर भीड़ अराजक होती है, उन्हें अपनी पहचान खुलने का भय नहीं होता है तो वो उद्दंड होकर ऐसी घटनाओं को अंजाम दे सकते हैं. 

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कम्यूनिकेशन टूल बहुत जरूरी 
एम्स दिल्ली के मनोचिकित्सक डॉ अनिल शेखावत कहते हैं कि ऐसे मामलों में भीड़ किसी एक फेथ यानी विश्वास पर काम करती है. दुनिया में कई ऐसे भी उदाहरण हैं जब भीड़ ने एकजुटता द‍िखाकर किसी की हेल्प की. वहीं ये घटना भीड़ के भगदड़ में बदलने की है. ऐसी घटना में कोई विवाद या किसी अफवाह की खास भूमिका होती है. ऐसे में सबसे बड़ा रोल कम्युनिकेशन का होता है, अगर ऐसे मामलों में कम्यूनिकेशन इतना अच्छा हो कि कुछ लोगों की ही तात्कालिक सोच बदली जा सके तो ऐसी घटना रुक सकती है. इसके लिए सबके मोबाइल पर सामूहिक संदेश या फिर किसी एक अथॉरिटी की बात सबतक पहुंच जाए तो इस तरह की घटना रुक सकती है. 

जानिए- इंडोनेश‍िया में क्या हुआ 
जकार्ता पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार कांजुरुहान स्टेडियम में रात को दो लोकल टीमें Arema FC और Persebaya Surabaya के बीच मैच चल रहा था. फुटबॉल के दीवानों से पूरा स्टेड‍ियम फुल था. स्थानीय पुलिस चीफ  Afinta के मुताबिक स्थिति तब बिगड़ी जब मैच खत्म होने की सीटी बजी. मैच में  Persebaya ने Arema FC को 3-2 से मात दे दी थी. इस के बाद Arema FC के फैंस का गुस्सा भड़क गया. ये आक्रोश‍ित फैंस मैदान में आ गए और हंगामा कर दिया. इसके बाद पुलिस को आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े इससे यहां भगदड़ का माहौल बन गया और कई जानें चली गईं. 

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