हर साल 28 फरवरी को दुर्लभ बीमारी दिवस (Rare Disease Day) मनाया जाता है. लेकिन इस बार दुर्लभ बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए एक अच्छी खबर सामने आई है. दरअसल, स्वास्थ्य मंत्रालय ने दुर्लभ बीमारियों से जूझ रहे मरीजों को सरकारी मदद देना शुरू कर दिया है. 2021 में नीति लागू होने के बाद यह पहली बार है, जब दुर्लभ रोगों से पीड़ित मरीजों को इस प्रकार मदद मिलने जा रही है. राष्ट्रीय नीति के तहत इनके आवेदनों को मंजूरी दी गई है.
दरअसल, इंडिया टुडे ने इस मुद्दे को जनवरी में सरकार के सामने उठाया था. इसमें ऐसे मरीजों की जिंदगी के बारे में बताया गया था, जो दुर्लभ बीमारियों से पीड़ित होने के कारण कष्टमय जीवन गुजार रहे हैं. इनमें से कई परिवार 2021 से सरकारी मदद के इंतजार में थे. 23 जनवरी 2023 तक एक भी परिवार को मदद नहीं मिली थी.
दस्तावेजों के मुताबिक स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय (दुर्लभ रोग प्रकोष्ठ) ने CGH-IGI को साल 2022-23 में राष्ट्रीय आरोग्य निधि की अंब्रेला योजना के तहत वित्तीय मदद के लिए एक पत्र लिखा गया था. इसके बाद जारी की गई 3.15 करोड़ की सरकारी मदद को कर्नाटक के बेंगलुरु के 22 परिवारों में वितरित किया जाएगा.
कोलकाता के सेंटर फॉर एक्सीलेंस में 4 परिवारों का रजिस्ट्रेशन किया गया है. इनमें 2 रोगी गौचर से पीड़ित हैं तो वहीं 2 रोगी MPS I से पीड़ित हैं. मंत्रालय ने 134 रोगी परिवारों के लिए 22 करोड़ रुपए जारी किए हैं. ये सभी मरीज 8 दुर्लभ बीमारियों से पीड़ित हैं.
इंडिया टुडे ने बेंगलुरु में रहने वाले उस परिवार से भी बात की, जो पॉलिसी के लाभार्थियों में से एक है. मूल रूप से कोलकाता के रहने वाले किस्मत अली मलिक ने बताया कि वह बेंगलुरु आए और कर्नाटक में लोहे के निर्माण से संबंधित कारखानों में काम करने वाले मजदूर हैं. उनके बेटे सुल्तान में 8 महीने की उम्र में गौचर के लक्षण दिखने लगे थे. इलाज के लिए पैसे नहीं होने के कारण परिवार ने पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में अपना घर बेच दिया और कर्नाटक के इंदिरा गांधी अस्पताल में बेटे का इलाज शुरू कर दिया.
डॉक्टर ने सुल्तान को एक जेनेटिक प्रोफाइल टेस्ट करने के लिए कहा. इसकी कीमत 30,000 रुपये थी. परिवार के पैसे नहीं थे, उन्होंने किसी तरह इसका प्रबंध किया. बाद में डॉक्टर ने बताया कि सुल्तान को गौचर है और उसके इलाज में 16 करोड़ रुपये खर्च होंगे. हम अपनी किडनी बेचने को तैयार हो गए. तब कुछ डॉक्टरों ने बेंगलुरु के इंदिरा गांधी अस्पताल में सरकारी योजना के बारे में बताया. हम उन डॉक्टरों के आभारी हैं जो हमारी मदद कर रहे हैं. गौचर के इलाज में सुल्तान को पहली दो खुराक 10 फरवरी और 22 फरवरी को मिली थी, जबकि तीसरी खुराक 8 मार्च को आईजीआई बेंगलुरु में दी गई थी.
भारत में जेनेटिक रेयर डिजीज की एक्सपर्ट्स और बोहरिंगर इंगेलहेम इंडिया की चिकित्सा निदेशक डॉ. श्रद्धा भूरे ने बताया कि देश में 5 से 10 करोड़ लोग भारत कई प्रकार की दुर्लभ बीमारियों या विकारों से प्रभावित हैं, इनमें से 80% बच्चे हैं. भारत में अब तक 7000 अलग-अलग प्रकार की दुर्लभ बीमारियां सामने आ चुकी हैं. देश में ऐसी बीमारियों के बारे में जागरूकता ज्यादा नहीं है, जिसके कारण कई रोगी बिना इलाज के रह जाते हैं.
इसके केंद्रो को बढ़ाकर 11 कर दिया गया है. इसमें एम्स नई दिल्ली, मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज नई दिल्ली, संजय गांधी पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज लखनऊ, पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एंड रिसर्च चंडीगढ़, सेंटर फॉर डीएनए फिंगरप्रिंटिंग एंड डायग्नोस्टिक्स विद निजाम इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल विज्ञान, किंग एडवर्ड मेडिकल अस्पताल मुंबई और सीजीएच-आईजीआई (इंदिरा गांधी अस्पताल) बेंगलुरु, इनमें से इंस्टीट्यूट ऑफ पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च कोलकाता, एम्स जोधपुर और एसएटी अस्पताल, केरल और आईसीएच चेन्नई शामिल हैं.
इसे सिर्फ पहला कदम माना जा रहा है, क्योंकि कुल मिलाकर ऐसे 453 मरीज परिवार हैं, जिनके बच्चे दुर्लभ बीमारियों से पीड़ित हैं. जो लाइसोसोमल स्टोरेज डिजीज और नॉन लाइसोसोमल स्टोरेज डिजीज दोनों के इलाज के लिए सरकारी फंड का इंतजार कर रहे हैं.